बीस हजार बच्चों का जीवन संवार रहा है किस

विजय गुप्ता(भुवनेश्वर से लौटकर) Updated Mon, 06 May 2013 12:03 AM IST
kalinga institute of social sciences
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महंगाई के इस दौर में जब एक बच्चे की अच्छी परवरिश में आदमी के पसीने छूट रहे हों, ऐसे में एक साथ बीस हजार बच्चों की मुफ्त परवरिश एक सपना ही हो सकता है, हकीकत नहीं।
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लेकिन उड़ीसा के भुवनेश्वर में कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस स्कूल (किस) ने ना सिर्फ इस सपने को हकीकत में बदला है बल्कि निकट भविष्य में एक साथ दो लाख बच्चों की मुफ्त पढ़ाई से लेकर उनको स्वालंबी बनाने तक की परवरिश का सपना भी संजो रखा है।


खास बात यह है कि किस में सिर्फ आदिवासी परिवारों के बच्चों को लाया जाता है। यहां बच्चों को नर्सरी से लेकर उच्च शिक्षा तक की पढ़ाई, खाने, रहने, वस्त्रों और रोजगार परक तक बनाने का खर्च संस्थान स्वयं उठाता है।

किस के संस्थापक अच्युता सामंत ने अमर उजाला को बताया कि अस्सी एकड़ में फैले संस्थान में एक छत के नीचे मौजूदा समय में देश के 62 आदिवासी और 13 विलुप्त होते आदिवासी जातियों के लगभग 20107 बच्चे मुफ्त में पढ़ाई कर रहे हैं।

यहां बच्चों को पढ़ाई के साथ अच्छे संस्कार भी दिए जाते हैं। बच्चे एक परिवार की तरह रहते हुए पढ़ाई और खेलकूद के अलावा रोजगार परक गुण भी सीखते हैं।

मौजूदा समय में किस में उड़ीसा के अलावा झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश के भी सुदूर क्षेत्रों के आदिवासी परिवारों के बच्चे शिक्षित किए जा रहे हैं। यह उन परिवारों के बच्चे हैं जिनके पास अपनी आजीविका के लिए भी कोई साधन नहीं है।

यहां बच्चों को मुफ्त में भोजन, अध्ययन सामग्री, वस्त्र सहित वो तमाम जरूरी साधन उपलब्ध कराये जा रहे हैं। जिससे उनका भविष्य उज्जवल हो सके।

पढ़ाई के साथ-साथ बच्चों को खेल के क्षेत्र में भी आगे बढ़ाया जा रहा है। यहां की रग्बी टीम ने तो अंडर 14 रग्बी वर्ल्ड चैंपियनशिप भी जीती है। जो उन तमाम बड़े-बड़े स्कूलों के लिए एक मिसाल है।

जहां लाखों रुपए लेकर बच्चों को शिक्षा दी जाती है। किस के सहयोगी संस्थान कलिंगा इंस्टीट्यूट ऑफ इंडस्ट्रियल टेक्नोलॉजी (किट) के वाइस चांसलर प्रो. सत्येंद्र पटनायक ने बताया कि किस की सबसे खास बात यह है कि शिक्षा पूरी होने के बाद बच्चों को अपने पैरों पर खड़े होने तक यहीं रखा जाता है।

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