जाट आरक्षण: भाजपा के लिए इधर कुआं, उधर खाई
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उत्तर प्रदेश में भाजपा की जो स्थिति है वो हरियाणा में उसकी स्थिति पर असर डाल रही है, जहां हरियाणा सरकार की कोई भी योजना फिलहाल काम नहीं कर पा रही है। उत्तर प्रदेश में 2017 में होने वाले विधानसभा चुनावों में भाजपा के लिए जाट बहुल पश्चिमी उत्तर प्रदेश सबसे अच्छे परिणाम लेकर आ सकता है।
मुजफ्फरनगर में हाल ही में हुए उपचुनावों में भाजपा ने जो जीत दर्ज की है वो उसकी संभावनाओं को और प्रबल बनाता है। इस सीट पर पहले समाजवादी पार्टी काबिज़ थी। उत्तर प्रदेश में जाटों का ध्रुवीकरण भाजपा की तरफ हो रहा है क्योंकि राज्य में प्रभावशाली जाट नेता अजीत सिंह का राजनीतिक महत्व कम होता जा रहा है।
वहीं हरियाणा सरकार जाट आरक्षण को लेकर वहां हो रही हिंसा को भड़काने वालों के ख़िलाफ़ सख्त कदम नहीं उठा सकी है। इसी वजह से एक अजीब सी स्थिति पैदा हो गई है। हरियाणा के जाट आंदोलनकारियों ने वहां सरकारी इमारतों और पुलिस को सीधे निशाना बना रहे हैं।
भाजपा के सामने मुख्यमंत्री बदलने का भी दबाव
रेलवे स्टेशन, तहसील कार्यालयों, पुलिस स्टेशन और पुलिस पोस्ट को नुकसान पहुंचाया गया है। चूंकि सड़कों पर अब भी आंदोलनकारी बड़ी संख्या में मौजूद हैं, इसलिए सेना की तैनाती भी पूरी तरह से नहीं की जा सकी है।
सरकार को इस बात का भी डर है कि कहीं प्रशासन इस मामले से निपटने में विफल न हो जाए। संभवत: भाजपा में मौजूद जाट नेताओं को भी ये डर सता रहा होगा कि इस आंदोलन के ख़त्म होने के बाद उनका वर्चस्व न कम हो जाए।
लेकिन इस स्थिति को वो एक मौके की तरह भी भी देख रहे हैं कि अगर भाजपा इस स्थिति से निपटने के लिए कोई जाट मुख़्यमंत्री चुनती है तो क्या उसे इसका फ़ायदा मिल सकता है?
हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर के रूप में लगभग 20 साल बाद गैर जाट बिरादरी का व्यक्ति मुख्यमंत्री बना है। हरियाणा में विधानसभा चुनावों के दौरान भाजपा ये संदेश पहुंचाने में सफल रही थी कि वो गैर जाट बिरादरी से किसी व्यक्ति को मुख्यमंत्री बनाएगी। इसी वजह से भाजपा को हरियाणा में ऐतिहासिक जीत मिली थी।
कुरुक्षेत्र से सांसद सैनी के बयान ने बढ़ाया बवाल
हालांकि भाजपा ने चौधरी बीरेंद्र सिंह को केंद्र सरकार और दो अन्य वरिष्ठ जाट नेताओं ओम प्रकाश धनकड़ और कैप्टन अभिमन्यु सिंह को राज्य की कैबिनेट में जगह देकर एक संतुलन बनाने की कोशिश की थी।
इसके अलावा एक अन्य जाट नेता सुभाष बराला को प्रदेश का भाजपा अध्यक्ष नियुक्त किया था। लेकिन कुरुक्षेत्र से भाजपा सांसद राजकुमार सैनी ने चुनाव के बाद गैर जाट का सियासी दांव चला और खुले तौर पर जाटों को आरक्षण का विरोध किया।
शुरुआती एक साल तक भाजपा ने सैनी की नाराज़गी को नजरअंदाज इसलिए किया क्योंकि वो गैर जाट भावनाओं से फायदा उठाना चाहती थी। ये भाजपा के हिसाब से हरियाणा की राजनीति के लिए बहुत अहम रहा है। लेकिन भाजपा के इस रवैये ने जाटों को काफी उकसा दिया।
जब जाट नेताओं ने सैनी के ख़िलाफ़ शिकायत की कि वो जाति के आधार पर लोगों को भड़का रहे हैं, तब जाकर भाजपा ने सैनी के ख़िलाफ़ कार्रवाई की और उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया है।
आंदोलन कर रहे कुछ नेताओं का यह भी कहना था कि सैनी के खिलाफ देशद्रोह का मामला दर्ज किया जाए। भाजपा को डर है कि कहीं उत्तर प्रदेश और राजस्थान के जाट भाजपा के किसान समुदाय के लिए आरक्षण के इरादों पर संदेह न करने लगें।
भाजपा फिलहाल इस पशोपेश में है कि उत्तर प्रदेश में पकड़ मज़बूत बनाने के लिए वो जाटों का समर्थन करे या हरियाणा में सत्ता कायम रखने के लिए उन्हें नज़रअंदाज़ करे या फिर सख्ती करे।
(ये लेखक के निजी विचार हैं)