क्यों खुश हैं भारत-अमेरिका और रो रहे हैं रूस-ईरान?
अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की लगातार कमजोर होती कीमतों के चलते जहां भारत, अमेरिका जैसे तेल आधारित अर्थव्यवस्थाओं की चांदी हो गई है वहीं रूस, वेनेजुएला और ईरान जैसी तेल आधारित अर्थव्यवस्थाओं की हालत खस्ता हो चली है।
ये देश इस वक्त भारी आर्थिक घाटा और संकट दोनों झेल रहे हैं। इस साल जून के बाद से अब तक कच्चे तेल की कीमतों में करीब 50 फीसदी की गिरावट देखने को मिली है।
इस साल जून में 115 डॉलर प्रति बैरल के मुकाबले कच्चे तेल कीमतें वर्तमान में 60 डॉलर से भी नीचे पहुंच चुकी हैं। इसके चलते बहुत से अर्थव्यवस्थाओं को अपनी रणनीति पर फिर से विचार करना पड़ा है।
इसका रूसी अर्थव्यवस्था पर सबसे प्रतिकूल असर देखने को मिला है। देश के कई आर्थिक जानकार पुतिन सरकार से पश्चिमी देशों के साथ बेहतर रिश्ते बनाकर अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की गुहार भी लगा चुके हैं।
यही नहीं तेल की कमजोर होती कीमतों ने ईरान की भी हालत पतली कर दी है। पहले से प्रतिबंध झेल रहे तेहरान को इस बात पर विचार विमर्श करने को मजबूर होना पड़ा है कि वह परमाणु कार्यक्रम पर पश्चिमी देशों के साथ समझौता करे या नहीं।
115 के मुकाबले 60 डॉलर/बैरल से नीचे पहुंचे तेल के दाम
तेल की घटी कीमतों से ईरान को प्रति माह करीब एक अरब डॉलर का अनुमानित नुकसान हो रहा है। इराक सरकार अपनी अर्थव्यवस्था में आए इस संकट को खत्म करने की कोशिश कर रही है।
इसी के तहत उसने अपने नौजवानों को दो साल तक सेना में काम करने का अनिवार्य विकल्प दिया है। ईरानी अर्थशास्त्री हुसैन रघाफार कहते हैं, ‘हम एक बड़े आर्थिक संकट के मुहाने पर हैं। सरकार को कदम उठाने की जरूरत है।’
मध्य पूर्व के तेल संपन्न देशों को भी चीन और अमेरिका जैसे सबसे बड़े आयातकों को अपनी आपूर्ति का प्रबंधन फिर से करने को मजबूर होना पड़ा है। वहीं अमेरिका, चीन और भारत जैसे देशों में पेट्रोलियम की कीमतें कमजोर होने से लोगों ने राहत की सांस ली है।
यहां की सरकारों के खजाने पर भी बोझ कम हुआ है। दुनिया का सबसे ज्यादा अनुमानित तेल भंडार रखने वाला वेनेजुएला इस समय संकट में है। उसे अपनी कल्याणकारी योजनाओं को पूरा करने में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।
वेनेजुएला की आय का करीब 95 फीसदी हिस्सा मात्र पेट्रोलियम के निर्यात से आता है। देश में महंगाई तेजी से बढ़ रही है। रूस के समाने भी ऐसा ही संकट है। उसकी आमदनी की करीब 50 फीसदी हिस्सा ऊर्जा क्षेत्र से आता है।
यूक्रेन के चलते उसकी कंपनियों को ग्लोबल स्तर पर कारोबार करने में वैसे भी दिक्कत आ रही है, ऐसे में तेल की कमजोर कीमतें उसकी अग्निपरीक्षा ही हैं। रूस अपनी मुद्रा में हाल में बड़ी गिरावट भी देख रहा है।