16 से 18 वर्ष के किशोरों पर अपराधियों की तरह चलेगा मुकदमा
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
लोकसभा ने जघन्य अपराधों में शामिल 16 से 18 साल के किशोरों के खिलाफ वयस्क अपराधियों की तरह मुकदमा चलाने के प्रावधान वाले किशोर न्याय विधेयक, 2014 को मंजूरी दे दी है। इस तरह कानून बनने के प्रयास में इस बिल ने अपनी पहली बाधा पार कर ली है।
हालांकि सरकार ने विपक्ष की राय से सहमति जताते हुए खुद बिल से उपबंध सात को हटाया है। इसके तहत इस बात का प्रस्ताव था कि अगर कोई व्यक्ति जिसने 16 से 18 साल की उम्र में किसी गंभीर अपराध को अंजाम दिया है और वह 21 साल की उम्र पूरी करने के बाद पकड़ा जाता है, तो इस अधिनियम के प्रावधानों के तहत उस पर वयस्क के रूप में मुकदमा चलाया जाएगा।
सरकार के अनुसार उसने प्रयास किया है कि निर्दोष बच्चों के साथ अन्याय नहीं हो। विपक्ष के आरोपों का जवाब देते हुए महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने कहा कि उन्होंने इस बिल पर बहुत मेहनत की है। इसे समग्र बनाने का प्रयास किया गया है। बाल हितैषी रुख अपनाने के साथ, पीड़ितों के प्रति न्याय तथा बच्चों के अधिकारों के बीच पूर्ण संतुलन बनाने के हरसंभव प्रयास किए गए हैं। नए कानून की मंशा एक प्रतिरोधक के रूप में यह सुनिश्चित करने की है कि किशोर अपराध करने से बचें और अपनी जिंदगी खराब न करें।
विपक्ष का एक भी संशोधन मंजूर नहीं
नए कानून की जरूरत को वाजिब ठहराते हुए मेनका गांधी ने कहा कि राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार वर्ष 2013 में करीब 28 हजार किशोरों ने विभिन्न अपराध किए और इनमें से 3887 ने कथित रूप से जघन्य अपराधों को अंजाम दिया। निर्भया मामले के बाद कानून को कठोर बनाने की आवश्यकता महसूस हुई।
सरकार की ओर से इस विधेयक में लगभग 42 संशोधन पेश किए गए और उन सभी को स्वीकार कर लिया गया। विपक्ष का एक भी संशोधन मंजूर नहीं हो सका। विपक्ष की ओर से कांग्रेस के शशि थरूर और आरएसपी के एनके प्रेमचंद्रन ने कई संशोधन रखे थे।
नए कानून के दुरुपयोग और इसके तहत बच्चों के अधिकारों के उल्लंघन की आशंका को लेकर विपक्ष सरकार से संतुष्टि चाह रहा था। विपक्षी सदस्यों ने उम्र सीमा घटाए जाने का विरोध किया।
इस पर मेनका ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय घोषणापत्रों के अनुसार ऐसे अपराधों के लिए उम्र की परिभाषा देश विशेष की आर्थिक, सामाजिक तथा अन्य मौजूदा परिस्थितियों पर निर्भर करती है। अन्य देशों के कानून का उदाहरण सामने रखते हुए उन्होंने कहा कि इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया में यह उम्र दस साल है तो अर्जेंटीना में 16 और फ्रांस में 17 साल।