किसके दबाव में रद्द हुई पाक से वार्ता?
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मोदी सरकार की ओर से पाकिस्तान से विदेश सचिव स्तर की बातचीत को रद्द करने के फैसले को विदेश नीति और घरेलू मामलों में संघ के बढ़ते असर का नतीजा माना जा रहा है।
संघ के इस रुख से आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर भारत के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ जाने का खतरा बढ़ गया है। ऐसे कदमों का वैश्विक असर दिख सकता है।
आश्चर्यजनक बात यह है कि मोदी सरकार ने बेहद छोटे मसले पर विदेश सचिव स्तर की यह बातचीत रद्द की है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला संघ परिवार के असर में किया गया है।
संघ परिवार पाकिस्तान से रिश्ते सामान्य करने के खिलाफ कई बार अपना रुख जाहिर कर चुका है और ऐसा वह अपने हिंदू जनाधार को खुश करने के लिए करता रहा है।
आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप है
भारत का कहना है पाकिस्तान के उच्चायुक्त अब्दुल बासित की ओर से हुर्रियत के नेताओं को बातचीत के लिए बुलाना उसके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप है इसलिए वह विदेश सचिव स्तर की बातचीत को रद्द करता है।
हालांकि यह पहली और आखिरी बार नहीं है कि किसी पाकिस्तानी अधिकारी ने हुर्रियत नेताओं को बातचीत के लिए नई दिल्ली बुलाया है।
विदेश मामलों के एक विशेषज्ञ ने कहा, ‘मोदी सरकार के विदेश नीति निर्माताओं को याद होगा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की ओर से 2000 में आगरा शिखर वार्ता पर बुलाए गए पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने हुर्रियत नेताओं और कश्मीरी अलगाववादियों से लंबी बातचीत के बाद ही वार्ता का रुख किया था।
वाजपेयी ने इस मुद्दे पर बातचीत रद्द नहीं की थी। जबकि, यह भारत और पाकिस्तान के शीर्ष नेताओं के बीच शिखर वार्ता थी। जबकि इस बार की बातचीत विदेश सचिव स्तर की ही थी।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर अलग-थलग पड़ने का खतरा
भारत इस मौके का इस्तेमाल पाकिस्तान के सामने अपनी इस नाराजगी को जताने में कर सकता था कि वह हुर्रियत के नेताओं को बुलाकर बातचीत करने के कदम उठा कर दोनों देशों के रिश्तों को सामान्य बनाने की दिशा में अड़चन पैदा कर रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है बातचीत रद्द करने का फै सला न सिर्फ जम्मू-कश्मीर बल्कि चार अन्य राज्यों में विधानसभा चुनाव को ध्यान में रख कर किया गया है, जहां भाजपा अपने सहयोगी दलों के साथ सत्ता की दौड़ में है।
संघ का मानना है कि अगर इस समय पाकिस्तान से बातचीत होती है तो इससे जम्मू क्षेत्र के हिंदू मतदाता नाराज हो सकते हैं। सरकार ने इसी तरह का यू टर्न डब्ल्यूटीओ में टीएफए के मुद्दे पर लिया था।
खाद्य सुरक्षा से जुड़े समझौते से निकल जाने की वजह से भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय मंच पर अलग-थलग पड़ने का खतरा पैदा हो गया है।
मोदी सरकार इस मामले में संघ के जबरदस्त दबाव में थी और दिसंबर 2013 में बाली सम्मेलन में अनुकूल सौदा तय कराने में मदद करने के बावजूद टीएफए मुद्दे पर असहयोग से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को खासी आलोचना झेलनी पड़ी।