क्या पहले अंतर्राष्ट्रीय दौरे पर फेल हुए मोदी?
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क्या पहले अंतर्राष्ट्रीय मोर्चे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फेल हो गए? ये सवाल इसलिए क्योंकि ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए पहुंचे प्रधानमंत्री मोदी के इस दौरे में कई ऐसी कूटनीतिक खामियां देखने को मिली।
इस शिखर वार्ता के दौरान अंतर्राष्ट्रीय मोर्चे पर खुद को साबित करने का मोदी के पास के पास खास मौका था। दुनियाभर की निगाहें मोदी पर टिकी हुई थी।
सभी को उम्मीद थी कि बहुपक्षीय कूटनीति के क्षेत्र में पीएम मोदी कुछ खास जरूर करेंगे। लेकिन मोदी को इस दौरे के दौरान कई खामियों से दो-चार होना पड़ा। जिसने उनके दौरे की उपलब्धियों पर सवाल खड़े कर दिए।
बर्लिन क्यों गए प्रधानमंत्री मोदी?
इसकी शुरूआत तभी से हुई जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस दौरे के लिए रवाना हुए। इस दौरान मोदी शिखर वार्ता के लिए सीधे ब्राजील न जाकर बर्लिन उतरे।
जहां रविवार को उनकी योजना जर्मनी की चांसलर एंजेला मार्केल के साथ डिनर करने की थी। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी और उनकी टीम को ये अंदाजा नहीं था कि जर्मन चांसलर इस समय बर्लिन में हैं ही नहीं। उस समय जर्मन चांसलर मार्केल ब्राजील में फीफा वर्ल्ड कप का लुत्फ उठा रही थी।
यानी पहले ही मोर्चे पर भारत के लिए ये बड़ा झटका था। इस घटना से उन भारतीय अधिकारियों पर भी सवाल खड़े होते हैं, जिन्होंने इस ओर ध्यान ही नहीं दिया।
उन्हें ये ध्यान रखना चाहिए था कि इतने बड़े मुकाबले में अपनी टीम का हौंसला बढ़ाने जर्मन चांसलर वहां जा सकती हैं। अगर इस ओर अधिकारियों ने ध्यान दिया होता तो शायद भारत अंतर्राष्ट्रीय मीडिया के सामने पहले मोर्चे पर फेल नहीं होता।
पुतिन ने मोदी को क्यों कराया इंतजार?
इसके बाद दूसरी घटना उस समय सामने आई जब रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ तय मुलाकात टालनी पड़ी।
'द टेलिग्राफ' समाचार पत्र में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिन पिंग की मुलाकात मोदी-पुतिन बैठक के बाद होनी थी। लेकिन पुतिन उस बैठक के लिए फोर्टलेजा आए ही नहीं क्योंकि वह 1600 किलोमीटर दूर ब्रासीलिया में ब्राजील की राष्ट्रपति डिल्मा रूसेफ के साथ बैठक कर रहे थे जो तय समय से दो घंटे ज्यादा चली।
दूसरी ओर पीएम मोदी इंतजार ही करते रह गए। इस बीच मोदी और पुतिन के बीच बैठक का समय बदलने की भी कोशिश की गई, लेकिन उसमें भी भारतीय अधिकारियों को खास कामयाबी नहीं मिली। हालांकि, किसी तरह से मंगलवार को दोनों नेताओं के बीच 40 मिनट की मुलाकात हो सकी।
दबाव बनाने की रूस की रणनीति
इस घटना से ऐसे सवाल उठे कि क्या रूस ने जानबूझकर भारत को इंतजार तो नहीं कराया?
कम से कम 'द टेलिग्राफ' में छपी रिपोर्ट तो यही कहती है कि भारतीय जानकारों का एक खेमा ऐसा मान रहा है कि पुतिन जानबूझ कर मुलाकात के लिए नहीं पहुंचे। जबकि उन्हें पता था कि भारतीय प्रधानमंत्री उनका इंतजार कर रहे हैं।
इस घटना से सवाल ये भी उठ रहा है कि कहीं यह रूस की ओर से भारत के लिए कोई संदेश देने की कोशिश तो नहीं है?
दरअसल इस मुलाकात को लेकर कई सवाल हैं जिनमें अहम है दोनों देशों के बीच कई लाख डॉलर की प्रस्तावित हाईड्रोकॉर्बन पाइपलाइन की। इसके साथ ही यूक्रेन के मुद्दे पर भी रूस ने भारत से सहयोग देने का दबाव बनाने की लिए किया होगा।
ब्रिक्स बैंक का मुख्यालय भी गया चीन
इसके अलावा शिखर वार्ता के दौरान ब्रिक्स बैंक बनाने के ऐलान में भी भारत को कोई खास कामयाबी हाथ नहीं लगी। हालांकि इस बैंक का पहला अध्यक्ष भारतीय होगा लेकिन बैंक का मुख्यालय चीन अपने यहां ले जाने में कामयाब रहा।
इन सबके बीच दौरे के शुरू में मोदी के जर्मनी जाने से जापान के नाराज होने का भी जोखिम बढ़ गया है। ऐसा इसलिए क्योंकि भारतीय प्रधानमंत्री जर्मनी की चांसलर एंजेला मार्केल से मुलाकात की जल्दी में ये भूल गए कि उन्होंने जापान के प्रधानमंत्री शिंजो एबे से पहली द्विपक्षीय वार्ता की बात कही थी।
यानी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस विदेश दौरे पर कई ऐसी खामियां देखने को मिली, जिससे साबित होता है कि कहीं न कहीं मोदी पहले कूटनीतिक मौके पर लड़खड़ा से गए।