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चीन पर भरोसा करने में जल्दबाजी न करे भारत
नई दिल्ली/गुंजन कुमार
Updated Thu, 23 May 2013 12:21 AM IST
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भारत-चीन द्विपक्षीय वार्ता और चीनी प्रधानमंत्री ली केचियांग की तीन दिन की मौजूदगी को बारीकी से भांपने वाली तिब्बत की निर्वासित सरकार ने भारत को सचेत रहने की सलाह दी है।
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निर्वासित सरकार सेंट्रल तिब्बत प्रशासन (सीटीए) का मानना है कि चीन की मानसिकता को तिब्बत से बेहतर कोई नहीं समझ सकता। तिब्बत चीन की दुखती रग है। लिहाजा भारत सरकार जल्दबाजी में चीन पर भरोसा करने की गलती नहीं करे।
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ली की पूरी यात्रा प्रकरण के दौरान चुप्पी साधने वाले सीटीए ने अमर उजाला से खास बातचीत में कहा कि भारत चीन साथ-साथ आगे बढ़ते हैं, तो निर्वासित सरकार से ज्यादा खुशी किसी को नहीं होगी। मगर चीन के इतिहास को देखते हुए यह समझना जरूरी है कि वह कहता कुछ है और करता कुछ है।
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सीटीए के प्रवक्ता तेंजिन लेकशे के मुताबिक चीनी प्रीमियर की यात्रा के दौरान सीटीए ने चुप्पी इसलिए साधे रखी क्योंकि इससे भारत का पक्ष कमजोर होता। हालांकि दिल्ली में भारत सरकार की सख्ती के बावजूद कुछ तिब्बती लड़कों ने प्रदर्शन जरूर किए। यह उनका लोकतांत्रिक अधिकार है।
गौरतलब है कि 1959 में तिब्बत पर चीनी कब्जे के बाद से वहां की निर्वासित सरकार ने भारत की शरण में है। हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में इस सरकार का मुख्यालय है। सीटीए के प्रधानमंत्री डा. लोबसांग सांगे द्विपक्षीय वार्ता के दिन दिल्ली में ही मौजूद थे।
लेकशे ने कहा कि दिल्ली पुलिस ने तिब्बतियों को दिल्ली के जंतर-मंतर पर 20 मई को प्रदर्शन करने की अनुमति दे दी थी। इसी दिन भारत-चीन द्विपक्षीय वार्ता हुई। लेकिन आखिरी वक्त में अनुमति रद्द कर दी गई।
अचानक इतनी सख्ती बढ़ी कि दिल्ली में तिब्बतियों का गढ माने जाने वाले मजनूं का टीला में बैरिकेट लगा कर पुलिस ने किसी तिब्बती को बाहर नहीं आने दिया। कुछ नौजवान लड़के वहां से भाग जरूर निकले।
लेकशे ने कहा कि यह कहना मुश्किल है कि भारत ने यह काम चीन के दबाव में किया या यह उनका अपना फैसला था।
तिब्बती सरकार का मानना है कि भारत ने अपनी तरफ से एकीकृत चीन की थ्योरी को तवज्जो नहीं दे कर ठीक काम तो किया है। लेकिन इस पर चीन की चुप्पी से यह संदेश नहीं लेना चाहिए कि वह इस मुद्दे पर आगे भी चुप बैठा रहेगा।