'भाजपा को अपने किए का परिणाम भुगतना होगा'
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लोकसभा चुनाव प्रचार अभियान में राजस्थान का सियासी तापमान इस समय काफी गरम हो चुका है। खासकर दिग्गज नेता और पूर्व विदेशमंत्री जसवंत सिंह की भाजपा से बगावत के बाद बाड़मेर से उनके चुनाव लड़ने और उनको पार्टी से निकाले जाने का मुद्दा कुछ ज्यादा ही गरम है। जसवंत सिंह से अमर उजाला के सुजय मेहदुदिया की खास बातचीत:
:- ऐसी क्या गड़बड़ हो गई कि आपको बाड़मेर से टिकट नहीं दिया गया? क्या पार्टी के एक निश्चित खेमे की ओर से आपको साजिश की बू नजर आ रही है?
:- मैं साजिश के मुद्दे पर कुछ नहीं कह सकता। आपको यह प्रश्न राजनाथ सिंह से पूछना चाहिए। मैंने काफी पहले ही पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से अपनी इच्छा जाहिर कर दी थी कि मैं अंतिम चुनाव बाड़मेर से लड़ना चाहता हूं। लेकिन अचानक ही मुझे टिकट देने से इनकार करते हुए कांग्रेस से बाहर किए गए कर्नल सोनाराम को टिकट थमा दिया गया। फिर भी यह टिकट किसी भाजपा के कार्यकर्ता को दिया जाता तो मैं बतौर निर्दलीय चुनाव नहीं लड़ता।
'देश की लिए अच्छी नहीं भाजपा की नीति'
:- क्या आप मानते हैं कि भाजपा पर एक नई सोच और विचारधारा ने पकड़ बना ली है जो पार्टी के वरिष्ठ और बुजुर्ग नेताओं को अलग-थलग कर अपनी चला रहे हैं?
:- यहां बुजुर्ग और जवान की बात नहीं है। जहां उम्र के साथ अनुभव आता है, वहीं युवा उत्साह से लबरेज होते हैं। राजनैतिक संस्था के लिए दोनों का मिश्रण जरूरी है। इस वक्त भाजपा जो भी कर रही है वह पार्टी और देश दोनों के लिए अच्छा नहीं है। इसके परिणाम जरूर भुगतने होंगे।
'राजनाथ के नेतृत्व का शिकार रहा हूं'
:- क्या आपके और राजनाथ सिंह के संबंध बेहद खराब हो चुके हैं?
:- मैं यह नहीं जानता कि मेरे और उनके संबंध बदतर हो चुके हैं या नहीं। लेकिन मैं उनके महान नेतृत्व का शिकार जरूर रहा हूं। उनके दिमाग में मेरे प्रति जरूर कहीं न कहीं गलतफहमी है। मैंने काफी पहले ही पार्टी और वरिष्ठ नेताओं को इस बात के प्रति आगाह कर दिया था कि उनकी अध्यक्षता में पार्टी शिकार बनने जा रही है।
:- क्या आपके बगावत के निर्णयों ने बतौर भाजपा विधायक राजस्थान की विधान सभा में आपके पुत्र मानवेंद्र सिंह के राजनैतिक भविष्य पर सवालिया निशान नहीं लगा दिए हैं?
:- मानवेंद्र इस वक्त एक पुत्र का फर्ज निभा रहे हैं। वह इस दुनिया में अपना भाग्य लेकर आए हैं और इसे उनसे कोई नहीं छीन सकता है।