फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   indian soldiers in first world war

ये है भारत के वो जांबाज, जिन्हें अब भुला दिया गया...

Tue, 07 Jul 2015 11:44 AM IST
Updated Tue, 07 Jul 2015 11:44 AM IST
विज्ञापन
indian soldiers in first world war

प्रथम विश्व युद्ध के सौ साल पूरे होने पर इसके ऑस्ट्रेलियाई, कनाडाई, दक्षिण अफ़्रीकी और न्यूज़ीलैंड के सैनिकों के योगदान पर काफ़ी कुछ कहा सुना गया। उनकी याद में कार्यक्रम हुए, किताबें प्रकाशित हुईं, फ़िल्में बनीं, लोगों ने कई तरह से याद किया और श्रद्धांजलि दी गईं।

विज्ञापन


पर इसी युद्ध में भाग लेने वाले तक़रीबन 13 लाख भारतीय सैनिकों की काफ़ी कम चर्चा हुई। इसमें 74,187 भारतीय सैनिक मारे गए और इसी अनुपात में वे ज़ख़्मी भी हुए। उनकी बहादुरी की कहानियां मानो भुला ही दी गईं।
विज्ञापन


भारतीय सैनिकों को नहीं मिली जगह
भारतीय सैनिकों ने यूरोप, भूमध्य सागर के इलाक़ों, मसोपोटामिया, उत्तरी अफ़्रीका और पूर्व अफ़्रीका के देशों में लड़ाइयां लड़ीं। यूरोप में तो खाइयों में लड़ते हुए मौत को गले लगने वाले पहले सैनिकों में उनका नाम था।
विज्ञापन
विज्ञापन


बड़ी तादाद में भारतीय सैनिक युद्ध के पहले ही साल मारे गए। जर्मनी का ज़ोरदार हमला तो दूसरे साल शुरु हुआ। जिस समय ब्रिटेन में सैनिकों की भर्ती ही की जा रही थी, भारतीय सैनिकों ने 1914 में ईप्रस में जर्मनी के बढ़ते हुए क़दमों को बहादुरी से रोका था। नोव चैपल की बेकार गई लड़ाई में वे बड़ी बहादुरी से लड़े। गैलीपोली की लड़ाई में 1,000 से ज़्यादा भारतीय सैनिक खेत रहे।

अपनों से दूर

indian soldiers in first world war

मेसोपोटामिया में ऑटोमान साम्राज्य के ख़िलाफ़ सात लाख भारतीयों ने अपनी सेवाएं दीं। इनमें भारतीय मुसलमान भी थे, जिन्होंने इस्लाम मानने वालों के ही ख़िलाफ़ अंग्रेज़ों के लिए युद्ध किया।

सबसे दुखद स्थिति यूरोप की खाइयों में लड़ने वाले भारतीय सैनिकों की थी। अपने परिजनों को लिखी उनकी चिट्ठियों से पता चलता है कि वे किस तरह बिल्कुल दूसरे मुल्क, वातावरण और संस्कृति में रहते हुए लड़ रहे थे। उनमें से एक ने लिखा था, “लाशें ऐसे गिर रही हैं जैसे फ़सल कटने के समय भूसा गिरता है।”

प्रथम विश्व युद्ध शुरु हुआ तो ब्रिटेन ने घोषणा की थी कि यदि भारतीयों ने साथ दिया तो वह देश को आज़ाद कर देगा। हज़ारों भारतीय सैनिकों के जान गंवाने और दूसरे लोगों के हर तरह से सहयोग के बावजूद अंग्रेजों ने अपना वायदा पूरा नहीं किया।

वादा नहीं निभाया अंग्रेजों ने

indian soldiers in first world war

अंग्रेजों ने देश को आज़ाद करने के बदले रॉलेट एक्ट लागू कर दिया, जिसका विरोध हुआ। इसका नतीजा जालियां वाला बाग हत्याकांड के रूप में सामने आया।

निहत्थों पर की गई इस एक दिन की कार्रवाई में 1,499 लोग मारे गए और 1,137 ज़ख़्मी हुए। आज यह माना जा रहा है कि इन सैनिकों ने औपनिवेशिक ताक़तों के लिए लड़ाई लड़ी थी, यह लड़ाई उनकी अपनी नहीं थी। इसमें जान गंवाना महज़ इस पेशे से जुड़ा ख़तरा था।

क्या है इंडिया गेट?
इसलिए भारत में अपने ही सैनिकों की बहादुरी को भुला दिया गया। प्रथम विश्व युद्ध की 50वीं सालगिरह पर जब 1964 में आयोजन हुआ, कहीं किसी ने भारतीय सैनिकों का नाम तक नहीं लिया।

अंग्रेज सरकार ने दिल्ली में भारतीय सैनिकों को श्रद्धांजलि देने के लिए एक स्मारक बनवाया, यह है इंडिया गेट। यह 1931 में बन कर पूरा हुआ। इसे देखने हज़ारों लोग रोज़ाना यहां आते हैं। पर शायद ही किसी को पता हो कि यह प्रथम विश्व युद्ध में मारे गए भारतीय सैनिकों की याद में बनाया गया था।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed