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आंतरिक कलह से परेशान हैं भाजपा और जदयू
नई दिल्ली/हिमांशु मिश्र
Updated Mon, 29 Jul 2013 12:11 AM IST
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17 साला पुराना रिश्ता खत्म होने के बाद भाजपा और जद-यू दोनों परेशान हैं। अलगाव के बाद दोनों दलों के बीच खींचतान बढ़ गई है। दोनों ही पार्टियां आंतरिक कलह से भी दो-चार हो रही हैं।
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बिहार में भाजपा के लगभग दो दर्जन विधायक जद-यू की सुविधा के अनुसार किसी भी समय पाला बदलने के लिए तैयार बैठे हैं, तो दूसरी ओर जद-यू के सांसदों का एक गुट मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोलने की तैयारी में है।
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मानसून सत्र के दौरान यूपीए सरकार को मुद्दागत समर्थन के सवाल पर भी जद-यू में आमराय नहीं है। सत्र के दौरान विभिन्न मुद्दों पर पार्टी की असहमति खुल कर सामने आ सकती है।
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उधर, बिहार भाजपा का एक ताकतवर गुट उप मुख्यमंत्री रहे सुशील कुमार मोदी विरोधी मुहिम की शुरुआत कर सकता है।
बिहार में सियासी तलाक के बाद जद-यू और भाजपा में एक दूसरे के घर में सेंध लगाने की होड़ मची हुई है। भाजपा अपने विधायकों के बागी तेवर से परेशान है तो जद-यू अपने सांसदों के भावी रुख से।
सूत्रों के मुताबिक भाजपा के लगभग दो दर्जन विधायक जद-यू नेतृत्व के संपर्क में हैं। सरकार की स्थिरता पर आंच आने की स्थिति में ये विधायक किसी भी समय पाला बदलने के लिए तैयार हैं।
इसकी शुरुआत हायाघाट के विधायक अमरनाथ गामी कर चुके हैं। सदस्यता खतरे में न पड़े, इसलिए इन विधायकों ने सुशील कुमार मोदी और पार्टी के खिलाफ तीखी बयानबाजी कर पार्टी से निलंबित होने की रणनीति बनाई है।
इन विधायकों को पार्टी में ही ताकतवर मोदी विरोधी गुट का समर्थन हासिल है। वैसे भी दो विधायकों ने गामी को पार्टी से निकालने का तीखा विराध कर भावी रणनीति का संकेत दे दिया है।
उधर, जद-यू अपने सांसदों के बागी तेवर से परेशान है। यूपीए सरकार को मुद्दागत समर्थन देने के सवाल पर नीतीश कुमार और पार्टी अध्यक्ष शरद यादव में ही सहमति नहीं है।
इतना ही नहीं, हाल ही में राष्ट्रीय टीम से बाहर किए गए वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी पार्टी नेतृत्व पर हमला बोलने के लिए उचित समय का इंतजार कर रहे हैं।
संख्या बल बढ़ाने के लिए भले ही नीतीश की पहल पर दो सांसदों राजीव रंजन ललन और सुशील सिंह का निलंबन खत्म हो गया है, मगर निलंबित सांसद मंगनी लाल मंडल और तिवारी पार्टी के कुछ अन्य सांसदों के साथ मिलकर जल्द ही नीतीश के खिलाफ मुहिम शुरू कर सकते हैं।
नीतीश यूपीए सरकार को मुद्दागत समर्थन दे कर राज्य के लिए ज्यादा से ज्यादा केंद्रीय मदद हासिल करने के पक्षधर हैं, मगर शरद के साथ-साथ आधा दर्जन सांसद किसी भी कीमत पर यूपीए सरकार को परोक्ष समर्थन देने के लिए तैयार नहीं हैं।
पार्टी के एक वरिष्ठ सांसद ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि जल्द ही इस संबंध में पार्टी के अंदर का असंतोष सार्वजनिक हो सकता है।