फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   is bjp is on the rajiv government way

क्या राजीव सरकार जैसा होगा भाजपा का हाल?

Sun, 12 Jul 2015 02:27 PM IST
उर्मिलेश/वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए
उर्मिलेश/वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए Updated Sun, 12 Jul 2015 02:27 PM IST
विज्ञापन
is bjp is on the rajiv government way

जनतंत्र में जब कभी सत्ता परिवर्तन होता है और नई पार्टी बड़े बहुमत से सरकार बनाती है तो मतदाताओं को उससे ज़्यादा उम्मीदें होती हैं।

लोग नई सरकार को पिछली सरकार के अच्छे-बुरे कामों से तुलना करके आंकते हैं। भारतीय जनता पार्टी के साथ भी ऐसा ही हुआ है।

विज्ञापन

याद दिला दें, 1984 के अंत में प्रचंड बहुमत से सत्ता में आई राजीव गांधी की सरकार से भी लोगों ने भारी उम्मीदें लगा रखी थीं, लेकिन महज दो साल बाद उनके ख़िलाफ़ पार्टी और बाहर सियासी बगावत सी शुरू हो गई।

सियासी भंवर में क्यों फंसी भाजपा?

is bjp is on the rajiv government way

मौजूदा सरकार के साथ फ़िलहाल वैसी स्थिति नहीं है और विपक्ष के पास वीपी सिंह जैसा दमदार नेता भी नहीं है। पर तेरह महीने के अंदर सरकार की छवि अकल्पनीय ढंग से प्रभावित हुई है।

शीर्ष मंत्रियों-नेताओं और भाजपा-शासित राज्यों के कुछ मुख्यमंत्रियों पर गंभीर सवाल उठे हैं।आख़िर भाजपा इस तरह के सियासी भंवर में क्यों फंसी?

भाजपा को राजनीतिक भंवर मे फंसाने के लिए सिर्फ विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, मानव संसाधन मंत्री स्मृति जुबिन ईरानी, राजस्थान की मुख्यमत्री वसुंधरा राजे या मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को ज़िम्मेदार ठहराना सही नहीं होगा।

विज्ञापन
विज्ञापन

अपराधिक लोगों को मिल रहा संरक्षण

is bjp is on the rajiv government way

केंद्र और राज्य के कई और ओहदेदारों पर भी आरोप लगे हैं. अभी किसी पर आरोप साबित नहीं हुए पर इन नेताओं के बारे में जन-धारणा में बदलाव साफ देखा जा सकता है।

व्यापमं की आपराधिक-व्यापकता सारे पुराने कीर्तिमान तोड़ती नज़र आती है। यह पहली बार नहीं है कि भाजपा का कोई बड़ा नेता किसी विवादास्पद थैलीशाह (ललित मोदी) को गैर-वाजिब ढंग से मदद देता नज़र आया।

कुछ साल पहले सुषमा स्वराज पर कर्नाटक के रेड्डी बंधुओं को संरक्षण देने का आरोप लगा था। इस तरह के आरोप विभिन्न प्रदेशों में अन्य पार्टी नेताओं पर भी लगते रहे। आपराधिक पृष्ठभूमि या अपराधियों के संरक्षण के कुछ आरोपी तो मंत्री भी बने।

विज्ञापन

कांग्रेस की राह पर!

is bjp is on the rajiv government way

घोटालों से घिरी कांग्रेस पर सबसे ज़्यादा ‘गोले’ दागने वाली भाजपा से अपेक्षा थी कि वह अलग ‘चाल-चरित्र-चेहरे’ का प्रदर्शन करेगी। लेकिन, व्यावहारिक-राजनीति और शासकीय कामकाज के स्तर पर भाजपा ने अपने लिए कांग्रेस से अलग कोई ढांचा नहीं बनाया।

ठेके-आबंटन-नियुक्तियां और चुनावी-राजनीति में वैसा ही खर्चीला खेल जारी है। हमारे जैसे जनतंत्र की यह बड़ी सच्चाई है कि पार्टियों-नेताओं को बड़ी चुनावी कामयाबी के लिए छोटे-बड़े समझौते और तमाम गड़बड़झाले करने पड़ते हैं।

आज क़ामयाब और ताक़तवर नेता का मतलब है, ‘संसाधन’ जुटाने में कुशल नेता! अगर उसके पास जनता को रिझाने हो तो तो सोने में सुहागा।देखते-देखते भाजपा के कई नेता अपने-अपने इलाक़ों और फिर राष्ट्रीय स्तर पर ताक़तवर कैसे बने?

तल्खी!

is bjp is on the rajiv government way

ऐसे नेताओं ने संसाधन के मामले में पार्टी के अंदर अपने तमाम प्रतिद्वन्द्वियों को पीछे छोड़ा। यही कारण है कि पार्टी के कई नेता विवादास्पद के बावजूद अपने-अपने क्षेत्र में शीर्ष पर आ गए।

अस्सी के दशक में छोटे-बड़े चंदों और कार्यकर्ताओं के बल पर चुनाव लड़ने वाली पार्टी ने बाद में ‘कॉरपोरेट-समर्थन’ के मामले में कांग्रेस को पीछे छोड़ दिया।चुनाव और दलों पर शोधपरक काम करने वाली गैर सरकारी संस्था ‘एडीआर’ के आंकड़ें भी इस बात की पुष्टि करते हैं।

भूमि अधिग्रहण अध्यादेश और अन्य विवादास्पद फ़ैसलों के चलते मोदी सरकार पर ‘कॉरपोरेट-पक्षधरता’ का भी आरोप लगा है।केएन गोविंदाचार्य जैसे पूर्व पार्टी-रणनीतिकार इसकी व्याख्या अपने ढंग से कर रहे हैं।

कभी कभार आपत्ति दर्ज कराकर एमएम जोशी, आडवाणी और अरुण शौरी जैसे लोग खामोशी तोड़ते रहते हैं।

ललित मुद्दे पर पार्टी में मतभेद

is bjp is on the rajiv government way

कैबिनेट में होते हुए उमा भारती कुछ तल्ख दिखती हैं। शायद नेतृत्व को अंदाज नहीं था कि हाल के खुलासों से सिर्फ उनके कुछ मंत्रियों-मुख्यमंत्रियों की छवि ही नहीं चौपट होगी, दाग के छींटे पूरी पार्टी पर भी पड़ेंगे।

न खाएंगे, न खाने देंगे’ का नारा देने वाले प्रधानमंत्री मोदी की तरफ से उनके मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और अन्य प्रांतीय नेताओं पर लगे भ्रष्टाचार या कदाचार के गंभीर आरोपों पर सफाई नहीं आई।

ऐसे मतदाताओं को भी उनकी चुप्पी नागवार गुजरी, जिन्होंने सिर्फ मोदी के चलते भाजपा को वोट दिया।यह नारा ऐसे करोड़ों मतदाताओं को पसंद आया था, जो यूपीए-2 के दौरान हुए घोटालों से बहुत नाराज़ थे।

मानसून सत्र की चुनौती

is bjp is on the rajiv government way

जांच पूरी होने तक आरोपों में घिरे नेताओं से इस्तीफ़े लिए गए होते तो पार्टी और सरकार की छवि पर असर नहीं पड़ता, प्रधानमंत्री का क़द और बढ़ जाता।

पार्टी और सरकार के सामने अब बड़ी चुनौती है. गंभीर आरोपों-विवादों में फंसे अपने मंत्रियों-नेताओं के मामले में वह संसद के मॉनसून सत्र में विपक्षी बौछारों का कैसे सामना करेगी?

मई, 2014 से पहले, विपक्षी पार्टी के रूप वह जिस मापदंड पर तब की सत्ताधारी कांग्रेस को तौल रही थी, क्या सत्ता में आने के बाद स्वयं उसके लिए वे मापदंड प्रासंगिक नहीं रहे?

इस तरह के सवाल पार्टी और सरकार के नेतृत्व से लगातार किए जाते रहेंगे. देखना होगा कि वे इसका कितना भरोसेमंद जवाब दे पाते हैं।

पार्टी और सरकार के सामने गंभीर चुनौती है, मॉनसून सत्र में विपक्षी बौछारों का सामना करना। देखना होगा कि इस चुनौती से सरकार कैसे निपटती है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed