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क्या रॉबर्ट वाड्रा कांग्रेस के लिए बोझ बन गए हैं?

Thu, 01 May 2014 05:11 PM IST
रशीद क़िदवई/राजनीतिक विश्लेषक, बीबीसी के लिए
रशीद क़िदवई/राजनीतिक विश्लेषक, बीबीसी के लिए Updated Thu, 01 May 2014 05:11 PM IST
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robert vadra is a problem for the congress?

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद और प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वाड्रा क्या इन चुनावों में कांग्रेस के लिए 'बोझ' बन गए हैं? पारंपरिक ढंग से सोचें तो इसका जवाब हां में आएगा। लेकिन नज़दीक से और बारीकी से देखने पर कई संभावनाएं नज़र आती हैं।

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वाड्रा के विवादित व्यापारिक सौदों के ब्यौरों ने कांग्रेस के लिए मुश्किलें पैदा की हैं और इसकी जीत की संभावनाओं को और कम किया है। लेकिन चुनाव प्रचार में वाड्रा का नाम आने से प्रियंका गांधी को सक्रिय राजनीति में आना पड़ा है।
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अगर वह 16 मई के बाद आधिकारिक रूप से इसमें उतर जाती हैं तो इससे कांग्रेस को कुछ करिश्मा, संघर्ष की शक्ति और भविष्य की जंग के लिए नए अवसर हासिल होंगे। इस तरह वाड्रा विवाद इस पुरानी पार्टी के लिए बोझ या नुक़सान क़त्तई नहीं है।

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'दामादजी' के लिए असमंजस

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यह पूरा मामला शुरू हुआ था भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के वाड्रा के व्यापारिक सौदों के ब्यौरे का मामला उठाने से। मोदी ने वाड्रा को 'दामादजी' कहकर संबोधित किया और कहा कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन या यूपीए के 10 सालों से फ़ायदा उठाने वाले 'आरएसवीपी' (राहुल, सोनिया, वाड्रा, प्रियंका) हैं।

वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं में इसे लेकर असमंजस था कि पार्टी को प्रियंका गांधी के पति के बचाव में उतरना चाहिए या उन्हें एक 'प्राइवेट सिटिज़न' के रूप में छोड़ देना चाहिए।

याद रहे कि जब आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने पहली बार वाड्रा के एक जाने-माने उद्योगति की मदद से भारी पैसा कमाने का आरोप लगाया था तो कांग्रेस के कई मंत्री और पार्टी प्रवक्ता सोनिया गांधी के दामाद के बचाव में उतर गए थे।

वाड्रा को लेकर रही बड़ी खामोशी

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पांच अक्तूबर, 2012 की शाम को तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी, केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयंती नटराजन और हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने बयान जारी किए।

केंद्रीय क़ानून मंत्री सलमान ख़ुर्शीद तो 'टाइम्स नाऊ' के 'न्यूज़आवर' कार्यक्रम में शामिल हुए और कहा, "वह हमें सुबूत उपलब्ध करवाएं जिसकी संबंधित संस्थाओं और अदालत से पुष्टि हो और तभी ऐसे आरोप लगाए जाएं।"

लेकिन अगले ही दिन मंत्री जल्द ही पीछे हट गए। संभवतः 10 जनपथ, सोनिया गांधी के निवास, से कहा गया कि सरकार और पार्टी को वाड्रा का बचाव करने की ज़रूरत नहीं है।

और अगली बार 10 अक्तूबर, 2012 को इंडिया अगेंस्ट करप्शन (आईएसी) के बैनर तले जब केजरीवाल ने वाड्रा पर फिर आरोप लगाए तो कांग्रेस के नेताओं ने मरघट सी शांति ओढ़ ली। वाड्रा को 'प्राइवेट सिटिज़न' यानि कि ऐसा व्यक्ति बताया गया जिसका सरकार या पार्टी से कोई लेना-देना नहीं है।

प्रियंका ने तोड़ी खामोशी

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लेकिन अभी जारी चुनावों में वाड्रा पर जारी भ्रम की स्थित जल्द ही ख़त्म हो गई जब प्रियंका ने अपनी ख़ामोशी तोड़ी। अमेठी और रायबरेली में प्रियंका ने आरोप लगाया कि उनके परिवार और पति को बीजेपी जबरन घसीट रही है और परेशान कर रही है।

कई लोग सोचते हैं कि वाड्रा गांधी परिवार के लिए इतना महत्वपूर्ण कैसे हो गए कि वह उनके लिए अपनी प्रतिष्ठा और परिवार के नाम पर आंच आने दे रहे हैं? मेरे ख़्याल से इसकी दो वजहें हैं।

सबसे पहले हम एक नज़र अब तक की घटनाओं पर डाल लेते हैं जिससे यह साफ़ हो जाएगा कि सोनिया, राहुल और प्रियंका वाड्रा को पूरी तरह क्यों बचा रहे हैं।

पीतल व्यापारी के बेटे थे वाड्रा

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1997 में जब प्रियंका के वाड्रा से शादी की ख़बर सामने आई तो बहुत से लोग प्रियंका कि पसंद को लेकर अचंभित थे। वाड्रा मुरादाबाद के एक पीतल व्यापारी के बेटे थे।

ब्रितानी स्कूल से ए-लेवल पास करने बाद वाड्रा कॉलेज तक नहीं गए थे और उनके कुछ नज़दीकी रिश्तेदारों का राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ या आरएसएस से नज़दीकी रिश्ता था जिसे उन लोगों की तरफ़ से ज़मीन और संपत्ति तक दान में मिली थी।

लेकिन सोनिया गांधी के लिए प्रियंका की रॉबर्ट से शादी परिवार की परंपरा का ही विस्तार था। जवाहरलाल नेहरू और कमला नेहरू, इंदिरा और फ़िरोज़, संजय और मेनका में बहुत कम बातें समान बातें थीं। और राजीव और सोनिया तो महत्ता और सामाजिक दायरे के लिहाज़ से पूरी तरह जुदा थे।

तब सोनिया ने कहा था, "हमारा परिवार इससे अलग नहीं हो सकता था।"

'दामादजी' के व्यापारिक लेन-देन की चेतावनी

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प्रियंका की रॉबर्ट से शादी के कुछ महीनों के अंदर ही सोनिया अपने दामाद को काफ़ी पसंद करने लगीं। वह सीधे-सादे थे लेकिन बेहद आत्मविश्वासी। रॉबर्ट गांधी परिवार की शक्ति से मोहित नहीं थे।

बहुत कम लोग ही वाड्रा की 'पिंक ट्राउज़र्स' को भूल सकते हैं जो उन्होंने उस उस दिन पहनी थी जब वह 10 अप्रैल, 2014 को प्रियंका गांधी के साथ वोट डालने गए थे जबकि वो पूरी तरह जानते थे कि सैकड़ों कैमरे वहां तस्वीरें लेने के लिए मौजूद रहेंगे।

लेकिन वाड्रा की कपड़ों की पसंद गांधी परिवार के लिए चिंता का अंतिम विषय होगा। लोगों की नज़रों से दूर 2002 की जनवरी में सोनिया गांधी ने पार्टी नेताओं को चेता दिया था कि वह वाड्रा के रिश्तेदारों से कोई भी 'व्यापारिक लेन-देने' न करें।

सोनिया गांधी को कथित रूप से यह असामान्य क़दम उन बहुत सी शिकायतों के बाद उठाना पड़ा जिनमें कहा गया था कि वाड्रा के रिश्तेदार उनके दामाद के नाम का 'दुरुपयोग' कर रहे हैं। कहा गया कि रॉबर्ट के अपने भाई, बहन और पिता से काफ़ी बहस भी हुई।

धोखाधड़ी रोकने के लिए विज्ञापन

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आख़िरकार चार जनवरी, 2002 को रॉबर्ट ने एक वकील अरुण भारद्वाज के माध्यम से टाइम्स ऑफ़ इंडिया में एक विज्ञापन प्रकाशित करवाया।

इसमें लिखा था, "मेरे मुवक्किल को पता चला है कि कुछ लोग, जिनमें राजेंद्र वाड्रा (रॉबर्ट के पिता, जो अब ज़िंदा नहीं हैं), सी-7, अमर कॉलोनी निवासी और रिचर्ड वाड्रा (रॉबर्ट के भाई, वह भी अब ज़िंदा नहीं हैं), बसंत विहार कॉलोनी, सिविल लाइन्स, मुरादाबाद निवासी लोगों को यह धोखा दे रहे हैं कि वह मेरे मुवक्किल के लिए काम कर रहे हैं। और कथित रूप से पैसे के एवज़ में नौकरी और अन्य फ़ायदों का वायदा कर रहे हैं।"

"हालांकि राजेंद्र वाड्रा और रिचर्ड वाड्रा मेरे मुवक्किल के रिश्तेदार हैं लेकिन उनका मेरे मुवक्किल से संपर्क नहीं है। इस सभी लोगों को यह सूचना दी जाती है कि मेरे मुवक्किल ने राजेंद्र वाड्रा और रिचर्ड वाड्रा और किसी और को किसी भी तरह से अपना नाम इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी है। ऐसा धोखा मेरे मुवक्किल की सहमति और जानकारी के बिना दिया जा रहा है।"

वाड्रा का परिवार बहुत नाराज़ हो गया। राजेंद्र वाड्रा ने गांधी परिवार पर अपने बेटे को 'छीन लेने' का आरोप लगाया। घरेलू कलह, मानहानि के दावे और क़ानूनी नोटिस सार्वजनिक हो गए। यह मुश्किल समय था और सोनिया ने वाड्रा को बहुत भावनात्मक मदद की।

नेहरू-गांधी परिवार में भरोसा

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दूसरी वजह यह है कि गांधी परिवार के साथ ही कांग्रेसियों में भी यह अहसास बढ़ रहा है कि वाड्रा के व्यापारिक लेन-देन भले ही अनुचित हों लेकिन उनमें ग़ैरक़ानूनी कुछ भी नहीं है। 'उचित' और 'क़ानूनी' के बीच का अंतर बहुत महत्वपूर्ण है।

आज की भारतीय राजनीति में, उचित, अब मुद्दा नहीं रह गया है। क्षेत्रीय नेताओं को देखें - मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, मायावती, जगन मोहन रेड्डी, जे जयललिता और अन्य। क़रीब-क़रीब सब पर ही आय से अधिक संपत्ति का मामला है और अमित शाह, एल के आडवाणी, शिबू सोरेन समेत कई अन्य पर आपराधिक मामले हैं।

पार्टी के वफ़ादारों से नैतिकता और औचित्य के सवाल उठाने की उम्मीद नहीं की जाती। ऐसे माहौल में कांग्रेसियों से परिवार के प्रति वफ़ादारी दिखाने के लिए वाड्रा का साथ देने की उम्मीद की ही जाती है।

प्रियंका निभा सकती हैं विपक्ष की भूमिका

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आज की तारीख़ में कांग्रेस में प्रियंका गांधी की मौजूदगी 16 मई के बाद के परिदृश्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। कांग्रेस नेतृत्व का आकलन है कि पार्टी का साधारण कार्यकर्ता 2004 और 2009 की जीत के बाद नेहरू-गांधी परिवार में पूरा भरोसा रखता है और विद्रोह की गुंजाइश कम ही है।

इसके अलावा पार्टी में ऐसा कोई नेता मुश्किल से ही नज़र आता है जिसकी पूरे भारत में पहचान हो और जो सोनिया, राहुल और प्रियंका की तरह भीड़ खींचने या पार्टी को एकजुट रखने में सक्षम हो। इसके बदले में कांग्रेसियों को रॉबर्ट वाड्रा का बचाव करने से पीछे नहीं हटना होगा। अगर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में नई सरकार उनके पीछे पड़ती है तो।

कांग्रेस की योजनाओं में 'प्रियंका प्रारूप' 16 मई के बाद और तीखा होने वाला है। अब तो कांग्रेसी, ख़ासतौर पर पुराने नेता बातें करने लगे हैं कि एक गांधी को संसदीय शाखा का नेतृत्व (विपक्ष के नेता की भूमिका) करना चाहिए और दूसरे को पार्टी संगठन को देखना चाहिए।

मुलायम सिंह को मिल सकता है 'खास ओहदा'

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बादल परिवार, मुलायम सिंह यादव, एम करुणानिधि, अजीत सिंह और भुट्टो परिवार में एक से ज़्यादा पारिवारिक सदस्यों के पार्टी के महत्वपूर्ण पदों पर आसीन होने को शानदार उदाहरण के रूप में पेश किया जा रहा है।

पार्टी के वरिष्ठ नेता कहते हैं कि अगर नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन गए तो पार्टी के ये नेता प्रियंका गांधी पर और दबाव डाल सकते हैं कि वह सक्रिय राजनीति में शामिल हों ताकि 'एकता' और भारत के जिस 'विचार' को जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ने सामने रखा उसे ज़्यादा ऊर्जा के साथ बचाया जा सके।

प्रियंका का मुद्दा इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि एक सवाल यह भी है कि क्या सोनिया गांधी ने अपनी बेटी के बजाय राहुल को आगे करके ग़लती कर दी है? पार्टी में ऐसे लोगों की कमी नहीं जो व्यक्तिगत रूप से इस पर यक़ीन करते हैं।

कुछ लोग कहते हें कि इसकी वजह सोनिया का इतालवी कैथोलिक सांस्कृतिक इतिहास है जिसमें भारत की तरह लड़कों को ज़्यादा महत्व दिया जाता है। लेकिन सही बात यह है कि एक मां के रूप में सोनिया हमेशा इसे लेकर सचेत रही कि प्रियंका गांधी की प्राथमिक ज़िम्मेदारी अपने दो बच्चों की परवरिश करना है।

अब चूंकि उनके बच्चे बड़े हो गए हैं इसलिए प्रियंका आसानी से अपने भविष्य के बारे में फ़ैसला ले सकती हैं।

अगर पार्टी नेताओं को अपनी नाकामी पर पर्दा डालने में मदद मिले तो 'प्रियंका लाओ' अभियान ज़ोर पकड़ सकता है। हालांकि यह देखना होगा कि खुद प्रियंका इन 'प्रस्तावों' इन प्रस्तावों पर कैसे प्रतिक्रिया करती हैं।

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