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सरकारी तंत्र के रवैये पर हैरान जस्टिस वर्मा

Wed, 23 Jan 2013 10:17 PM IST
नई दिल्ली/ब्यूरो
नई दिल्ली/ब्यूरो Updated Wed, 23 Jan 2013 10:17 PM IST
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justice verma surprised attitude of government machinery

जस्टिस जेएस वर्मा ने महिलाओं के खिलाफ अत्याचार और बलात्कार की घटनाओं के प्रति सरकार और सरकारी तंत्र के उदासीन व लचर रवैये पर हैरानी जताई है।

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बुधवार को सरकार को रिपोर्ट पेश करने के बाद प्रेस कांफ्रेंस में जस्टिस वर्मा ने कहा कि जिस गृहमंत्रालय ने महिलाओं की सुरक्षा के उपाय सुझाने के लिए इस कमेटी का गठन किया उसी मंत्रालय ने अपनी राय मंगलवार शाम पांच बजे भेजी। जबकि उन्हें मालूम था कि कमेटी आज अपनी रिपोर्ट सौंप देगी।
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जस्टिस वर्मा ने यह भी खुलासा किया कि सभी राज्यों के पुलिस महानिदेशकों ने तो कमेटी की ओर से राय भेजने की गुजारिश को ही अनसुना कर दिया। जस्टिस वर्मा ने पुलिस महानिदेशकों को अपने पद पर बने रहने पर भी सवाल खड़े कर दिए।
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उन्होंने इस बात पर भी हैरानी जताई कि जब पूरा देश दिल्ली में युवती के साथ हुई दरिंदगी के खिलाफ सड़कों पर उतरा हुआ था तब देश के गृहसचिव दिल्ली पुलिस कमिश्नर की पीठ थपथपा रहे थे। जस्टिस वर्मा के मुताबिक उस वक्त गृह सचिव और पुलिस कमिश्नर दोनों को देश से माफी मांगनी चाहिए थी कि वह उस युवती को सुरक्षा नहीं मुहैया करा पाए।

हालांकि जस्टिस वर्मा ने गृहराज्य मंत्री आरपीएन सिंह की उनकी संवेदनशीलता के लिए तारीफ भी की। उन्होंने कहा कि सभी मंत्रियों में वही एक थे जिन्होंने दिल्ली की बसों में घूमकर गुस्साय लोगों को भरोसा दिलाने की अपनी ओर से कोशिश की।

जस्टिस वर्मा के मुताबिक महिलाओं की सुरक्षा बाबत उनकी रिपोर्ट लोगों की ओर से भेजी गई राय के आधार पर तैयार की गई। उन्हें देश-विदेश से करीब 80,000 सलाह भेजी गई और उनका टीम ने हरेक सलाह को गंभीरता से जांचा परखा।

जस्टिस से मुताबिक उन्हें हैरानी तब हुई जब हार्वर्ड, ऑस्फोर्ड, कनाडा सुप्रीम कोर्ट जैसी विदेशी संस्थाओं से भी अलग-अलग तरीकों की सलाहें मिलनी शुरू हुई। अपने सहयोगी जस्टिस लीला सेठ और पूर्व सालीसिटर जनरल गोपाल सुब्रमण्यम ने मिलकर सभी सलाहों को निचोड़ यही निकाला की देश का संविधान सभी नागरिकों को बराबर आत्मसम्मान का अधिकार देता है।

लिहाजा संविधान की इसी आत्मा को बरकरार रखने के मकसद से कमेटी को भी अपनी सिफारिशें तय करनी चाहिए। वर्मा ने कहा कि उनके इतने लंबे कैरियर में यह काम सबसे ज्यादा चुनौतिपूर्ण था।

एक महीने में रिपोर्ट तैयार कर सरकार को दिया सबक
जस्टिस वर्मा ने बताया कि जब एक वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री उनके पास कमेटी के गठन का प्रस्ताव लेकर आए तो उन्होंने पूछा कि संसद का अगला सत्र कब है। यह जानकर कि बजट सत्र 21 फरवरी के आसपास शुरू होगा उन्होंने ठान लिया कि उनकी कोशिश एक महीने के भीतर रिपोर्ट तैयार कर लेने की होगी। ताकि सत्र शुरू होने के से पहले सरकार को भी एक महीने का वक्त मिले और वह सिफारिशों पर ठोस फैसला ले सके।

सरकार के लिए उदाहरण कायम करने के मकसद से उन्होंने अपने काम के लिए कुछ शर्तों पर बात की। जस्टिस वर्मा में लीला सेठ और गोपाल सुब्रमण्यम के अलावा करीब 20 पेशेवर लोगों की टीम की मांग की। उनकी मांग पूरी की गई। इसके साथ ही गृहमंत्रालय से भी 12 अधिकारियों की टीम दी गई।

विवाह में खापों का हस्तक्षेप सही नहीं
जस्टिस जेएस वर्मा कमेटी ने महिलाओं के खिलाफ अपराधों को नियंत्रित करने के लिए कानून में संशोधनों की सिफारिश पर पेश रिपोर्ट में खाप पंचायतों के कामकाज और विवाह को लेकर उनके रवैये पर कड़ी आपत्ति प्रकट की है। कमेटी ने सरकार से कहा है कि यह सुनिश्चित करना उसका काम है कि खाप पंचायतें विवाह को लेकर लोगों की पसंद में हस्तक्षेप न करें।

कमेटी ने महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में खाप पंचायतों की सोच और उनके कामकाज को महत्वपूर्ण माना क्योंकि इनके कारण ही ऑनर किलिंग जैसी घटनाएं देखने को मिलती हैं, जिसमें ज्यादातर शिकार महिलाएं होती हैं। कमेटी ने रिपोर्ट में एक अलग अध्याय खाप पंचायतों पर रखा। जिसमें कहा गया है कि खापों के जाति आधारित विचार तमाम सीमाओं को लांघते हैं और एक वयस्क को अपने जीवनसाथी के चुनाव की आजादी से रोकते हैं।

तीन सदस्यीय इस कमेटी में जस्टिस लीला सेठ और वरिष्ठ वकील गोपाल सुब्रह्मण्यम भी शामिल थे। कमेटी ने कहा कि खाप पंचायतें जिस अंतर-जातिय विवाह का विरोध करती हैं उसे हिंदू मैरिज एक्ट में कही वैधानिकता प्राप्त नहीं है।


खापों के रवैये से न केवल महिलाओं का सम्मान आहत होता है बल्कि अपनी पसंद से विवाह करने की उनकी आजादी भी छिनती है। इसके दूरगामी सामाजिक और आर्थिक दुष्प्रभाव पड़ते हैं। इससे महिला की शिक्षा और नौकरी-पेशा करने की संभावनाएं प्रभावित होती है और उनके मौलिक अधिकारों का हनन होता है।

कमेटी ने खापों द्वारा परंपरा के नाम पर युवाओं पर बनाए जाने वाले दबाव को अतार्किक बताया। कमेटी ने सरकार से कहा कि वह खाप पंचायतों की मनमानी पर नियंत्रण के लिए कदम उठाए।

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