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झुग्गी में जिंदगी बसर कर रही मुगलों की बहू

Thu, 19 Sep 2013 10:02 PM IST
अमर उजाला, दिल्ली
अमर उजाला, दिल्ली Updated Thu, 19 Sep 2013 10:02 PM IST
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indian moghul rulers familieslives in poverty

शहंशाहों को हमेशा यह गुमान रहा कि उनसे ज्यादा ताकतवर दुनिया में कोई नहीं। कई की गलतफहमी दूसरे शहंशाओं की ताकत ने खत्म दूर की और दूसरों की वक्त ने।

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ऐसे ही एक शहंशाह का परिवार आज वक्त को सबसे ताकतवर शहंशाह बताता है।

कभी मुगल हिंदुस्तान की सरजमीं पर अपनी हुकूमत का झंडा गाड़ा करते थे, लेकिन जमाना बदला तो जैसे सब बदल गया। हुकूमत की जगह अब जख्म बचे हैं और बीते हुए कल की यादों के सिवा शहंशाही रईसी का नामोनिशां कहीं नहीं दिखता।
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कोलकाता की इस झुग्गी-झोपड़ी में जो परिवार रहता है, वह मुगलों की नस्ल है। न तो झुग्गी देखकर इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है और न ही इन चेहरों की मुफलिसी अपने चमकदार इतिहास का कोई राज खुलने देती है।
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हिंदुस्तान में आखिरी मुगल शासक बहादुर शाह जफर की पौत्रवधू सुल्ताना बेगम हावड़ा की एक झुग्गी में दो कमरों में जिंदगी समेटे हैं।
bahadur shah zafar grand daughter-in-law sultana

किसी वक्त दौलत में खेलने वाले मुगलिया परिवार की इस 60 साल की रिश्तेदार को खाना बनाने तक के लिए पड़ोसी के रसोईघर का आसरा रहता है।

गुमनाम सी जिंदगी जी रही सुल्ताना का आसरा सरकारी पेंशन है। इस महंगाई के दौर में उसे गुजारे के लिए महज 6,000 रुपए (60 पाउंड) हर महीने की पेंशन मिलती है।

इस बस्ती में सुल्ताना अपनी बेटी मधु बेगम के साथ रहती हैं। 1980 में शौहर प्रिंस मिर्जा बेदर बख्त की मौत के बाद सुल्ताना की जिंदगी और मुश्किल हो गई।

मधु का कहना है, 'हमलोग जी रहे हैं, लेकिन कैसे जी रहे हैं, यह सिर्फ खुदा जानता है।'

वहीं सुल्ताना कहती हैं, 'मेरी दूसरी बेटियां और उनके शौहर की हालत भी बेहद दयनीय है। ऐसे में वे मेरी मदद भला कैसे करेंगे?'
bahadur shah zafar grand daughter-in-law sultana
सुल्ताना ने इस स्थिति से उबरने के लिए कई बार केंद्र और राज्य सरकार से गुहार लगाई, लेकिन किसी ने उनकी न सुनी।

हालांकि, बाद में सरकार का दिल थोड़ा पसीजा और उसके पोते को नौकरी मिली। लेकिन अभी सुल्ताना के दूसरे रिश्तेदार अनपढ़ हैं, ऐसे में उन्हें रोजगार तलाशने में बेहद मशक्कत करनी पड़ रही है।

उल्लेखनीय है कि 1857 के क्रांति के बाद बहादुर शाह जफर द्वितीय को अंग्रेजों ने दिल्ली की तख्त से उतार दिया था। जफर को बाद में रंगून निर्वासित कर दिया गया। पांच साल बाद 87 साल की आयु में उनकी वहीं मौत हो गई।

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