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'आडवाणी खलनायक हैं नहीं, उन्हें बना दिया गया'

Sat, 15 Jun 2013 09:20 AM IST
हेमेन्द्र मिश्र
हेमेन्द्र मिश्र Updated Sat, 15 Jun 2013 09:20 AM IST
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interview with govindacharya

प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी की भीतरी कलह जिस तरह से सामने आई, उससे कई संकेत निकलते हैं। कभी भाजपा और संघ के बीच महत्वपूर्ण कड़ी रहे गोविंदाचार्य से बातचीत कर हेमेन्द्र मिश्र ने यह जानने की कोशिश की कि वह इस पूरे प्रकरण को किस तरह देखते हैं-

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प्रश्न- नरेंद्र मोदी को चुनाव अभियान की कमान सौंपने से भाजपा में जो उथल-पुथल मची, उसे आप किस तरह देखते हैं? लालकृष्ण आडवाणी की नाराजगी के पीछे कहीं उनकी निजी महत्वाकांक्षा तो नहीं थी?
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गोविंदाचार्य- यह कहना कि प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा में लालकृष्ण आडवाणी अंधे हो गए हैं और वह नरेंद्र मोदी की राह में रुकावट बन रहे हैं, नितांत असत्य और अन्यायपूर्ण होगा। ऐसी कोई बात नहीं है। इसे दो उदाहरणों द्वारा समझा जा सकता है।
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पहला, रामजन्मभूमि आंदोलन के शीर्षस्थ नेता होने के चलते 1995 के अंत में जब सब लोग 1996 के चुनाव हेतु आडवाणी को ही प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने को कह रहे थे, तो उन्होंने खुद मुंबई की जनसभा में बिना किसी को सूचना दिए अटल बिहारी वाजपेयी का नाम घोषित किया।

इसी तरह 1991 में संघ के लोगों के दबाव में जब उन्हें विपक्ष का नेता बनने को कहा जा रहा था, तब भी आडवाणी खुद के बजाय अटल बिहारी वाजपेयी जी के नाम पर संघ को मनाने की पुरजोर कोशिश करते रहे। इन दोनों घटनाओं का मैं खुद गवाह रहा हूं।

इसलिए मैं यह कह सकता हूं कि आडवाणी जी की कोई महत्वाकांक्षा नहीं है। असल में, हाल के दिनों में माहौल इस तरह बना दिया गया कि लगा वह महत्वाकांक्षी हो गए हैं। उन्हें खलनायक बना दिया गया है, वह खलनायक हैं नहीं।

प्रश्न- तो फिर पिछले दिनों आडवाणी के रूठने और मानने को क्या कहेंगे?

गोविंदाचार्य- इस पूरे मामले में उनकी आपत्ति दो स्तरों पर थी- एक, राजनीतिक और दूसरी संगठनात्मक। आडवाणी जी का यह मानना है कि संप्रग सरकार के कार्यकाल में हुए भ्रष्टाचार और घोटालों को अगले लोकसभा चुनाव में मुद्दा बनाया जाना चाहिए।

इससे जनता के बीच बन रहे कांग्रेस विरोध का लाभ पार्टी को मिलेगा। नरेंद्र मोदी को आगे करने पर सांप्रदायिक विवाद बढ़ सकता है और इस तरह पार्टी लाभ की स्थिति में नहीं रहेगी। इसलिए उन्होंने कहा कि पार्टी सामूहिक नेतृत्व के रूप में आगे बढ़े और चुनाव के बाद संख्या बढ़ने पर प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार तय करे, चाहे वह मोदी ही क्यों न हो।

लेकिन पार्टी मोदी को लेकर कुछ ज्यादा उतावली हो गई। ऊपर से उनके घर के सामने जिस तरह मोदी के पक्ष में नारे लगे और उनके खिलाफ प्रदर्शन किया गया, उससे भी वह खफा हुए। इस तरह देखा जाए, तो उतावलापन और जल्दबाजी से आडवाणी जी नाराज हुए थे। वह तारतम्यता की बात कह रहे थे, जिसे नजरंदाज किया गया।

वहीं, संगठनात्मक रूप से उनकी आपत्ति पार्टी फोरम में संघ की बढ़ती दखलंदाजी को लेकर है। उनका मानना है कि पार्टी के कामकाज में संघ का अनौपचारिक परामर्श तो ठीक है, लेकिन पार्टी बैठकों में उसका उठना-बैठना ठीक नहीं। यानी पार्टी सदस्य परोक्ष रूप से संघ के सदस्यों से परामर्श लेते रहें, लेकिन अधिकृत रूप से संघ पार्टी फोरम में शामिल होने से बचे।

प्रश्न- लेकिन ऐसा दिख रहा है कि आडवाणी के बारे में फैसला संघ ने ही किया है और संभवतः ऐसा पहली बार हुआ है कि नेतृत्व के सवाल पर भी संघ ने खुले तौर पर भाजपा को निर्देश दिए हैं?

गोविंदाचार्य- हां, बिलकुल। राजनाथ सिंह यह खुलेआम कहते हैं कि आडवाणी को मनाने में संघ प्रमुख मोहन भागवत का हाथ था। ऐसा भाजपा के कार्य में संघ का सीधा हस्तक्षेप है, जो उपयुक्त नहीं था। संघ का मर्यादा उल्लंघन करना दूरगामी दृष्टि से गलत होगा। संघ को संयम रखने और एक दूरी बनाने की जरूरत है।

पिछले दिनों संघ प्रमुख ने एक साक्षात्कार में कहा था कि नया भाजपा अध्यक्ष दिल्ली से नहीं होगा। यानी पार्टी के चार प्रमुख नेताओं अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, वेंकैया नायडू या अनंत कुमार की जगह कोई सूबाई नेता भाजपा अध्यक्ष बनेगा। सार्वजनिक रूप से ऐसे बयानों से बचना चाहिए। ऐसा कहा जाना दूरगामी दृष्टि से ठीक नहीं है। संघ और भाजपा के बीच की सीमा रेखा का उल्लंघन नहीं होना चाहिए।

प्रश्न- आपने कभी वाजपेयी को संघ का मुखौटा बताया था, और आज मोदी के पीछे संघ खड़ा नजर आ रहा है, तो क्या मोदी अब संघ का नया मुखौटा हैं?

गोविंदाचार्य- मैंने कभी नहीं कहा था कि वाजपेयी संघ का मुखौटा हैं। मैंने इसका पहले भी खंडन किया है। असल में भारतीय राजनीति में तीन ऐसी बातें हैं, जो हुई नहीं, लेकिन बना दी गईं। वे पूरी तरह काल्पनिक हैं। इन तीन बातों में पहली बात है, अटल बिहारी वाजपेयी जी का इंदिरा गांधी को दुर्गा कहना।

कहा जाता है कि 1971 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्ध में भारतीय सेना जिस तरह विजयी हुई, उससे उल्लसित होकर विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने इंदिरा गांधी की तुलना दुर्गा से की। इस पर मुझे यकीन नहीं होता। इसी तरह मेरे बारे में कह दिया गया कि मैंने वाजपेयी जी को संघ का मुखौटा कहा है। और तीसरी बात यह कि नरेंद्र मोदी के लिए आडवाणी खलनायक हैं। ये तीनों बातें ही गलत हैं। रही बात मोदी की, तो मोदी संघ का मुखौटा नहीं हैं।

प्रश्न- भाजपा के अंदर जिस तरह खींचतान चल रही है, उससे ऐसा लगता है कि पार्टी वाजपेयी-आडवाणी के नेतृत्व से बाहर निकल चुकी है। नया नेतृत्व राजग को कितना जोड़ पाएगा।


गोविंदाचार्य- भाजपा में नया नेतृत्व तो उभर रहा है, लेकिन नए नेतृत्व के चक्कर में पूरी पार्टी का माहौल खराब हो रहा है। मुझे लगता है कि नए नेतृत्व में संजय बिग्रेड सरीखे गैर-जिम्मेदार नेताओं की फौज धूम मचाएगी और आडवाणी जैसे नेता किनारे हो जाएंगे। इससे सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि नया नेतृत्व राजग को कितना जोड़ पाएगा!

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