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इरोम की भूख हड़ताल के 15 साल, सेहत पर हो रहा असर

Mon, 02 Nov 2015 03:49 PM IST
दिलीप कुमार शर्मा
दिलीप कुमार शर्मा Updated Mon, 02 Nov 2015 03:49 PM IST
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Irom Sharmila completes 15 years of fast

अनशन पर बैठी मणिपुर की इरोम शर्मिला को रविवार को भूख हड़ताल करते 15 साल पूरे हो गए हैं।  लेकिन अब तक सरकार ने उनकी मांगे नहीं मानी है।

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इन 15 वर्षों में शर्मिला के इस आंदोलन को मणिपुर से लेकर संयुक्त राष्ट्र के मानव अधिकार विशेषज्ञों तक का समर्थन मिला, लेकिन शासन-व्यवस्था में कहीं कोई फर्क नजर नहीं आया। मानव अधिकार की पैरवी कर रही 42 वर्षीय शर्मिला की मांग है कि मणिपुर के विभन्न हिस्सों में लागू सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून (आफ़्स्पा) को पूरी तरह हटाया जाए।
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शर्मिला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी चिट्ठी लिख चुकी हैं। शर्मिला की देखभाल करने वाले डॉक्टर कई बार कह चुके हैं कि इतने लंबे समय से भोजन नहीं करने की वजह से उनकी हड्डियां बेहद कमजोर हो गई हैं और ऐसे में उन्हें स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझना पड़ेगा।
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इरोम के आंदोलन से म‌णिपुर में आया बदलाव

Irom Sharmila completes 15 years of fast

शर्मिला के इस अनशन को मणिपुर में मानवाधिकार की लड़ाई लड़ रहे लोगों की ताकत बताने वाले ह्यूमन राइट्स अलर्ट के कार्यकारी निदेशक बबलू लोइटोंगबम ने बीबीसी से बातचीत की।

उन्होंने बताया कि आफ़्स्पा को लेकर भले ही भूख हड़ताल पर बैठी इरोम शर्मिला को अभी सफलता नहीं मिली है, लेकिन उनके इस आंदोलन ने मानवाधिकार की लड़ाई को हिंदुस्तान और दुनिया में एक बड़ा मुद्दा बना दिया है।

उन्होंने कहा, "शर्मिला के आंदोलन की वजह से आज मणिपुर के माहौल में बदलाव दिखा रहा है। उसकी आवाज अब सैकड़ों लोगों की आवाजों को बुलंद कर रही है।"

बेकार नहीं जाएगा इरोम का आंदोलन

Irom Sharmila completes 15 years of fast

मणिपुर विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र विषय की डॉक्टर विजयलक्ष्मी बरारा कहती हैं 15 साल का शर्मिला का आंदोलन यूं ही बेकार नहीं जाएगा।

विजयलक्ष्मी कहती हैं, "यह शर्मिला का आंदोलन ही है जिससे लोगों का नजरिया बदला है। इंफाल नगर क्षेत्र से सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून को हटाया जा चुका है, उम्मीद है कि आने वाले समय में इस कानून को समूचे मणिपुर से हटा लिया जाएगा।"

मणिपुर के स्थानीय पत्रकार जेम्स खंगेनबम कहते है कि शर्मिला का आंदोलन कभी कमजोर नहीं पड़ सकता। वो कहते हैं, "मणिपुर के लोग जानते है कि अगर शर्मिला का आंदोलन नहीं होता तो इतनी ताकत के साथ मानवाधिकार की लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती थी।"

मणिपुर में अलगाववाद से निपटने के लिए राज्य में कई दशकों से सेना तैनात है, जिसे सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून के इस्तेमाल की छूट है। इसके तहत सुरक्षाबलों के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती। मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि इस कानून की आड़ में सेना ने कई मासूमों की फर्जी मुठभेड़ों में हत्या की है।

राजधानी इंफाल के मालोम इलाके में असम राइफ्ल की गोलीबारी में मारे गए 10 मणिपुरी युवकों की मौत के बाद आज ही के दिन वर्ष 2000 में शर्मिला भूख हड़ताल पर बैठी थीं।

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