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'दिल्ली में नहीं बन सकता जनलोकपाल'

Sun, 09 Feb 2014 02:47 PM IST
सुभाष कश्यप/संविधान विशेषज्ञ
सुभाष कश्यप/संविधान विशेषज्ञ Updated Sun, 09 Feb 2014 02:47 PM IST
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janlokpal bill debate subash kashyap

दिल्ली राज्य नहीं है, दिल्ली केंद्र शासित प्रदेश है, जिसका प्रशासन राष्ट्रपति अपने एक प्रशासक के जरिए चलाते हैं। वो प्रशासक राज्यपाल हैं।

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अब क्योंकि यह राज्य नहीं है इसलिए संविधान का सातवां शेड्यूल- जिसमें राज्य और केंद्र की शक्तियों का विभाजन किया गया है और समवर्ती (जिसमें दोनों कानून बना सकते हैं)- वह दिल्ली पर उस तरह लागू नहीं होता, जिस तरह अन्य राज्यों पर होता है।

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केंद्र का कानून ही होगा प्रभावी

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इसका मतलब यह है कि राज्य की सूची में जो विषय हैं केंद्र सरकार उन पर भी कानून बना सकती है।

मान लेते हैं कि दिल्ली सरकार ने कोई कानून बनाया तो भी केंद्र का कानून ही प्रभावी होगा। दिल्ली की विधानसभा और मंत्रिमंडल की शक्तियां सीमित हैं और संविधान द्वारा इनकी व्याख्या की गई है।

केजरीवाल को इसका अंदाजा नहीं था?

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लोकपाल विधेयक को संसद पास कर चुकी है और वह कानून बन चुका है तो ऐसा कोई भी कानून जो उसका विरोधाभासी हो, वह संवैधानिक नहीं हो सकता।

इसमें ऐसे बहुत से प्रावधान हैं, जैसे कि पुलिस, भूमि, कानून-व्यवस्था के बारे में जो सीधे लोकपाल कानून से टकराती हैं।

केजरीवाल को चुनाव लड़ने से पहले और बहुत से वायदे करने से पहले यह देखना चाहिए था कि संविधान में इसके लिए प्रावधान क्या है? अगर वह सरकार बनाते हैं तो सरकार के पास क्या शक्तियां हैं? वह कुछ कर भी सकते हैं या नहीं?

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क्या करेंगे केजरीवाल?

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क्या केजरीवाल को पीछे हटना होगा?

ऐसा हो सकता है कि केजरीवाल हठधर्मी से पेश आएं और कहें कि हम कानून बनाएंगे।

लेकिन राज्यपाल को यह भी अधिकार है कि वह सदन को संदेश भेज सकें कि यह असंवैधानिक है, सदन इस पर कार्यवाही न करे।

राज्यपाल की मंजूरी जरूरी

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लेकिन अगर इनके पास बहुमत है (जिस पर अब संदेह है) तो इसके बावजूद यह इसे पास करवाने की कोशिश कर सकते हैं- राज्यपाल की सलाह को मानने की कोई संवैधानिक बाध्यता नहीं है।

लेकिन अगर वह विधेयक को पास करवा भी लेते हैं तो वह फिर राज्यपाल के पास आएगा ही, उसके बिना यह कानून नहीं बन सकता।

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