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टैक्सी चलाकर आखिरकार क्यों खुश हैं प्रोफ़ेसर साहब!

Mon, 02 Mar 2015 03:43 PM IST
Updated Mon, 02 Mar 2015 03:43 PM IST
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indian professor become taxi driver

एडिलेड हो या सिडनी, ऑस्ट्रेलिया के हर शहर में ज़्यादातर टैक्सी चालक दक्षिण एशियाई मूल के हैं। इनमें से लगभग हर शहर में मुझे भारतीय युवा टैक्सी चालक बड़ी तादाद में मिले। पंजाब, हरियाणा और आंध्र प्रदेश से आए लोगों की संख्या इनमें सबसे अधिक है।

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ज़्यादातर टैक्सी चालक बताते हैं कि वे यहां कोई न कोई कोर्स करने आए थे, लेकिन असल कमाई उधार पर ली हुई टैक्सी चलाकर ही हो पाती है।

'कोई काम छोटा नहीं'

सिडनी में जसबीर सिंह से मिलने के बाद मेरी जिज्ञासा और बढ़ गई। जसबीर 14 वर्षों तक पंजाब के होशियारपुर ज़िले के गवर्नमेंट कॉलेज में विज्ञान पढ़ाने के बाद सिडनी पहुंचे। ऑस्ट्रेलिया में इन्हे सिर्फ़ हाई स्कूल तक के बच्चों को पढ़ाने का मौक़ा मिला, जिसे इन्होंने ख़ारिज कर दिया। अकाउंटिंग का एक कोर्स करने के बाद जसबीर ने पांच वर्ष तक उस क्षेत्र में काम भी किया।
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सफलता का राज़
वे कहते हैं, "2012 में मैंने वहां से इस्तीफ़ा दे दिया क्योंकि मेरे जूनियर को प्रोमोट कर सीनियर बना दिया गया था। उसके बाद से मैं टैक्सी चला रहा हूं। हालांकि यह काफ़ी सिरदर्द का काम है, पर इस देश में हर काम की इज़्ज़त होती है। यही सबसे अच्छी बात है।" जसबीर मानते हैं कि ऑस्ट्रेलिया में किसी भी काम को नीची निगाह से नहीं देखा जाता है और यही इस देश की सफलता का राज़ है।
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अब उनका पूरा परिवार यहीं रहता है और उनके बच्चे विश्वविद्यालय में पढ़ रहे हैं। चलने से पहले मुझसे कह गए, "कोई भी दिक्क़त हो तो मुझे बेहिचक फ़ोन करना।"

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