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'सिस्टम ने टॉर्चर किया, भगवान ने दिया इनाम'

Sun, 02 Aug 2015 01:30 AM IST
Updated Sun, 02 Aug 2015 01:30 AM IST
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interview with the father of sanjeev chaturvedi

कम ही लोग जानते हैं कि मैग्सेसे पुरस्कार के लिए चुने गए संजीव चतुर्वेदी का ताल्लुक देवरिया से है। ताल्लुक ही नहीं बल्कि इसी जिले से संजीव ने पांचवीं तक की पढ़ाई पूरी की और उनके पिता दयाशंकर चतुर्वेदी बिजली महकमे में चीफ इंजीनियर के पद से रिटायर होने के बाद बलिअवां गांव में रहते हुए पुरखों से मिली विरासत को संभाल रहे हैं।

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बेटे के नाम से जुड़ी नई उपलब्धि पर प्रतिक्रिया का सवाल आया तो खुशी के साथ सिस्टम से पैदा होने वाली चुनौतियों को लेकर हताशा भी उनकी जबान पर आ गई।

संजीव की पढ़ाई से लेकर नौकरी की शुरुआत तक के अनुभवों पर चर्चा करते हुए कहा, सिस्टम से जुड़े कुछ भ्रष्ट लोगों ने मेरे बेटे को बहुत टॉर्चर किया है। शायद वह पहला नौकरशाह होगा, जिसे नौकरी के शुरुआती साल में ही तबादले और निलंबन का सामना करना पड़ा।
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ईमानदारी की उसकी दृढ़ इच्छाशक्ति के आगे कई कद्दावर लोगों को झुकना पड़ा। इसी संघर्ष के नतीजे के तौर पर भगवान ने उसके नाम के साथ मैग्सेसे अवार्ड को जोड़ने का निर्णय लिया है।

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एक करोड़ का जुर्माना भी लगा

interview with the father of sanjeev chaturvedi

उन्होंने कहा कि इलाहाबाद से बीटेक करने के बाद संजीव का चयन आईएफएस में होने की जानकारी पर भी पूरे परिवार को बड़ी खुशी मिली थी। यह खुशी तब और बढ़ी जबकि संजीव ने पहली पोस्टिंग के दौरान कुरुक्षेत्र में जंगलों के दोहन, जीव-जन्तुओं के खात्मे की माफिया की कोशिश रोकने के लिए दखल दिया लेकिन सिस्टम में बैठे भ्रष्ट लोगों की दखलंदाजी ज्यादा असर वाली साबित हुई।

भ्रष्टाचारियों की मुखालफत के बदले पहले संजीव का तबादला किया गया फिर निलंबन। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा सरकार को दोषी मानकर एक करोड़ का जुर्माना लगाया। इस रकम को उसी जंगल के विकास और सुरक्षा में लगाने के लिए कहा, जहां का दोहन संजीव रोकना चाहते थे।

यही नहीं अपने से करीब 20 साल वरिष्ठ एक आईएएस अफसर के काले कारनामों को उजागर करने में भी संजीव को काफी प्रताड़ना झेलनी पड़ी। मुख्य सचिव बनने जा रहे इस अधिकारी का चिट्ठा सामने आया तो उस पर एक्शन से ज्यादा संजीव का विरोध तेज हो गया। हालांकि इस मामले में भी बाद में अधिकारी पर आरोप पत्र दाखिल हुआ तो उनके कारनामे सामने आ गए।

परिवार की विरासत है ईमानदारी

interview with the father of sanjeev chaturvedi

फोन पर हुई बातचीत में संजीव चतुर्वेदी ने कहा कि दूर होकर भी मैं देवरिया से अलग नहीं हो सकता।। पिता की नौकरी की वजह से शहर बदले तो स्कूल-कॉलेज भी बदलते रहे लेकिन पांचवीं तक की शिक्षा देवरिया से ही मिली।

प्रमुख त्योहार और बड़ी छुट्टी का अवसर मिलने पर आज भी गांव पहुंचने की कोशिश रहती है। पिता से मिले संस्कार और स्वतंत्रता सेनानी नाना रमाकांत तिवारी को सरकार से मिले ताम्रपत्र की झलक हमेशा जेहन में रहती है। विरासत में मिले इसी जज्बे को ईमानदारी से देश के लिए इस्तेमाल करना चाहता हूं।

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