अश्लीलता के लिए जावेद अख्तर ने जनता पर फोड़ा ठीकरा
जेएलएफ के दो सत्रों में अश्लील गानों की जिम्मेदारी तय करने पर जोरदार बहस चली। एक सत्र में जावेद अख्तर थे, तो दूसरे में प्रसून जोशी। दोनों ने माना कि अश्लील गानों के लिए जनता और लेखक दोनों दोषी है, कोई कम है, तो कोई ज्यादा। हालांकि दोनों का मानना है कि बुजुर्ग ही नहीं युवा भी अच्छी शायरी व गीत पसंद करते हैं।
सत्र ‘गाता जाए बंजारा’ में प्रसिद्ध गीतकार जावेद अख्तर ने जनता को अधिक दोषी माना। उन्होंने कहा कि अश्लील गाना बनाने वाले तो दोषी हैं ही, लेकिन उनसे ज्यादा दोषी हैं, जिन्होंने ऐसे गीतों को सुपरहिट बनाया। मनोरंजन की दुनिया जनता की पसंद व नापसंद पर चलती है और जनता चाहे तो अश्लील गाने रुक सकते हैं। जनता चाहे तो अश्लील और फिजूल गाने बंद हो सकते हैं।
उन्होंने कहा कि अगर कोई कनपटी पर बंदूक लगा दे तो भी वह चोली के पीछे क्या है जैसा गाना नहीं लिख सकते। आज गाने आइटम सांग बन गए है, जिनका फिल्म की कहानी से कोई लेना-देना नहीं होता। यह मदारी के सिर पर बैठे बंदर जैसे होते हैं जो खेल दिखा कर चला जाता है।
युवा पीढ़ी पसंद करती है पुराने गाने: प्रसून
उधर, प्रसून जोशी ने ‘तारे जमीन पर’ सत्र में कहा कि जितनी चर्चा लेखक या गीतकार की आजादी की होती है, उतनी ही पाठक या श्रोता की आजादी की भी होनी चाहिए। शब्द संस्कृति का कैप्सूल हैं। कविता को मनोरंजन का साधन समझना, एक तरह से कविता का ही अपमान है।
उन्होंने कहा कि आज की पीढ़ी पुराने गानों को पसंद करती है, क्योंकि उनमें रिपीट वैल्यु होती है। अश्लील गाने तो एक छोटे से अरसे के बाद गायब हो जाते हैं।
अच्छी शक्ल देखकर मिलता था संस्थान में प्रवेश
अपनी आत्मकथा ‘एंड देन वन डे’ की लॉचिंग के लिए जेएलएफ में आए प्रसिद्ध अभिनेता नसीरूद्दीन शाह ने गिरीश कर्नाड के साथ सत्र में पुराने दिनों की चर्चा की। गिरीश ने कहा कि पूना फिल्म एंड टेलिविजन ट्रेनिंग संस्थान में वह गुरू थे और नसीर विद्यार्थी।
उन्होंने कहा कि नसीर मेरे (गिरीश) ही खिलाफ विरोध में उतर आए थे और अन्य को भी अपने साथ लेकर हड़ताल की थी। नसीर ने हड़ताल का कारण बताते हुए कहा कि वहां अन्य विधाएं सीखने वालों को तो मौका मिल जाता था, लेकिन एक्टरों को मौका नहीं दिया जाता था।
उन्होंने खुद पूरे कोर्स के दौरान एक बार भी कैमरे का सामना नहीं किया। इसी के विरोध में यह हड़ताल थी। नसीर ने बताया कि उन्हें निशांत फिल्म में सिर्फ इसलिए लिया गया क्योंकि वह खूबसूरत नहीं दिखते थे, जबकि फिल्म संस्थान में लिया ही उन्हें जाता था
जिनकी शक्ल अच्छी होती थी। ओमपुरी को तो गिरीश कर्नाड और एक अन्य सदस्य के अलावा पूरी ज्यूरी ने रिजेक्ट कर दिया था। नसीर ने कहा कि एक्टिंग सिखाई नहीं जाती, बल्कि सीखी जाती है।