क्या सचमुच अरविंद केजरीवाल अराजकतावादी हैं?
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हमारे सबसे बेहतरीन राजनीतिक वक्ता हैं और ऐसे व्यक्ति हैं जो किसी भी मुद्दे को बहुत शानदार ढंग से छोटा कर के पेश कर देते हैं।
दिल्ली चुनावों के प्रचार करते हुए उन्होंने आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल के प्रदर्शन का आकलन किया। मोदी ने कहा कि चूंकि केजरीवाल ने यह स्वीकार किया कि वो एनार्किस्ट या अराजकतावादी हैं, इसलिए उन्हें नक्सलियों से जा मिलना चाहिए।
मोदी ने आगे कहा, "हमें यहां विकास चाहिए, एनार्की नहीं। वो धरना देने में माहिर हैं। हम शासन चलाने में माहिर हैं।" तो सवाल उठता है कि ये 'एनार्किस्ट' क्या है और क्या केजरीवाल उनमें से एक हैं?
पढ़ें पूरा विश्लेषण
मेरे पास मौजूद डिक्श्नरी कहती है कि इस शब्द का मूल यूनानी है और इसका मतलब होता है नेता विहीन राज्य। एनार्की की आधुनिक परिभाषा में राज्य, यानी सरकार का सबसे प्रमुख औजार, गायब है।
1970 के दशक में यूरोप में रेड आर्मी फ़ैक्शन जैसे कई हिंसक समूह थे। इनमें से अधिकांश समूहों के सदस्य एनार्की को अपना लक्ष्य मानते थे।
क्या केजरीवाल यही चाहते हैं?
पिछले साल जनवरी में, जब वो मुख्यमंत्री थे तो पुलिस के ख़िलाफ़ अपनी मांगों को लेकर दिल्ली में धरने पर बैठ गए थे। उस समय जब उनपर मीडिया में सवाल खड़े किए गए तो उन्होंने खुद के एनार्किस्ट होने की घोषणा की थी।
उस समय टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने इस मामले की पड़ताल की थी और विशेषज्ञों से बात की थी और नतीजा निकाला था कि केजरीवाल असल में कोई एनार्किस्ट नहीं हैं।
केजरीवाल की डायरेक्ट डेमोक्रेसी
इन विशेषज्ञों में से एक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के विधु वर्मा ने कहा था, "बहुत सारी चीजें, जो वो कर रहे हैं, उससे एनार्की पैदा हुई है, लेकिन इससे यह तय नहीं हो जाता कि वो एनार्किस्ट हैं।"
एक अन्य राजनीति शास्त्र के जानकार इम्तियाज़ अहमद ने कहा था, "मुझे तो लगता है कि केजरीवाल पुरानी व्यवस्था की जगह एक नई व्यवस्था लाने की कोशिश कर रहे हैं, जो ज़्यादा कल्याणकारी होगा।"
जनमत संग्रह
उन्होंने कहा था, ''इसका मतलब यह नहीं है कि वो पूरी की व्यवस्था को ख़ारिज़ कर रहे हैं, बस वो मौजूदा व्यवस्था में बदलाव लाना चाहते हैं। वो केवल उस व्यवस्था को खारिज़ करते हैं जिसमें हम सब अभी तक रहते आए हैं।"
तो फिर, असल में यह विचार है क्या? केजरीवाल इसे 'खुला लोकतंत्र या डायरेक्ट डेमोक्रेसी' कहते हैं। डायरेक्ट डेमोक्रेसी क्या है यह जानने के लिए हमारे पास यूनान है क्योंकि डायरेक्ट डेमोक्रेसी वहाँ थी। अरस्तू ने 'एथेंस के संविधान' में इसका वर्णन किया था। डायरेक्ट डेमोक्रेसी में हर फ़ैसला, चाहे यह मंत्रियों का हो या अफ़सरों का, सीधे जनमत संग्रह से लिया जाता था, जैसा केजरीवाल चाहते हैं।
जनमत संग्रह
आज मंत्री और नौकरशाह जो करते हैं उसकी जगह चीजों को जनमत संग्रह के द्वारा तय किया जाएगा। एथेंस में डायरेक्ट डेमोक्रेसी थी क्योंकि वहां सिर्फ 50,000 नागरिक थे और काफ़ी एक जैसे थे। लेकिन यहां भी कुछ ही लोग अपना वोट डालते थे, क्योंकि हर नागरिक के लिए रोज-रोज वोट डालना व्यावहारिक नहीं था।
बारी बारी से मोहल्ले वोट डाला करते थे। वोट डालने वाले एक बर्तन में किसी अंक या रंग को चुन कर अपनी राय देते थे। सभी नागरिक बराबर थे और एक बराबर योग्य थे।
जिक्र प्लेटो के संवादों में मिलता है
अरस्तू ने साफ़ किया था कि किस तरह सरकारी कर्मचारी, सेना के जनरल और अदालतों के ज्यूरी (तब जज नहीं हुआ करते थे) चुने जाते थे।
समस्याएं
इस तरीक़े से सुकरात को एक परेशानी थी। वो हमेशा कहते थे "क्या तूफ़ान में आप एक जहाज के कप्तान को भी इसी तरह चुनेंगे।" इसका उत्तर साफ़ तौर पर 'नहीं' है। इस बात का जिक्र प्लेटो के संवादों में मिलता है।
आधुनिक राज्य में विदेश संबंधी मामला, विशेषज्ञ के हिस्से है, न कि किसी आम जनता की राय के। यह इसलिए है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय संबंध तलवार की धार पर चलते है उन पर कोई क़ायदा क़ानून नहीं चलता है।
अर्थव्यवस्था चलाने के लिए विशेषज्ञों की ज़रूरत होती है, आम राय की नहीं। ब्याज़ दरें, टैक्स और बजट घाटे लोकप्रियता के आधार पर तय नहीं किए जा सकते।
और ना ही, इनकम टैक्स और इसे वसूलने के तरीके ही जनता से पूछ कर तय किए जा सकते हैं, ख़ासतौर पर जहां नैतिकता का स्तर बहुत ही नीचा हो और टैक्स चोरी आम हो।
आम राय की अहमियत
अगर मेरी याददाश्त ठीक है तो केजरीवाल ने कड़े नोटिस के बाद, अपने करों का खुद देरी से भुगतान किया था। डायरेक्ट डेमोक्रेसी के साथ एक दिक्कत और है। ये उत्तेजक भाषणबाजी और भीड़ के जुनून से बहुत प्रभावित होती है। यो चीज़ें भारत में बहुत जल्द पैदा की जा सकती हैं।
हास्य नाटकों के लेखक एरिस्टोफ़ेन्स का एक पसंदीदा किरदार था, उत्तेजक भाषण देने वाला क्लीयोन। जो स्पार्टा के साथ बर्बाद कर देने वाले युद्ध चलाने के लिए एथेंस पर दबाव डालते रहते थे।
आम राय की अहमियत
दूसरी बात है कि लोकतांत्रिक राय हमेशा ही अचूक नहीं होती। 406 ईसा पूर्व आर्गीनूसी के युद्ध के बाद एथेंसवासियों ने गुस्से में किए गए एक मतदान के बाद अपने ही जनरलों को फांसी पर चढ़ा दिया था। इस तथ्य को रिकॉर्ड करने वाले मिशनरी और इतिहासविद ज़ेनोफ़ोन ने कहा था कि इसके बाद एथेंसवासियों को अपने किए पर बहुत अफ़सोस हुआ।
सुकरात ने भी युद्ध में लड़ाई की थी और नागरिक मतदाताओं की क्रूरता से वो भी प्रभावित हुए थे। वो लगातार सवाल उठाते रहे कि क्या डायरेक्ट डेमोक्रेसी में कोई अच्छाई है, इस बात से सत्ता में रहने वालों पर क्रोधित होते थे और उनपर मुकदमा भी चलाया गया। अखिर में कुछ सौ एथेंसवासीयों की ज्यूरी ने सुकरात को दोषी ठहराया और ज़हर पीकर आत्महत्या करने का हुक्म दिया।
सुकरात का मत
उनके ख़िलाफ़ नौजवानों को भ्रष्ट करने का आरोप था। लेकिन लेखक आईएफ़ स्टोन अपने 'ट्रायल ऑफ़ सोक्रेटीज़' ने दिखाया है कि असल में यह सज़ा डायरेक्ट डेमोक्रेसी का विरोध करने के लिए दी गई थी। अंततः, हर किसी का डायरेक्ट डेमोक्रेसी से मोहभंग हो गया और इसके परिणाम स्वरूप पूरा इतिहास बदल गया।
अरस्तू सिकंदर के गुरु हो गए, जिसने थीब्स और एथेंस में बचे खुचे लोकतंत्र को भी ख़त्म कर दिया था। इसके बाद सिकंदर ने तुर्की, मिस्र, सीरिया, फ़लस्तीन, इज़राइल, इराक़, अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया के कई देशों को जीता। सदियों तक ये देश औपनिवेश बने रहे। सिकंदर के विजय अभियान का अंत पंजाब में हुआ।
प्लेटो खुद डायरेक्ट डेमोक्रेसी से उतनी नफ़रत करते थे, जितना सुकरात करते थे। उन्हें भीड़ के विवेक पर कोई भरोसा नहीं था।
आशंका
उनका 'रिपब्लिक' (गणतंत्र) डायरेक्ट डेमोक्रेसी का उल्टा था। एक ऐसा नाज़ी स्टाइल का तानाशाही राज्य, जिसमें व्यक्तिगत आज़ादी या यहां तक कि कविता के लिए भी कोई जगह नहीं थी। उनकी अंतिम क़िताब, 'लॉज़' थोड़ी नरम थी और कम सर्वसत्तावादी थी। यह उनकी एकमात्र क़िताब है जिसमें सुकरात का ज़िक्र तक नहीं है।
दुनिया में लोकतंत्र की सभी व्यवस्थाओं को आजमाया गया और वो सभी असफल रहीं। केवल चुने हुए प्रतिनिधियों वाली व्यवस्था चली और ये व्यवस्था भारत में है। हो सकता है कि केजरीवाल अराजकतावादी न हों, अगर उनके विचार पूरी तरह से लागू किए गए संभव है कि वो एनार्की जैसी अव्यवस्था पैदा कर दें।