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बिहार चुनाव: राजीव प्रताप रूडी से चुनिंदा सवाल और उनके जवाब

Wed, 30 Sep 2015 02:27 PM IST
Updated Wed, 30 Sep 2015 02:27 PM IST
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interview with rajeev pratap rudi

राजीव प्रताप रूडी बिहार के उन भाजपा नेताओं में से हैं जो आधुनिक विधा के साथ-साथ राजनीति में पारंपरिक राजनीति को भी भरपूर तवज्जो देते हैं। जब बिहार में चुनाव की बारीकियों पर उनसे चर्चा हुई तो रूड़ी ने कहा  कि राज्य में महागठबंधन चुनाव भले लड़ रहा हो लेकिन लालू-नीतीश का गणित फेल है।

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बिहार में विधानसभा चुनाव प्रक्रिया चल रही है और राजग तथा महागठबंधन के अलग-अलग दावे हैं। आखिरकार इसमें भ्रम में कौन है?
 
बिहार के लोगों और भाजपा में कोई भ्रम नहीं है। भाजपा जानती है कि लालू और नीतिश का गणित फेल चुका है। लालू और रघुवंश बाबू पटना में गांधी मैदान में आई भीड़ का 70 फीसदी श्रेय खुद ले रहे हैं। वह यादव, मुसलमान समीकरण का हवाला दे रहे हैं।
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कुछ ऐसा ही देखकर नीतिश भी लालू के पास गए हैं, लेकिन यह गणित कहीं से भी फिट नहीं है। इसलिए भ्रम में लालू-नीतिश और दिल्ली के लोगों हैं जिन्होंने वातावरण बनाया कि इतने फीसदी मुसलमान, यादव, दलित और अन्य लोग लालू-नीतिश गठबंधन के साथ हैं। अभी तो बड़ा सवाल यह भी है कि क्या लालू अपना वोट नीतिश की पार्टी को स्थानांतरित करा पाएंगे।

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किसके पक्ष में वोटों का गणित?

interview with rajeev pratap rudi

क्या वोटों का गणित कहीं से लालू-नीतिश के पक्ष में नहीं है?  

मैं यह नहीं कहता, लेकिन जो वह दावा कर रहे हैं, वैसा नहीं है। वैसे भी दोनों दलों में १०1-१०1 सीट का बंटवारा हुआ है। ऐसे में लालू पूरी ताकत लगाएंगे, ताकि वह नीतिश से अधिक सीटें ला सकें। नीतिश की पार्टी उनसे पीछे रहे और राष्ट्रीय जनता दल सरकार बनाए।
 
क्या भाजपा इसी आकलन पर चुनाव मैदान में है?

नहीं, एक तीसरा पक्ष भी है। जब भाजपा, जद(यू) मिलकर चुनाव लड़ता था तो भाजपा 102-103 सीटों पर चुनाव लड़ती थी। 135 सीट पर जद(यू) लड़ता था। 200 से अधिक सीटों पर लालू की पार्टी प्रत्याशी उतारती थी। अब सीटों के बंटवारे में 101 सीट पर जद(यू), 101 पर राजद और 41 पर कांग्रेस चुनाव लड़ रही है। इस तरह से भाजपा गठबंधन करीब 100 सीटों पर अधिक चुनाव मैदान में है। इसमें से हमें करीब 50 सीटें मिल जाने का अनुमान है।, क्योंकि इन अधिकांश सीटों पर दोनों दलों के बीच गहरा अविश्वास है। इसका हमें फायदा मिलेगा।

पिछड़ों-अगड़ों की राजनीति

interview with rajeev pratap rudi

लेकिन पिछड़ों, अति पिछड़ों, यादव, मुसलमान के समीकरण में लालू-नीतिश का गठबंधन मजबूत है?

ऐसी बात नहीं है। यही दावा वह भी करते हैं लेकिन भाजपा के साथ लोजपा के जीतनराम मांझी, रालोसलपा के उपेन्द्र कुशवाहा, लोजपा के राम विलास पासवान हैं। विशन पटेल और कुछ मुसलमान भी है। अगड़े और अन्य हैं। हमारा गणित कहीं से भी कमजोर नहीं है और समय इसे साबित भी करेगा। रहा सवाल लालू के चुनावी गणित का तो यदि यादव, मुसलमान मतदाता उनका साथ देंगे तब भी दाल नहीं गलेगी। राज्य का युवा विचलित है। उसे रोजगार और बिहार का विकास चाहिए। वह लालू के राज का दौर भूला नहीं है।
 
पिछले चुनावों में मिले वोट का प्रतिशत और जातिगत आधार क्या कोई मतलब नहीं रखेगा?

सवाल सिर्फ यही नहीं है। मार्जिन, कैंडिडेट, कांपिटेंसी और इनकम्बैंसी का भी है। यह संवाद तो तब कामयाब होता है जब कोई लहर चल रही होती है। अन्यथा विधानसभा के हिसाब से यह गणित बदलता जाता है। क्षेत्रवार और पॉकेट्स के हिसाब से भी चीजें चलती हैं।

भाजपा गठबंधन की कितनी सीटें आएंगी?

interview with rajeev pratap rudi

क्या अनुमान है, भाजपा गठबंधन की कितनी सीटें आ जाएंगी?

इसका अभी आंकलन किया जा रहा है। लेकिन हमें पूरा भरोसा है कि भाजपा के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनेंगी।

 
इसका मतलब अभी कहीं न कहीं भ्रम है?

नहीं, हम कहीं भ्रम में नहीं है। बिहार के लोग भी भ्रम में नहीं हैं और जिस तरह से राज्य का युवा विकास और रोजगार को लेकर विचलित है, 170-180 के आस-पास सीट जीतने में सफलता मिलनी चाहिए।
 
इसका आधार क्या है?

राज्य में 25 साल कांग्रेस का शासन रहा, 15 साल लालू की पार्टी की सरकार रही। कांग्रेस के जमाने में दंगा-फसाद हुआ और लालू के राज में मुस्लिम-यादव ने भी इसे आगे बढ़ाया। लालू ने अगड़ो-पिछड़ों की खाई चौड़ी की। जंगल राज सा रहा। इसके बाद नीतिश कुमार विकास योजनाओं के साथ आगे आए। नीतिश ने बारीकी से अपनी भूमिका निभाई। आगे की राजनीति के लिए पिछड़ी जातियों में अति पिछड़ी, दलितों में महादलितों, मुसलमानों में पसमंदा मुसलमान यानी अगड़े-पिछड़े मुसलमानों का बंटवारा कराया। अब बिहार में बंटने के लिए कुछ नहीं बचा है। प्रधानमंत्री के दौरे के बाद से अब केवल बिहार के विकास की बात हो रही है। बिहार सांस्कृतिक और सामाजिक रूप से समृद्ध है और अब वहां केवल विकास की बात हो रही है।

क्या जाति हो रही है हावी?

interview with rajeev pratap rudi

क्या विकास का मतलब लोग समझ पा रहे हैं या जाति हावी है?

पटना की सब्जी वहां से दूर गंगा के किनारे के सिताबदियारा से आती है। अभी हम छपरा जैसे क्षेत्र की बात नहीं कर रहे हैं, जहां का आदमी कभी बिजली घर की कल्पना ही नहीं कर सकता था। हमने वहां के लिए 120 करोड़ रुपये आवंटित कराकर परियोजना सुनिश्चित कराई है। वहां एक मेगावाट की बिजली का भी उत्पादन नहीं होता। दूसरे राज्यों से आती है। इसलिए बिहार में कुछ समय पहले की (बात, जाति, गरीबी) राजनीति का भविष्य का भविष्य नहीं रहा। अब बात केवल विकास की हो रही है।
 
भाजपा राज्य में विकास की बात कर रही है। यहां भी साफ होना जरूरी है कि राज्य में आपकी सरकार बनने के बाद कितने समय में लोगों को जमीन पर विकास या कुछ बदलाव दिखेगा?
 
इस पर अभी कुछ नहीं कहा जा सकता। छोटी परियोजनाएं भी मूर्त रूप लेने में चार-पांच साल का समय ले लेती हैं।

लालू टमटम पर सवार हैं

interview with rajeev pratap rudi

यह समझ से परे है। लालू प्रसाद टमटम पर सवार हैं, विकास पुरुष नीतिश कुमार विकास पुरुष होकर भी बिहार की अस्मिता को मुद्दा बना रहे हैं, वहीं भाजपा ट्विटर पर सवार होकर विकास की बात कर रही है?

देखिए, नीतिश कुमार ने मोदी जी को कॉपी करना चाहा तो एक्सीडेंट  हो गया। वह अंग्रेजी बोलने वाले बच्चों को बैठा लिए और सवाल जवाब में चंदन और भुजंग में फंस गए। वह चंदन बन गए, लालू प्रसाद को सांप बता दिया। नीतिश की टीम वाला नेता तो जानता है कि उनका लीडर साफ-सुथरा है, लेकिन लालू की छवि साफ-सुथरी राजनीति की नहीं है। दोनों को फालो करने वाली जमात एक दूसरे पर भरोसा नहीं करती। दूसरे लालू प्रसाद रईस आदमी हैं। वह राजनीति भले ऐसे वर्ग की करते हैं लेकिन जिंदगी शान शौकत की जीते हैं। इसलिए टमटम, खराब सड़क कभी उनका नारा नहीं रहा। लालटेन चुनाव चिन्ह जरूर है। वह अगड़े पिछड़े की राजनीति करते रहे हैं। उनके लिए बाकी सबकुछ दिखावा है।
 
तो नीतिश कुमार के इस दांव को क्या कहेंगे?

सबसे बड़ी राजनीतिक भूल। नीतिश की पार्टी भाजपा के साथ लालू राज के विरोध में बिहार में सत्ता में आई थी। लालू विकास पुरुष तो थे् नहीं। 15 साल के राज में उन्होंने बिहार को पीछे धकेला। नीतिश अब पूरी तरह लालू यादव पर निर्भर हैं। अब अगर उनकी सरकार बनी तो भी रिमोट लालू यादव के हाथ में रहेगा। इसे बिहार की जनता समझती है और महसूस भी कर रही है।  इसलिए नीतीश कुमार ने लालू के साथ जाकर जीवन की ऐतिहासिक भूल की है।

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