मोदी-मुलायम की उम्मीदवारी से खुफिया एजेंसियां सतर्क
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नरेंद्र मोदी के वाराणसी और मुलायम सिंह यादव के आजमगढ़ से लोकसभा चुनाव लडऩे के ऐलान के बाद खुफिया एजेंसियों के माथे पर बल पड़ गए हैं। उनकी सतर्कता बढ़ गई है।
एजेंसियों को आशंका है कि इन दोनों नेताओं के अगल बगल जिलों से चुनाव लडऩे से पूर्वांचल में सांप्रदायिक तनाव और ध्रुवीकरण बढऩे का खतरा है। खुफिया एजेंसियों की चिंता है कि काफी ज्यादा मोदी को लेकर भाजपा और संघ परिवार उत्साहित है।
साथ ही हर हर मोदी घर घर मोदी के नारे लगने शुरू हो गए हैं। इसके जवाब में समाजवादी पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के समर्थक भी सड़कों पर उतर आए तो चुनाव प्रचार के दौरान ही संवेदनशील इलाकों में सांप्रदायिक तनाव भड़क सकता है। उधर जेल में बंद बाहुबली मुख्तार अंसारी के भी वाराणसी से चुनाव लडऩे की चर्चाओं ने भी इस आशंका को बढ़ा दिया है।
सांप्रदायिक तनाव भड़कने की आशंका
सूत्रों का कहना है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फर नगर में हुई सांप्रदायिक हिंसा के बाद से ही खुफिया एजेंसियों को पूर्वांचल में भी सांप्रदायिक तनाव भड़कने की आशंका थी। इस आशय की रिपोर्ट भी खुफिया एजेंसियों ने केंद्र व राज्य सरकार को भेजी थी। इसके बाद एहतियाती कदम भी उठाए गए। लेकिन अब फिर यह खतरा बढ़ गया है।
खुफिया सूत्रों के मुताबिक नरेंद्र मोदी को भाजपा ने धार्मिक नगरी काशी से इसलिए मैदान में उतारा है कि इससे उसका पूर्वांचल और बिहार में प्रभाव बढ़ सकता है। लेकिन बात सिर्फ यहीं तक रहती तो कोई परेशानी नहीं थी।
वहीं संघ परिवार के अन्य घटक बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद आदि के कार्यकर्ता मोदी की उम्मीदवारी के बाद वाराणसी और पूर्वांचल के अन्य जिलों में नरेंद्र मोदी की हिंदुत्ववादी छवि को उभारकर ध्रुवीकरण करने में जुट गए हैं, उससे शहरों के साथ साथ गावों में भी तनाव बढऩे का खतरा है।
उधर गोरखपुर में भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ पहले से ही मुखर हिंदू ध्रुवीकरण की राजनीति करते हैं। कई साल पहले मऊ में हुए दंगों के बाद इलाके केबाहुबली मुख्तार अंसारी ने मुस्लिम ध्रुवीकरण की राजनीति शुरु की थी। 2009 में अंसारी वाराणसी से चुनाव लड़े थे और सिर्फ 15 हजार मतों के अंतर से भाजपा के मुरली मनोहर जोशी से हारे थे। अंसारी फिर खम ठोंक रहे हैं।
सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का खतरा बढ़ा
खुफिया सूत्रों का कहना है कि अचानक मुलायम सिंह यादव द्वारा आजमगढ़ से चुनाव लडऩे केऐलान से पूर्वांचल के सपा कार्यकर्ताओं में जोश आ गया है और उनके मोदी और भाजपा पर ज्यादा हमलावर होने की आशंका है। ऐसे में दोनों तरफ से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का खतरा बढ़ गया है।
विहिप के राम मंदिर आंदोलन के दिनों में पूर्वांचल में जबर्दस्त सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का माहौल था और भाजपा को उसका राजनीतिक फायदा 1991 से लेकर 1998 तक के लोकसभा चुनावों में मिलता रहा। लेकिन जैसे-जैसे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कमजोर हुआ, पूर्वांचल में भाजपा की ताकत घटती गई और मुकाबला सपा बसपा के बीच हो गया।
मुजफ्फर नगर दंगों केबाद बने ध्रुवीकरण के माहौल और नरेंद्र मोदी की आक्रामक रैलियों की वजह से लंबे समय बाद भाजपा फिर उत्तर प्रदेश में खम ठोक कर मैदान में है जिसका फायदा उठाकर पार्टी पूर्वांचल में अपनी जड़े फिर मजबूत करना चाहती है। मोदी को बनारस में चुनाव लड़ाकर भाजपा पूरा फायदा उठाने की कोशिश में है।