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'काटजू कह सकते हैं कि मैंने बीफ खाया, क्योंकि वे अखलाक नहीं'

Mon, 05 Oct 2015 01:21 PM IST
Updated Mon, 05 Oct 2015 01:21 PM IST
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It is hard to know why he died for died person

जस्टिस मार्कंडेय काटजू बनारस यूनिवर्सिटी में दिन दहाड़े यह कह सकते हैं कि मैं अगर बीफ खाऊं तो कौन रोकेगा मुझे। क्योंकि जस्टिस काटजू बिसहड़ा गांव के अखलाक अहमद नहीं। शोभा डे धड़ल्ले से बोल सकती हैं कि मैंने अभी-अभी बीफ खाया है, आओ मुझे मार डालो क्योंकि शोभा डे अखलाक अहमद की मां असगरी नहीं हैं। लालू यादव सवाल कर सकते हैं कि बीफ और बाकी गोश्त में क्या फर्क है? क्योंकि लालू, एहसान जाफरी नहीं।

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जैसे पाकिस्तान में किसी को भी मारने के लिए मस्जिद के लाउडस्पीकर पर एलान कर के भीड़ इकट्ठी हो सकती है कि फलाने ने कुरान का अपमान किया। उसी तरह भारत में भी किसी भी मंदिर से एलान-ए-जंग हो सकता है कि फलाने मोहम्मद सलीम ने गाय के बछड़े की खाल कचरे में फेंकी है या फलाने फर्नांडीस ने फलाने जीवनराम की लड़की छेड़ दी।
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जैसे पाकिस्तान में किसी हिंदू को भारतीय जासूस या किसी ईसाई को अंग्रेज की औलाद कहना सब एक हल्का-फुल्का मजाक समझते हैं। उसी तरह भारत में किसी मुसलमान को पाकिस्तानी या देशद्रोही कहना या अहमदाबाद के मोहल्ला बटावा को पुलिस रिकॉर्ड में बंटा हुआ पाकिस्तान और थाणा जिले के मोहल्ले निलास पाड़ा को डाक कर्मचारी की तरफ से छोटा पाकिस्तान कहना और लिखना भी सबको कबूल हैं।
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किस-किस घटना पर रोएं

It is hard to know why he died for died person

जब हम दूसरे धर्म मानने वालों से सिर्फ इसलिए संपर्क ना रखें कि कहीं बाकी लोग बुरा न मान जाएं तो उसके बाद हमारा मन और दिमाग उन्हीं बाकी लोगों का गुलाम बनता चला जाता है। और हमें पता भी नहीं चलता कि हमारी आत्मा और नजर का रिमोट कंट्रोल किसके हाथ में चला गया?

मेरे दोस्त गुजरात के एक पत्रकार राजीव खन्ना बताते हैं कि एक दिन जब वो पुराने अहमदाबाद में खजूर खरीदने जा रहे थे तो उनके साथ चलने वाला एक अंग्रेज पत्रकार हैरानी से पूछने लगा, "राजीव भाई आप भी खजूर खाते हैं। मैं तो समझता था कि खजूर बस मुसलमान खाते हैं।"

और किसी के कहने पर किसी की जान लेने का काम तब शुरू होता है जब किसी के मुंह पर पहला चांटा पड़े और आसपास के लोग इस व्यक्ति की हिमायत इसलिए ना करें क्योंकि उसकी नस्ल, धर्म और संस्कृति अलग है।

संवेदनहीनता का इंजेक्शन

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चूंकि इस बुनियाद पर पहली बार थप्पड़ मारने का हौसला और बढ़ जाता है, फिर यह हौसला बढ़ते-बढ़ते अगली वारदात में दो चांटों और फिर एक चाकू और फिर एक पिस्तौल और फिर भीड़ के हमले और फिर पूरी बस्ती फूंक देने में बदल जाता है। हम खुद को यही कहते रह जाते हैं कि इतने बड़े देश में अब किस-किस घटना पर रोएं।

यही छोटी-छोटी बातें समाज की माला में पिरोती-पिराती इतना बड़ा हार बन जाती हैं जिससे पूरे समाज को फांसी दी जा सकती है। जिसके हाथ में यह रस्सा है, अगर वो इससे हम सबको फांसी ना दे तो यह हमारी कोई अच्छाई नहीं, उसकी मेहरबानी है।

समाज बीफ या सूअर खाने से नहीं, वहशीपन या संवेदनहीनता के इंजेक्शन से मरता है। खुद की तसल्ली के लिए कारण कोई भी गढ़ लें। कारण की बहस अक्सर हत्यारे के काम आती है। मरने वाले को क्या कि वो क्यों मरा?

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