फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   india should not blindly believe on china

'चीन पर आंख मूंद कर विश्वास न करे भारत'

Tue, 21 May 2013 12:17 AM IST
नई दिल्ली/हिमांशु मिश्र
नई दिल्ली/हिमांशु मिश्र Updated Tue, 21 May 2013 12:17 AM IST
विज्ञापन
india should not blindly believe on china

ली केचियांग ने बतौर चीनी प्रधानमंत्री पहली विदेश यात्रा के लिए भारत का चुनाव कर द्विपक्षीय संबंध सुधारने के संकेत दिए हैं। भारत ने भी ली की इस पहल का उत्साहजनक जवाब दिया है।

विज्ञापन


विदेशी मामलों के विशेषज्ञ भी ली की इस यात्रा को दोनों देशों के बीच संबंधों के बेहतर बनाने की पहल के रूप में तो देख रहे हैं, मगर साथ ही चीन से होशियार रहने की नसीहत देना नहीं भूलते।
विज्ञापन


बीती सदी के साठ के दशक में ‘हिंदी चीनी भाई भाई’ के नारे के बाद युद्ध के रूप में मिले धोखे की याद दिलाते हुए इन विशेषज्ञों का कहना है कि चीन की इस पहल पर भारत आंख मूंद कर विश्वास न करे। बल्कि भारत सोमवार को हुए समझौते के प्रति चीन की ईमानदारी को सतर्कता से परखने के बाद ही अंतिम निर्णय पर पहुंचे।
विज्ञापन
विज्ञापन


विदेशी मामलों के विशेषज्ञ एवं अमेरिका में भारत के पूर्व राजदूत नरेश चंद्रा कहते हैं कि ली की इस यात्रा से दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों में मजबूती आने के संकेत तो मिलते हैं। लेकिन हमें आत्ममुग्ध होने के बदले चौकन्ना रहने की जरूरत है।

चीन पर एकाएक विश्वास करने का हमारे पास कोई बड़ा कारण नहीं है। हालांकि चंद्रा मानते हैं कि आर्थिक और राजनयिक संबंधों में मजबूती दोनों देशों के हित में है।

पूर्व विदेश सचिव रोमेश भंडारी के अनुसार पूरी तरह बदल चुकी दुनिया में युद्ध की गुंजाइश खत्म होती जा रही है। चीन को भारतीय बाजार की जरूरत है।

इसी प्रकार भारत को भी चीन के बाजार की जरूरत है। दोनों देशों की आर्थिक जरूरतें एक दूसरे को नजदीक ला रही हैं।

भंडारी का यह भी मानना है कि नई परिस्थितियों में चीन भी सीमा विवाद को सुलझाने की दिशा में आगे बढ़ा है क्योंकि उसे पता है कि ऐसे विवाद जारी रखने का आर्थिक नुकसान ज्यादा है।

पूर्व राजनियक गौरशंकर राजहंस ने कहा कि भारत से संबंध सुधारना और चिकनी चुपड़ी बातें करना इस समय चीन की मजबूरी है।

यूरोप और अमेरिका में छाई आर्थिक मंदी ने चीन को भी बड़ा आर्थिक नुकसान पहुंचाया है। उसे अपना माल खपाने के लिए भारत के बड़े बाजार की जरूरत है। इसलिए ली संबंध सुधारने के नाम पर भारत के बाजार में चीन का हिस्सा बढ़ाने के उद्देश्य से यहां आए हैं।

राजहंस के मुताबिक हमेशा से विस्तारवाद की नीति अपनाते रहने वाले चीन ने आज भी सीमा विवाद सुलझाने का कोई ठोस आश्वासन नहीं दिया है। जबकि आर्थिक मोर्चे पर मुश्किल में फंसे चीन पर भारत दबाव बना सकता था।

आर्थिक विशेषज्ञ उत्साहित
आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ प्रंजॉयगुहा ठकुराता चीनी पीएम ली की इस यात्रा को ऐतिहासिक करार देते हैं। उनका कहना है कि इन दोनों देश की जीडीपी पूरी दुनिया की जीडीपी का 20 फीसदी और आबादी 40 फीसदी है।

जीडीपी भविष्य में और बढ़ेगी। ऐसे में दोनों देशों के आर्थिक संबंधों में आने वाली मजबूती का लाभ भी दोनों देशों को मिलेगा। बेशक लाभ का ज्यादा हिस्सा चीन के पास रहेगा। लेकिन भारत भी घाटे में नहीं रहेगा। नई पीढ़ी के ली नई सोच के साथ भारत आए हैं, इसलिए उनकी पहल का स्वागत करना चाहिए।

भारत और चीन जब तक एक-दूसरे पर भरोसा नहीं करेंगे तब तक क्षेत्रीय स्थिरता और शांति की कोशिशें कामयाब नहीं होंगी। और चीन और भारत की मजबूत दोस्ती के बिना दुनिया की खुशहाली और बेहतरी भी संभव नहीं है। कई मुद्दों पर सहमत होकर आज हमने जो बीज बोए हैं, वे पेड़ बनकर जल्द ही फल देंगे।--ली केचियांग, चीनी प्रधानमंत्री

पश्चिमी क्षेत्र में हुई हालिया घटना से हमने एक सबक सीखा है। इस घटना के निपटारे में मौजूदा दोनों देशों के बीच मौजूदा तंत्र ने अपनी अहम भूमिका साबित की। हमने अपने विशेष प्रतिनिधियों को जिम्मा सौंपा है कि वे सीमा पर शांति बनाए रखने के लिए और उपाय सुझाएं।--प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह

यात्रा के तीन मकसद
केचियांग के मुताबिक उनकी यात्रा के तीन अहम मकसद रहे, आपसी विश्वास बढ़ाना, सहयोग बढ़ाना और भविष्य में भारत के साथ मिलकर आगे बढ़ना।

मनमोहन को न्योता
चीनी प्रधानमंत्री ने मनमोहन सिंह को चीन आने का न्योता भी दिया।

तीन मुद्दों पर रहा भारत का जोर
चीनी पीएम से बातचीत में भारत का जोर तीन प्रमुख मुद्दों पर रहा। इनमें सीमा विवाद का जल्द निपटारा, नदियों पर योजनाओं को लेकर पारदर्शिता और व्यापार असंतुलन

जल्द सुलझाएंगे सीमा विवाद
लद्दाख में चीनी घुसपैठ की घटना से सबक लेते हुए भारत और चीन सीमा विवाद को जल्द से जल्द निपटाने पर सहमत हुए हैं। ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सीमा विवाद का हल खोजने के लिए बने तंत्र को मजबूत किया जाएगा।

साथ ही जल्द ही दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधियों की बैठकों का दौर शुरू होगा, जिसके जरिए सीमा विवाद का तार्किक और स्वीकार्य फ्रेमवर्क तैयार करने की दिशा में पहल की जाएगी।


व्यापार, संस्कृति और जल संसाधन से संबंधित आठ समझौतों पर लगी मुहर।

1. व्यापार बढ़ाने के लिए दोनों देश तीन कार्यसमूहों का गठन करेंगे।
2. कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए सुविधाएं बढ़ाएगा चीन। उन्हें वायरलेस सेट और स्थानीय सिम कार्ड मिलेंगे।
3. चीन ब्रह्मपुत्र के जलस्तर, बारिश आदि की जानकारी 1 जून से 15 अक्तूबर के बीच दिन दो बार भारत को मुहैया कराएगा।
4. लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने के लिए दोनों देशों के शहरों और राज्यों के बीच सहयोग की संभावना तलाशी जाएगी।
5. खेती में कम से कम पानी का इस्तेमाल कर पैदावार करने की तकनीक पर होगा सहयोग।
6. मीट और मछली उत्पादों के व्यापार में सहयोग बढ़ाया जाएगा, इसमें साफ-सफाई पर होगा जोर।
7. सीवेज ट्रीटमेंट और शहरी क्षेत्र के अन्य अनुभवों को साझा करेंगे।
8. दोनों देश अगले पांच साल में एक-दूसरे की 25 किताबों का चीनी और भारतीय भाषाओं में अनुवाद और प्रकाशन करेंगे।

साझा घोषणापत्र
भारत और चीन के पास आर्थिक और सामाजिक विकास में भागीदारी का ऐतिहासिक अवसर है। इस मौके को पहचान कर हम एशिया और दुनिया की शांति और समृद्धता के लिए आगे बढ़ेंगे।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed