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दुश्मन से भिड़ने को तैयार देश की ये बेटियां

Sat, 08 Mar 2014 08:14 AM IST
Updated Sat, 08 Mar 2014 08:14 AM IST
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indian woman army on indo-pak border

भारत-पाक अंतरराष्ट्रीय सीमा पर अपनी बेटियों को सरहद की रखवाली करते देख किसी भी भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो सकता है। ये युवतियां सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) में कांस्टेबल हैं।

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इन्होंने अपने जोश और जज्बे से साबित कर दिया कि महिलाएं यूं ही पुरुषों से बराबरी का दावा नहीं करतीं। वक्त आने पर वे उतनी ही जिम्मेदारी और हौसले से फर्ज का निर्वाह भी करती हैं।
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दो साल पहले बीएसएफ में भर्ती हुईं महिला कांस्टेबलों के हौसले और कर्तव्यनिष्ठा की उनके अधिकारी भी दाद देते हैं। खास बात यह है कि इनमें से ज्यादातर जवान या किसान की बेटियां हैं।
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कांस्टेबल किरण, पंपिदर और सुषमा एलएमजी, एक्स-95 व इनसास सहित सभी तरह के हथियार चलाने में दक्ष हैं। इन्हीं की तरह सांबा की तीन और बेटियां पूजा शर्मा, लक्ष्मी देवी शर्मा और अंजू बाला भी अंतरराष्ट्रीय सीमा पर देश की सीमा की सुरक्षा में तैनात हैं।

मां-बाप से झगड़ी, तो सिपाही बन गई

indian woman army on indo-pak border

पपिंदर कौर सांबा के सीमांत क्षेत्र बैनग्लाड के रहने वाले पूर्व सैनिक जगतार सिंह की बेटी हैं। वे बताती हैं कि स्कूल के दिनों में कोई साफ योजना तो नहीं थी, लेकिन एक ख्वाब जरूर था कि मेरा परिवार और मेरा गांव मुझ पर नाज करे।

उन्होंने बताया कि इसी बीच एक दिन माता-पिता से किसी बात पर मामूली सा झगड़ा हो गया। मुझे बहुत गुस्सा आया। सोचा कि अब अपने दम पर कुछ करने का समय आ गया है।

तभी पता चला कि बीएसएफ में महिला कांस्टेबल की भर्ती के लिए फार्म निकले हैं। बस आज आपके सामने उस रूप में खड़ी हूं जिस पर मेरे माता-पिता को भी मुझ पर फख्र है।

डर! वह तो पास भी नहीं फटकता

indian woman army on indo-pak border

पटोली ब्राह्मणा की रहने वाली सुषमा कुमारी ग्रेजुएट हैं। पिता बिशन दास भी पूर्व सैनिक हैं। फर्राटे से डोगरी, हिंदी और अंग्रेजी बोलने वाली सुषमा बताती हैं, वह स्कूल के दिनों में ही बेल्ट फोर्स की नौकरी करने का मन बना बैठी थीं।

मौका मिलते ही बीएसएफ में भर्ती हो गईं। अब डिपार्टमेंटल टेस्ट पास कर अफसर बनने की कोशिश में हैं। यह पूछने पर कि उन्हें डर नहीं लगता, तो उनका कहना था कि जब वे ड्यूटी पर तैनात होती हैं तो उनमें एक अजीब सा जोश भर जाता है और फिर डर कहीं आसपास नहीं फटकता।

अब तो यही अपना परिवार हो गया

indian woman army on indo-pak border

सरहद पर ही हाथ में बंदूक लेकर पूरी मुस्तैदी से ड्यूटी में तल्लीन किरण बाला को बीएसएफ कांस्टेबल की अपनी मौजूदा भूमिका पर फख्र है। विजयपुर के कीसो गांव के किसान बूटी राम की बेटी किरण बताती हैं कि उनके साथ बीएसएफ कैंप में अधिकतर लोग दूसरे राज्यों से हैं, पर दो साल में कभी महसूस नहीं हुआ कि वे परिवार से दूर हैं। सब लोग बेहद अपने हो गए हैं।

बेल्ट फोर्स की नौकरी करने का कभी सोचा हीं नहीं था। पिता जी दुकानदार हैं। दो भाई हैं। बड़ा भाई नौकरी की तलाश में है और छोटा दसवीं का छात्र है।

कानाचक्क बार्डर आउट पोस्ट पर तैनात सांबा जिले के पंज टीला गांव की लक्ष्मी देवी शर्मा बताती हैं कि 12वीं कक्षा पास करने के बाद पता चला कि बीएसएफ में भर्ती हो रही है तो रहा नहीं गया और फार्म भर दिया। भगवान की कृपा से देश सेवा का मौका मिला और आज देश की सरहद पर तैनात हूं।

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