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‘1971’ के रणबांकुरों की कहानी, उन्हीं की जुबानी

Tue, 04 Dec 2012 10:39 AM IST
आगरा/ब्यूरो
आगरा/ब्यूरो Updated Tue, 04 Dec 2012 10:39 AM IST
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indian army of 1971 war reminds that day

उनके जज्बे ने मौत को मात दे दी। दुश्मनों का खून बहाकर भारत माता की आन बचाना उनका अंतिम लक्ष्य था। न भूख की परवाह थी, न परिवार की। वतन पर न्योछावर करने के वास्ते हर सांस जिस्म को सहारा दे रही थी। कोई बुरी तरह झुलस गया, तो किसी को महीने भर तक सूरज दीदार न हुआ।

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भारत और पाकिस्तान के बीच वर्ष 1971 के युद्ध में वह गोला-बारूद से दुश्मनों के साथ मौत का खेल निडर होकर खेल रहे थे। ऐसे ही रणबांकुरों ने नेवी-डे (4 दिसंबर) पर अपने रोमांचक अनुभव ‘अमर उजाला’ के साथ साझा किया।
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मैं इंजन और वॉलर रूम में ड्यटी कर रहा था। मुझे अपने साथियों को सही जानकारी से अपडेट रखना था। हम लोग देशभक्ति के नारे लगाते थे। युद्ध में हिस्सा लेना मेरे लिए गौरव की बात है। मैं उन पलों को ताउम्र नहीं भुला सकता।--ओम प्रताप सिंह चौहान, पूर्व चीफ मैक
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मैं विशाखापट्टनम के कम्युनिकेशन सेंटर में तैनात था। हमारी टीम दुश्मन के सिग्नलों को भारतीय भाषा में बदलने का काम कर रही थी। हमारे लिए जिम्मेदारी भरा खेल था, जिस पर हमारी जीत निर्भर थी। जब जंग जीती और हमारा स्वागत हुआ, तब हमें देश के जज्बे की अहमियत पता चली।--सूरज पाल सिंह, पूर्व यौमैन सिग्नल

हमारी फौज दुश्मनों का सफाया कर रही थी। उत्साह इतना था कि हमने लाइफ जैकेट पहने बिना ही दुश्मनों का सामना करना शुरू कर दिया। गोलियों के तड़तड़ाहट दिल में जोश पैदा कर रही थी। दुश्मन को उसके घर में मात देकर हमें ऐसी खुशी मिली है, जिसे शब्दों में बयान करना मुश्किल है।--रामपाल सिंह, पूर्व ऑर्नेनरी सब लेफ्टिनेंट

14 दिन के ऑपरेशन के दौरान भूख और प्यास सब गायब हो गई थी। साथियों के बीच हर मिनट युद्ध की चर्चा होती थी। नींद में भी दिमाग दुश्मनों की गणना करता रहता था। दिल से मौत का खौफ गायब हो गया था। मैं जहाज चलाता था। हमारा काम वायु और थल सेना को पूरी सहायता मुहैया करना था।--एके जिलानी, पूर्व कमांडर

मैं फ्रीजेट जहाज में था। यह तोपों वाला जहाज था। युद्ध के दौरान जहाज तीन हिस्सों में बंटकर डूब गया। दूसरे जहाज के जरिये लोगों को बचाया जाने लगा। करीब 60 लोगों को बचाया जा सका जबकि करीब 120 सैनिक डूब गए। आगरा के कैप्टन मुल्ला ने बहादुरी दिखाई और जहाज को अंतिम समय तक नहीं छोड़ा। उस वक्त सैनिकों को मौत डर नहीं था। हमें नाज है कि हमने युद्ध में हिस्सा लिया।--बीडी तिवारी, पूर्व ऑर्नेनरी सब लेफ्टिनेंट


मैं इंजीनियरिंग विभाग में था, मेरी जिम्मेदारी जहाज चलाने की थी। हर सैनिक जज्बे के साथ देश के लिए मर मिटना चाहता था। हमने दुश्मन के छक्के छुड़ा दिए। यह यादगार पल जिंदगी के सबसे महत्वपूर्ण पल हैं।--राजकरन सिंह भदौरिया, पूर्व ऑर्नेनरी लेफ्टिनेंट

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