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‘विश्वरूपम’ की रिलीज में देरी हुई तो हो जाऊंगा दीवालिया
चेन्नई/(एजेंसी
Updated Wed, 30 Jan 2013 11:59 PM IST
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कमल हासन की फिल्म ‘विश्वरूपम’ पर तमिलनाडु में प्रतिबंध को लेकर चल रहा ड्रामा बुधवार को भी जारी रहा। आप कह सकते हैं: पिक्चर अभी बाकी है। उतार-चढ़ाव से भरे दिन में फिल्म के निर्माता-निर्देशक-अभिनेता को तब झटका लगा जब मद्रास हाईकोर्ट ने थिएटरों में फिल्म दिखाए जाने पर रोक लगा दी, जबकि इससे पहले मुस्लिम धार्मिक नेताओं से बातचीत कर कमल हासन आपत्तिजनक दृश्यों और शब्दों को हटाने पर राजी हो गए थे।
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इस बीच फिल्म को लेकर हो रही राजनीति से आहत 58 वर्षीय कमल हासन ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की और कहा कि यदि उन्हें न्याय नहीं मिला तो वे देश को छोड़ कर विदेश जा सकते हैं। जस्टिस के वेंकटरामन द्वारा मंगलवार की रात फिल्म की रिलीज की इजाजत के बाद बुधवार को तमिलनाडु के कुछ थियेटरों ने ‘विश्वरूपम’ का प्रदर्शन शुरू कर दिया था, लेकिन मद्रास हाईकोर्ट का आदेश आते ही फिल्म बीच में रोक दी गई।
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कुछ जगहों पर अज्ञात लोगों द्वारा पेट्रोल बम फेंकने की खबरें भी हैं। जब अदालत में फिल्म को लेकर सुनवाई चल रही थी, तब कमल हासन ने अपने चेन्नई स्थित दफ्तर में प्रेस कॉन्फ्रेंस की और कई भावुक बातें कही। उन्होंने न्याय न मिलने पर पहले राज्य (तमिलनाडु) को छोड़ कर केरल या आंध्र प्रदेश जाने की धमकी दी। फिर कहा कि यदि उन्हें भारत में कोई धर्मनिरपेक्ष जगह नहीं मिली तो पेंटर एमएफ हुसैन की तरह देश छोड़ कर भी जा सकते हैं।
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उन्होंने आरोप लगाया कि उनके साथ राजनीतिक खेल खेला जा रहा है। कमल हासन ने कहा, ‘सच यह है कि मैं न बाएं झुक रहा हूं और न दाएं। मैं अपना संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रहा हूं।’
उल्लेखनीय है कि तमिलनाडु में कमल हासन को डीएमके प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री एम करुणानिधि का नजदीकी माना जाता है। जबकि इस समय उनकी प्रतिद्वंद्वी जयललिता की सरकार है। ऐसे में चर्चा है कि करुणानिधि से मित्रता का खामियाजा कमल हासन को भुगतना पड़ रहा है।
कमल हासन ने कहा कि उन्होंने 100 करोड़ रुपये की इस फिल्म को बनाने में अपनी पूरी संपत्ति गिरवी रख दी है और जीवन भर की कमाई लगा दी है। यदि फिल्म की रिलीज में देर होती है और कर्जदाता उनसे धन वसूली के लिए आते हैं तो वह दीवालिये हो जाएंगे। उन्होंने कहा कि ‘मुस्लिम भाइयों’ से मेरे कोई मतभेद नहीं हैं और राज्य में कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य सरकार तथा पुलिस का काम है।
उधर, जस्टिस के वेंकटरामन द्वारा मंगलवार की रात उन्हें दी गई राहत बुधवार को तब नाकाफी साबित हुई जब न्यायाधीश एलिपे धर्मा राव और न्यायाधीश अर्जुन जगदीशन ने फिल्म पर बुधवार को फिर रिलीज होने से रोक दिया।
दो सदस्यीय पीठ अब बुधवार को इस मामले में सुनावाई करेगी। कोर्ट ने सोमवार तक कमल हासन को अपना पक्ष दाखिल करने को कहा है। इस बीच हासन के वकील ने संकेत दिए कि वे इस फैसले को चुनौती दे सकते हैं, लेकिन उनके भाई चंद्रा हासन ने कहा कि अगला कदम उठाने से पहले वह बुधवार तक इंतजार करेंगे।
वहीं तमिल फिल्म उद्योग से लेकर बॉलीवुड तक की हस्तियां कमल हासन के पक्ष में खड़ी नजर आईं। शाहरुख खान ने कहा कि किसी भी फिल्म के साथ ऐसा होना सबसे दुर्भाग्यपूर्ण है। महेश भट्ट ने कहा कि कमल हासन राष्ट्रीय संपदा और अद्वितीय कलाकार हैं। उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा है। पूरे फिल्म उद्योग के लिए यह सबसे दुखद क्षण हैं।
‘विश्वरूपम’ पर पाबंदी के पक्ष में उलेमा
फिल्म ‘विश्वरूपम’ में मुसलमानों के नकारात्मक चित्रण पर देवबंदी उलेमा ने ऐतराज जताते हुए सरकार से फिल्म पर पाबंदी लगाने की मांग की है। मदरसा जामिया इमाम मो. अनवर शाह के वरिष्ठ मुफ्ती अरशद फारुखी ने कहा कि ऐसी फिल्में देश में सांप्रदायिकता का जहर घोलती हैं।
अरबी के प्रसिद्ध विद्वान मौलाना नदीमुलवाजदी ने कहा कि किसी भी धर्म को लेकर इस तरह की विवादित फिल्म बनाना देश के लिए बेहतर नहीं है। दारुल उलूम वक्फ के वरिष्ठ उस्ताद और मदरसा जामिया तुल अनवरिया के मोहतमिम मौलाना नसीम अख्तर शाह कैसर ने भी फिल्म पर रोक लगाने की मांग की है।
राजनीति की आंधी में उड़ी फिल्में
सिनेमा में सिर्फ हीरो और विलेन ही नहीं होते। वह और भी बहुत कुछ कहता है। यही कारण है कि कभी राजनीतिक मुद्दों पर तो कभी सांस्कृतिक और धार्मिक मान्यताओं से टकराने के कारण भारत में फिल्मों का समय-समय पर विरोध होता रहा है। एक नजर उन फिल्मों पर जो राजनीतिक विषयवस्तु के कारण प्रतिबंध का शिकार हुईं:
- नील आकाशेर नीचे (1959) : निर्देशक मणि कौल की इस बांग्ला फिल्म में 1930 के कोलकाता में चीन से आए एक मजदूर की समस्याओं का चित्रण था। फिल्म को दो साल तक प्रतिबंधित किया गया।
- नाइन अवर्स टू रामा (1963) : यह फिल्म नाथूराम गोडसे द्वारा गांधी जी की हत्या के पहले के नौ घंटों को दिखाती है। ब्रिटेन में बनी यह फिल्म आज भी भारत में प्रतिबंधित है। इसका बड़ा हिस्सा भारत में फिल्माया गया।
- आंधी (1975) : आपातकाल के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इस फिल्म पर बैन लगाया। कहा गया कि यह उनके निजी जीवन पर आधारित है। 1977 में जनता पार्टी की सरकार आई तो रोक हटी।
- किस्सा कुर्सी का (1978) : तत्कालीन सत्ताधीशों की राजनीतिक तानाशाही को उजागर करने वाली इस फिल्म के प्रिंट के जब्त कर जला दिए गए। फिल्म में दिखाए गए भ्रष्ट नेता को कथित तौर पर संजय गांधी से जोड़ा गया।
- कुत्रपथिरिकई (1991) : राजीव गांधी की हत्या के बाद के घटनाक्रम दिखाने वाली इस तमिल फिल्म पर 15 वर्षों तक प्रतिबंध रहा। इसे लिट्टे का समर्थन करने वाली फिल्म कहा गया। 2007 में ढेर सारे कट्स के साथ फिल्म रिलीज हुई।
- डैम 999 (2011) : तमिलनाडु सरकार ने यह कहते हुए फिल्म को बैन किया कि इस के प्रदर्शन से केरल सरकार के साथ उसके रिश्ते प्रभावित हो सकते हैं। विवाद का कारण फिल्म का नाम बताया गया जो मुल्लापेरियार बांध विवाद की ओर इशारा करता है।
- आरक्षण (2011) : प्रकाश झा की फिल्म ‘आरक्षण’ को दलित विरोधी, आपत्तिजनक संवादों और खून से आरक्षण लिखने के दृश्य के कारण पंजाब, आंध्र प्रदेश व उत्तर प्रदेश में प्रदर्शन से रोका गया। कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद फिल्म दिखाई गई।