'भारत धर्मनिरपेक्ष देश मगर कब तक, पता नहीं'
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि भारत अब तक धर्मनिरपेक्ष देश है, लेकिन पता नहीं आगे यह कितने समय तक बना रहेगा, यह कहा नहीं जा सकता। हालांकि, अदालत ने यह भी साफ किया कि धार्मिक आदेश कभी भी कानून से ऊपर नहीं हो सकता।
रोमन कैथोलिक के इकेलेसियास्टिकल कोर्ट (धार्मिक) द्वारा जारी आदेश को मान्यता देने से इनकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ये टिप्पणी की। अदालत ने इस संबंध में केंद्र सरकार को भी चार हफ्ते में अपना पक्ष रखने के लिए कहा है।
न्यायमूर्ति विक्रमजीत सेन और न्यायमूर्ति सी नगाप्पन की पीठ ने कहा, ‘आज की तारीख में भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है पर यह नहीं जानता कि ऐसा कब तक रहेगा।’ पीठ ने दोटूक कहा कि धर्म को कानून से अलग रखना चाहिए। यह बेहद जरूरी है। क्योंकि वैसे ही कई तरह की परेशानियां हैं।
ईसाई कोर्ट के आदेश को कानूनी दर्जा देने से इनकार
अदालत 85 वर्षीय एडवोकेट क्लेंरेंस पेस द्वारा दाखिल एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही है। याचिका में कैथोलिक ईसाई के इकेलेसियास्टिकल कोर्ट (धार्मिक) द्वारा जारी आदेश को शीर्ष अदालत की मुहर की गुहार की गई है। इकेलेसियास्टिकल कोर्ट कैनन लॉ के तहत संचालित होता है।
दक्षिण कन्नड़ कैथोलिक एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष रह चुके याचिकाकर्ता ने गुहार की है कि इकेलेसियास्टिकल कोर्ट द्वारा विवाह-विच्छेद के आदेश को सुप्रीम कोर्ट से हरी झंडी मिलनी चाहिए।
साथ ही याचिका में मांग की गई कि भारत की कोई भी फौजदारी अदालत को बिना कैनन लॉ पर विचार किए रोमन कैथोलिक लोगों को भारतीय दंड सहिता की धारा 494 (एक पत्नी या पति के रहते के रहते दूसरा विवाह करना) के तहत अभियोग नहीं चलाया जाना चाहिए।
कैनन लॉ के आधार पर स्वीकार्य नहीं
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील सोली सोराबजी ने पीठ से कहा कि यह महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न और धार्मिक स्वतंत्रता का सवाल है। उन्होंने कहा कि यह देश के करीब एक करोड़ भारतीय ईसाइयों से जुड़ा हुआ मामला है। ऐसे लोगों का विवाह और विवाह विच्छेद कैनन लॉ के आधार पर संचालित होता है।
इस पर पीठ ने दोटूक कहा कि यह स्वीकार नहीं किया जा सकता है। नहीं तो हर धर्म कहेगा कि उसे अपने पर्सनल लॉ के हिसाब से विभिन्न मुद्दों को निर्धारित करने का अधिकार है। पीठ ने कहा कि अदालत इससे कतई सहमत नहीं हो सकती। इसका निर्धारण सिर्फ अदालत द्वारा ही होना चाहिए।
अदालत ने इस संदर्भ में ऑनर किलिंग का उदाहरण भी दिया। इस पर वरिष्ठ वकील ने कहा कि अगर सुप्रीम कोर्ट कैनन लॉ के तहत विवाह और विवाह विच्छेद को स्वीकार नहीं करेगा तो कैथोलिक लोगों के समक्ष आईपीसी की धारा 494 केतहत मुकदमा झेलना पड़ेगा।
जवाब में अदालत ने कहा कि जरूर होगा, इस तरह का मुकदमा दर्ज होगा। ऐसे लोग इकेलेसियास्टिकल कोर्ट जाते ही क्यों हैं। सिविल कोर्ट और इकेलेसियास्टिकल कोर्ट अलग-अलग चीजें हैं। मान्यता सिर्फ सिविल कोर्ट की है।