जाट आरक्षण पर अब ये 'ब्रह्मास्त्र' चलाएंगे मोदी
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सटीक रणनीति, आक्रामक शैली, सधी चाल और राजनीतिक परिपक्वता। भाजपा नेताओं की जाट आरक्षण को लेकर यही फुलप्रूफ प्लानिंग उसे लाभ दिला सकती है। जिस तरह से भाजपा नेता सक्रिय हुए और प्रधानमंत्री ने इस मसले पर कमेटी बनाने की घोषणा की, उसे नुकसान को फायदे में बदलने की रणनीति माना जा रहा है।
दरअसल भाजपा में जाट सांसदों की संख्या अच्छी खासी है, ऐसे में उनकी लॉबी अपने वोटरों को समझाने के लिए मजबूत मुहिम चला रही है। भाजपा भी उन्हीं के सहारे जाट आरक्षण के मामले में अब फ्रंट पर है। ये जाट सांसद अपनी बिरादरी को यह समझाने में जुट गए हैं कि केंद्र सरकार का जाट आरक्षण रद्द होने में कोई रोल नहीं है। और सब कुछ पूर्ववर्ती केंद्र सरकार की देन है।
भाजपा के जाट सांसद यह भी जानते हैं कि आरक्षण रद्द होने से जाट समाज फिर से रालोद की ओर लौट सकता है। इसीलिए वे कांग्रेस सरकार के कमजोर तथ्यों को आधार बनाते हुए प्रचार कर रहे हैं कि अब हमारी सरकार है, आरक्षण तो लेकर रहेंगे। जिससे भाजपा के पक्ष में समर्थन और मजबूत हो।
वेस्ट यूपी में जाट राजनीति
पश्चिम में जाट वोटरों की संख्या अच्छी खासी है। लोकसभा चुनाव से ऐन पहले यूपीए सरकार ने जाट आरक्षण दिया तो रालोद ने इसे बड़ी उपलब्धि करार देते हुए मेरठ में विशाल रैली कर डाली। हालांकि चुनाव में रालोद और कांग्रेस दोनों को ही भारी नुकसान हुआ। खुद चौधरी अजित सिंह और उनके बेटे जयंत चौधरी ही चुनाव हार गए। भाजपा ने रणनीति के तहत लोकसभा चुनावों में जाट समाज से जुड़े मजबूत लोगों को चुनाव लड़वाया था। इस चुनाव में जाट समाज ने भाजपा को भारी संख्या में वोट देते हुए हाथोंहाथ भी लिया था।
अब जाट आरक्षण रद्द होने के बाद रालोद और जाट संगठनों ने केंद्र सरकार पर कमजोर पैरवी के आरोप लगाए। समाज के भावनात्मक जुड़ाव को देखते हुए माना गया कि रालोद को इससे सियासी संजीवनी मिल सकती है। इन्हीं संभावनाओं के बीच मुखर हुए भाजपा के जाट समाज के सांसदों ने बुधवार को मेरठ में बैठक कर भरोसा दिलाया कि समाज को फिर से उसका हक दिलाया जाएगा।
इस रणनीति के पीछे इन नेताओं को यह डर सता रहा है कि भारी संख्या में उनके साथ आया जाट समाज खिसक न जाए। केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान खुद इसके लिए आगे आए और इसे बेहतर रणनीति के तहत फायदे की स्थिति की ओर ले जाने की कोशिश की जा रही है। गुरुवार को पीएम मोदी के साथ बैठक और इसके बाद जाट आरक्षण फिर से दिलाने की दिशा में बढ़ा कदम पश्चिम के लिहाज से भाजपा की बेहतर रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
अब देखने वाली बात यह होगी कि भावनात्मक लाभ लेने की रालोद की कोशिश कितना रंग लाएगी। इसके अलावा भाजपा के जाट नेताओं की नई रणनीति के बाद जाट वोटरों का रुख भी महत्वपूर्ण होगा। इतना तय है कि मेरठ, बागपत, मुजफ्फरनगर सहित आसपास के जिलों में भारी जाट समाज के समर्थन को भाजपा ऐसे ही नहीं जाने देगी।