फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   journalism is a profit making business says bbc, ajit sahi.

क्या पत्रकार बिकाऊ हैं? पढ़िए, ये रिपोर्ट

Tue, 03 Mar 2015 11:47 AM IST
अजित साही/वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी
अजित साही/वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी Updated Tue, 03 Mar 2015 11:47 AM IST
विज्ञापन
journalism is a profit making business says bbc, ajit sahi.

आमतौर पर खोजी पत्रकारिता नेताओं की कुर्सियां हिलाती है, लेकिन पिछले सप्ताह भारतीय समाचारपत्र, 'द इंडियन एक्सप्रेस' में एक खबर छपने के बाद से अब पत्रकारों की कुर्सियां हिल रही हैं।

विज्ञापन


खबर के मुताबिक कई पत्रकार एस्सार नाम की कंपनी के खर्चे पर टैक्सी जैसे फायदे उठाते रहे हैं। आरोप मामूली हैं, लेकिन फिर भी अनैतिकता स्वीकारते हुए एक महिला और एक पुरुष संपादक ने अपने-अपने अखबारों से इस्तीफा दे दिया है। एक टीवी समाचार चैनल में काम करने वाली एक और महिला पत्रकार को आंतरिक जांच के चलते काम से हटा दिया गया है।
विज्ञापन


भारतीय पत्रकारों पर पहली बार उंगली नहीं उठ रही है। 2009 में भी कुछ फोन टेप सामने आए थे। आयकर विभाग की चंद पत्रकारों और सियासी बिचौलियों की फोन पर बातचीत की गुप्त रिकॉर्डिंग से लग रहा था कि वो पत्रकारिता कम और दलाली ज्यादा कर रहे थे।
विज्ञापन
विज्ञापन


वैसे तो नेताओं और उद्योगपतियों से अखबारों की सांठ-गांठ का सिलसिला पुराना है, लेकिन भारतीय पत्रकारों के चाल-चलन में मूल्यों की व्यापक गिरावट खासतौर से पिछले 25 सालों में आई है।

इसके चार प्रमुख कारण हैं। पहला, पत्रकारों को मिले विशेष कानूनी संरक्षण का पतन। दूसरा, खबर की बजाए मुनाफे को प्राथमिकता। तीसरा, समाचार संगठनों में उद्योगपतियों का निवेश। और चौथा, पत्रकारों के निजी स्वार्थ।

पत्रकारिता की स्वतंत्रता को संवैधानिक संरक्षण देते हुए भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 1955 में वर्किंग जर्नलिस्ट एंड अदर न्यूजपेपर एम्पलॉइज एक्ट बनाया था।

इस कानून ने पत्रकारों की मनमानी बर्खास्तगी पर रोक लगा दी और जमीर का हवाला देते हुए पत्रकार के इस्तीफे को स्वत: लेबर विवाद का दर्जा दिया। नियुक्तियों, छुट्टियों और पदोन्नति इत्यादि के नियम निर्धारित किए।

ठेकेदारी से गई निष्पक्षता और साहस

journalism is a profit making business says bbc, ajit sahi.

कानून ने सरकार को जिम्मेदारी दी कि तनख्वाह में बढ़ोतरी तय करने के लिए सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट के जज की अध्यक्षता में मालिक और कर्मचारी यूनियनों को लेकर एक ट्राइब्यूनल बनाए जो स्वतंत्र रूप से वेतनमान तय करे।

वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट ने पत्रकारों को निष्पक्ष काम करने का साहस दिया। संपादकों की मनमानी इतनी आसान और आम नहीं थी जितनी आज है। अखबार मालिकों की भी न्यूजरूम में घुसपैठ कम थी।

अस्सी के दशक का अंत आते-आते माहौल बदलने लगा। ट्राइब्यूनल द्वारा निर्धारित वेतन से तीन-चार गुना पगार पाने के आकर्षण में पत्रकारों ने स्वेच्छा से वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट छोड़ कर ठेके पर नौकरी करना मंजूर किया। इस तरह उनकी नौकरी एक झटके में असुरक्षित हो गई। साथ ही संपादकों ने अखबार मालिकों के इशारों पर चलना शुरू कर दिया।

पुराने दौर में पत्रकारों का अखबार के नफा-नुकसान के बारे में सोचना भी अनैतिक था लेकिन जब नौकरियां ठेके पर दी जाने लगीं तो न्यूजरूम पर बाजार का कब्जा हो गया।

किसी जमाने में दिग्गज बुद्धिजीवी, साहित्यकार और अर्थशास्त्री अखबारों के संपादक होते थे। अब अखबार के मालिक वफादारों को संपादक बनाकर उन्हें मुनाफे की जिम्मेदारी देने लगे।

अखबार के पन्नों में खबर से अधिक विज्ञापन को प्राथमिकता मिलने लगी। विज्ञापन की ललक के चलते कॉरपोरेट सेक्टर की धांधलेबाजी की खबरें कम होती गईं। संपादक की पगार से अधिक मार्केटिंग और सेल्स के मैनेजरों की पगार होने लगी।

अखबार बना मुनाफे का धंधा

journalism is a profit making business says bbc, ajit sahi.

अस्सी के दशक के उत्तरार्द्ध में लेटरप्रेस की जगह ऑफसेट प्रिंटिंग ने ले ली और कलम-दवात की जगह कम्प्यूटर ने। नई तकनीक से छपाई की गुणवत्ता में सुधार आया। कम समय में अधिक प्रतियां छापना संभव हुआ। रंगीन छपाई शुरू हुई। साथ ही अखबार छापने के लिए कर्मचारियों की जरूरत भी बहुत कम हुई। कुल मिलाकर अखबार का धंधा मुनाफे के लिए मुफीद होने लगा।

लिहाजा खबर वो होने लगी जो बिकती थी। मनोरंजन, ग्लैमर, फैशन, क्रिकेट के रंगीन परिशिष्ट छपने लगे। अखबार का पहला पन्ना कभी पत्रकार का मंदिर होता था। नए दौर में उस पर कुबेर देवता का वास होने लगा।

कॉरपोरेट जगत से हाथ मिलाकर उनके प्रायोजन से अखबारों ने सेमिनार और कॉन्फ्रेंस वगैरह करवाने शुरू किए। पत्रकारों ने राजी-खुशी इनमें कॉरपोरेट मैनेजरों के साथ कंधा मिला कर काम करना शुरू किया।

इक्कीसवीं शताब्दी में समाचार टीवी चैनलों का विस्तार हुआ। ये शुरू से ही कॉरपोरेट विज्ञापनदाता के मोहताज रहे जो खबर के कार्यक्रमों को प्रायोजित करने लगे। विज्ञापन खोने के भय से अखबारों का रुख और बाजारू होता गया।

पत्रकार नहीं, मीडियाकर्मी

journalism is a profit making business says bbc, ajit sahi.

एक वक्त था जब अखबार का सालाना खर्चा कमोबेश बिक्री और विज्ञापन से निकल ही आता था, लेकिन टीवी चैनल लगाने और चलाने के विशाल खर्चे विज्ञापन से पूरे नहीं हो सकते थे। ऐसे में बडे़ उद्योगपतियों ने धंधे में पूंजी लगाना शुरू किया।

इस तरह औद्योगिक व्यवस्था का प्यादा बन गए पत्रकार से निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता की अपेक्षा बेतुकी और अनुचित है। वो पत्रकार नहीं "मीडियाकर्मी" है। उसका काम अखबार की बिक्री और समाचार टीवी चैनल की रेटिंग बढ़ाना है।

और ऐसा भी नहीं कि आज पत्रकार इस उत्तरदायित्व से कतराना चाहता है बल्कि हर पत्रकार आगे बढ़ कर मैनेजर की जिम्मेदार ओढ़ने की कामना रखता है। आखिरकार धंधे में ऊपर चढ़ने की अब यही एक सीढी़ है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed