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‘आईटी एक्ट से नहीं प्रभावित होती अभिव्यक्ति की आजादी’

Fri, 11 Jan 2013 09:32 PM IST
नई दिल्ली/एजेंसी
नई दिल्ली/एजेंसी Updated Fri, 11 Jan 2013 09:32 PM IST
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IT Act does not affect freedom of expression

केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के सामने दलील दी कि आईटी एक्ट की विवादास्पद धारा 66-ए से किसी भी प्रकार से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित नहीं होती है। साथ ही कहा कि कुछ अधिकारियों की मनमानी का अर्थ यह नहीं है कि काननून यह खराब प्रावधान है।

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साइबर लॉ के इसी विवादास्पद प्रावधान के तहत पिछले साल महाराष्ट्र पुलिस ने फेसबुक पर टिप्पणी पोस्ट करने पर दो लड़कियों को गिरफ्तार किया था। सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में महाराष्ट्र सरकार से भी जवाब तलब किया था।
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प्रदेश सरकार ने अपने जवाब में कहा कि लड़कियों को गिरफ्तार करना अनावश्यक और जल्दबाजी में की गई कार्रवाई थी। साथ ही प्रदेश सरकार ने कहा कि इस कदम को न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता है।
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संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने अपने हलफनामे में आईटी एक्ट की धारा 66-ए का बचाव किया है। इसी के तहत ठाणे की पुलिस ने पालघर की दो लड़कियों को गिरफ्तार किया था। हलफनामे में मंत्रालय ने कहा है कि यह प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 19(1) में दिए गए अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार पर नियंत्रण नहीं लगाता है क्योंकि यह पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान नहीं करता है बल्कि कुछ तर्कसंगत प्रतिबंध लगाता है।

मंत्रालय ने कहा कि केंद्र सरकार ने वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की अनुमति के बिना धारा 66-ए के तहत कोई गिरफ्तारी नहीं करने का निर्देश जारी किया है। इससे भविष्य में किसी भी व्यक्ति की गैरजरूरी गिरफ्तारी की संभावना समाप्त हो जाएगी। मंत्रालय ने देश में इंटरनेट उपभोक्ताओं के विवरण और इसके दुरुपयोग के खतरे के बारे में भी सर्वोच्च न्यायालय को अवगत कराया।

उच्चतम न्यायालय ने 30 नवंबर 2012 को केंद्र सरकार से आईटी एक्ट की धारा 66ए के दुरुपयोग और इसमें संशोधन पर जवाब तलब किया था। इसके साथ ही कोर्ट ने दो लड़कियों की गिरफ्तारी की परिस्थितियों पर महाराष्ट्र सरकार से जवाब मांगा था। इसके अलावा सर्वोच्च अदालत ने दिल्ली, पश्चिम बंगाल और पुडुचेरी सरकार को भी नोटिस जारी किया था।

क्या है धारा 66-ए
धारा 66-ए के तहत यदि कोई व्यक्ति कंप्यूटर या संचार उपकरण के जरिए ऐसी कोई सूचना भेजता है जो बहुत ही आपत्तिजनक या भयभीत करने वाली हो तो उसे तीन साल तक की कैद और जुर्माने की सजा हो सकती है।

चिदंबरम के खिलाफ टिप्पणी करने वाले की गिरफ्तारी जायज
वित्त मंत्री पी. चिदंबरम के खिलाफ सोशल मीडिया में आपत्तिजनक टिप्पणी पोस्ट करने वाले इंटरनेट यूजर को गिरफ्तार करने की कार्रवाई को कांग्रेस शासित पुडुचेरी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में जायज ठहराया है। सरकार ने सर्वोच्च अदालत से कहा है कि सीबीसीआई पुलिस ने जांच में पाया कि आरोपी का इरादा आपराधिक, जानबूझकर आपत्तिजनक और गलत संदेश ट्विटर पर लिखने का था ताकि इसके जरिए केंद्रीय मंत्री और उनके परिजनों को जनता में बेइज्जती हो।

सर्वोच्च अदालत में पुडुचेरी सरकार की ओर से दाखिल किए गए हलफनामे में कहा गया है कि आरोपी राम श्रीनिवासन ने केंद्रीय मंत्री और उनके परिजनों के खिलाफ सोशल मीडिया में अभियान चला रखा था। इस दौरान उसकी शिकायत मंत्री के पुत्र की ओर से की गई।

शुरुआती जांच के बाद उसके खिलाफ सूचना एवं प्रौद्योगिकी कानून की धारा 66ए के तहत मामला दर्ज किया गया। इसके बाद उसे गिरफ्तार किया गया और उसी दिन निचली अदालत  से उसे जमानत प्रदान कर दी गई। हलफनामे में कहा गया है कि इस कार्रवाई में किसी भी तरह से कानून का उल्लंघन नहीं किया गया है। केंद्र शासित सरकार की ओर से इस मामले में नागरिक अधिकारों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं किया है।


पुडुचेरी सरकार ने कहा है कि आईटी एक्ट की धारा 66-ए असंवैधानिक नहीं है, क्योंकि इसके जरिए सोशल मीडिया में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित नहीं किया गया है। लेकिन समाज में गलत, आक्रामक, आपत्तिजनक और अफवाह फैलाने वाले संदेशों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए किया गया है।

यदि इस प्रावधान को हटा दिया जाएगा तो सोशल मीडिया में गलत संदेशों की बाढ़ आ जाएगी और ऐसे में इन पर काबू करना मुमकिन नहीं रह जाएगा।

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