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क्या भारत रत्न पर भी मास्टर स्ट्रोक लगा गए मोदी?

Fri, 26 Dec 2014 02:19 PM IST
Updated Fri, 26 Dec 2014 02:19 PM IST
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Is Bharat Ratna Modi's Master Stroke?

किसी शासन की पहचान इससे बनती है कि वह किस तरह की विचारधारा को बढ़ावा देता है और किन ऐतिहासिक शख्सियतों को नायक के रूप में पेश करता है। पद्मविभूषण, पद्मभूषण और पद्मश्री जैसे सम्मान आमतौर पर किसी व्यक्ति विशेष की उपलब्धियों और समाज के लिए उनके योगदान को सलाम करने के रूप में जाने जाते हैं।

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जहाँ तक 'भारत रत्न' की बात है तो कई दशक से इसे एक तरह के 'पोलिटिकल स्टेटमेंट' या राजनीतिक पहल के रूप में देखा-समझा जा रहा है। हर फ़ैसले से ये स्पष्ट होता है कि किसे उस फैसले के तहत अपनाया या सम्मानित किया गया और किसे बाहर रखा गया है। उसी तरह अटल बिहारी वाजपेयी और पंडित मदन मोहन मालवीय (मरणोपरांत) को 'भारत रत्न' देने के मोदी सरकार के फ़ैसले को भी व्यापक संदर्भ में देखना चाहिए।
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नरेंद्र मोदी सरकार बड़े और फैले हुए, लेकिन संकीर्ण विचारधारा वाले राजनीतिक समुदाय (संघ परिवार) का हिस्सा है। संघ परिवार को हमेशा से शिकायत रही है कि आज़ादी के बाद की सरकारों ने ब्रितानी हुकूमत के ख़िलाफ़ भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष को जैसे पेश किया है, उसमें 'हिंदू' नायकों के साथ न्याय नहीं हुआ है। संघ समर्थकों का ख़ासकर तथाकथित मार्क्सवादी इतिहासकारों पर आरोप रहा है कि उनके लेख हिंदूविरोधी पूर्वाग्रह से ग्रस्त रहते हैं।

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सावरकर मूर्ति विवाद

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इस संदर्भ में उस घटना को याद करने की ज़रूरत है जिसमें राजग सरकार (1998-2004) के समय संसद परिसर में वीर सावरकर की पोट्रेट लगाने पर विवाद हुआ था और तब वाजपेयी सरकार ने झुकने से इनकार कर दिया था। कुछ दशकों से संघ परिवार ने ऐसी कई ऐतिहासिक शख्सियतों और विचारधाराओं को आगे बढ़ाने का काम किया है जो नेहरूवादी सोच और मूल्यों के विरोध में खड़ा होने का माद्दा रखती हैं। यहां एक बात और...संघ परिवार का भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में योगदान का कोई ख़ास रिकॉर्ड नहीं रहा है।

गांधी और पटेल

इस कारण भगवा सोच अक्सर महात्मा गांधी को निशाना बनाती रही है। भगवा विचारधारा ब्रितानी औपनिवेशिक हुकूमत को उखाड़ फेंकने में गांधी की ऐतिहासिक भूमिका और हिंदू-मुस्लिम एकता की वकालत के लिए उन्हें निशाना बनाने की कोशिश करती रही है। महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के महत्व को कमतर आंकना भाजपा नेतृत्व के लिए कांग्रेस की ऐतिहासिक वैधता को कमज़ोर करने की उनकी पुरानी रणनीति का अहम हिस्सा है।

हाल ही में सरदार पटेल के बारे में मचा आधिकारिक हो-हल्ला भी नेहरूवादी सोच और विरासत से देश को दूर ले जाने की पुरानी नीति का ही हिस्सा है। इसलिए कोई हैरानी नहीं कि मोदी सरकार ने पहला मौका मिलते ही अटल बिहारी वाजपेयी और मदन मोहन मालवीय को 'भारत रत्न' देने का फ़ैसला किया है। ऐसे में दो तरह के गणित पर विचार करने की ज़रूरत है।

हिंदूवादी छवि

Is Bharat Ratna Modi's Master Stroke?

याद करें, वाराणसी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ते वक़्त नरेंद्र मोदी की छवि गढ़ने वालों ने कैसे पंडित मदन मोहन मालवीय (मरणोपरांत) की हिंदूवादी छवि को भुनाने की कोशिश की थी। महात्मा गांधी और नेहरू के विपरीत मालवीय जी को एक रूढ़िवादी हिंदू विचारधारा वाले व्यक्ति के रूप में देखा जाता रहा है।

'भारत रत्न' के लिए मालवीय जी का नाम आगे लाना लोकसभा चुनाव 2014 में उछाले गए हिंदू वोट को एकजुट करने की भाजपा की व्यापक नीति से मेल खाता है। वाराणसी चुनाव अभियान के अंतिम दौर में अरुण जेटली और अमित शाह ने चुनाव आयोग के ख़िलाफ़ विरोध दर्शाने के लिए बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के सामने मालवीय की प्रतिमा की जगह को चुना था।

मास्टर स्ट्रोक

'भारत रत्न' के लिए कलम चलाकर प्रधानमंत्री ने संघ परिवार की शिकायतों पर विराम लगा दिया है। वाजपेयी को भारत रत्न देने का फ़ैसला एक मास्टर स्ट्रोक की तरह है। इससे आडवाणी खेमे के वे लोग भी खुश हैं, जो वाजपेयी को सर्वोच्च सम्मान से नवाज़े जाने की वकालत करते रहे हैं। यह आडवाणी का वाजपेयी के राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में ख़ुद को पेश करने का एक तरीक़ा था। वाजपेयी गुजरात दंगों के बाद मोदी के इस्तीफे पर अड़ गए थे।

मोदी ने ऐसा करके उन उदारवादियों को भी खुश कर दिया, जो वाजपेयी की तरह मार्च-अप्रैल 2002 के गुजरात दंगों पर उनकी आलोचना करते रहे हैं। ये उदारवादी आज अपने मन को समझा सकते हैं कि अल्पसंख्यकों के प्रति तमाम पूर्वाग्रहों के बावजूद नई सरकार वाजपेयी के उदारवाद और विश्वसनीयता के लिए प्रतिबद्ध है। यह मान सकते हैं कि अगर वाजपेयी शारीरिक रूप से स्वस्थ होते तो उन्होंने अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ आजकल चल रही उग्र बयानबाज़ी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई होती।

नज़रअंदाज़

Is Bharat Ratna Modi's Master Stroke?

वैसे वाजपेयी के लिए 'भारत रत्न' का सम्मान विडंबना की तरह ही है। प्रधानमंत्री के रूप में वाजपेयी और संघ परिवार के बीच राम मंदिर मसले पर हमेशा तनातनी रही। और अब तो यह भी जगज़ाहिर है कि जब वाजपेयी गुजरात दंगों के बाद नरेंद्र मोदी के इस्तीफ़े पर अड़े, तो कैसे उनकी अपनी ही पार्टी ने उन्हें नज़रअंदाज़ कर दिया था। यही नहीं, यह उनके आजीवन सहयोगी आडवाणी के हाथों हुआ निरादर ही था, जिसके बाद उन्होंने दक्षिण एशिया में सुलह समीकरण के नए सिरे से प्रयास किए थे।

योग्य राजनेता

टकराव और संघर्ष को लेकर चतुर नेताओं के चालाकी भरे गणित से घिरने के बजाय वाजपेयी ने कुशल राजनेता की हैसियत से अहम दौरे किए। पहले वह विमुख कश्मीरियों से बातचीत के लिए पहुंचे और फिर जनवरी 2004 के पहले हफ़्ते में पाकिस्तान यात्रा की, जिसमें ऐतिहासिक इस्लामाबाद घोषणापत्र जारी हुआ। ये वाजपेयी का दृढ़संकल्प ही था, जिन्होंने देश और विदेश को लेकर संघ परिवार की प्राथमिकताओं से मुंह मोड़ लिया था। और यह वाजपेयी का संकल्प ही था, जिसने उन्हें ऐसे राजनेता के तौर पर पेश किया, जो देश के सर्वोच्च सम्मान के पूरी तरह योग्य है।

(हरीश खरे पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया सलाहकार (जून 2009 - जनवरी 2012) रहे. उनकी किताब 'हाउ मोदी वॉन इट- नोट्स फ्रॉम 2014 इलेक्शन' हाल में प्रकाशित हुई)

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