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भारत-बांग्लादेश के बीच बदलेगी रिश्तों की तस्वीर

Fri, 08 May 2015 09:32 AM IST
Updated Fri, 08 May 2015 09:32 AM IST
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india and bangladesh relation will be better in near future

भारत-बांग्लादेश के बीच रिश्तों की नई इबारत पर संसद ने भी दरियादिली दिखाई है। दोनों देशों के बीच बस्तियों और भूमि के आदान-प्रदान को मंजूरी देने वाले ऐतिहासिक संविधान संशोधन विधेयक को लोकसभा ने भी सर्वसहमति से पास कर दिया है। राज्यसभा में बुधवार को ही यह विधेयक सर्वसहमति से पारित हुआ था। विधेयक के पारित होने से 41 साल पुराना भारत-बांग्लादेश सीमा से जुड़ा मुद्दा सुलझ जाएगा।

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इस संविधान संशोधन विधेयक का समर्थन एवं सहयोग के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सहयोगियों के साथ-साथ विपक्षी दलों का भी आभार जताया। मोदी ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के पास जाकर उनका शुक्रिया अदा किया। विधेयक पारित होने के बाद पीएम ने बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना से भी बात की।
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सरकार ने उम्मीद जताई है कि इस समझौते के लागू होने से पड़ोसी देश के साथ संबंध और प्रगाढ़ होंगे। लोकसभा में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने राज्यसभा की मिशाल पेश करते हुए सांसदों से आह्वान किया कि वे भारत-बांग्लादेश के बीच रिश्तों को नई ऊंचाई देने वाले इस विधेयक को सर्वसहमति से पारित करें। इसके लिए पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को श्रेय देते हुए सुषमा ने कहा कि यह विधेयक पूर्ववर्ती सरकार के शासनकाल में लाया गया था। उन्होंने संसदीय समिति के अध्यक्ष शशि थरूर की भी सराहना की। विदेश मंत्री ने तृणमूल कांग्रेस की शंकाओं का भी निवारण किया।
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यह संविधान का 119वां संशोधन

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विदेश मंत्री ने कहा कि 6 मई, 1974 को भारत और बांग्लादेश के बीच हुए जमीन हस्तांतरण समझौते को प्रभावी बनाने के लिए संविधान की पहली अनुसूची को संशोधित किया गया है। इसे 2013 में संसद में पेश किया गया था।

2011 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने भूमि हस्तांतरण समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसे भूमि सीमा समझौता (एलबीए) के रूप में जाना जाता है। यह संविधान का 119वां संशोधन है। समझौते के लागू होने पर अगर बांग्लादेशी इलाके में रहने वाले भारतीय नागरिक वहीं पर रहना चाहते हैं तो उन्हें बांग्लादेश की नागरिकता दी जाएगी और अगर वे भारतीय इलाके में आते हैं तो उनका स्वागत किया जाएगा।

इसी तरह क्षेत्र में रहने वाले बांग्लादेशी नागरिक वहीं पर रहना चाहते हैं तो उन्हें भारत की नागरिकता दी जाएगी। इस विधेयक में बांग्लादेश के साथ असम, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और मेघालय के क्षेत्रों के आदान-प्रदान के समझौते को क्रियान्वित करने का प्रावधान है।

भारत को मिलेगी 510 एकड़ जमीन
सीमा समझौते के तहत भारत को 510 एकड़ जमीन जबकि बांग्लादेश को 10 हजार एकड़ भूमि मिलेगी। हालांकि, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का कहना है कि आंकड़ों पर ध्यान देने की जरूरत नहीं है। ये जमीनें दोनों देशों की सीमा के भीतर हैं। इस समझौते से हमारी सीमा नहीं सिकुड़ेगी। इससे अवैध आव्रजन पर रोक लगेगी। इससे जिन इलाकों में बाड़ नहीं लगे हैं, वहां बाड़ लगाए जा सकेंगे।

तीस्ता नदी जल बंटवारे का मुद्दा सुलझाना है बाकी
स्वराज का कहना है कि इस समझौते के बाद बांग्लादेश के साथ एक अहम मुद्दा सुलझा जाएगा। अब पड़ोसी देश के साथ केवल एक अहम मुद्दा बचा हुआ है। वह है तीस्ता नदी के जल का बंटवारा। दोनों देशों ने पिछले साल अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण के सहयोग से समुद्री सीमा का मसला सुलझा लिया।

करीब 30 हजार लोग आएंगे भारत
समझौते को क्रियान्वित करने के बाद बांग्लादेश की सीमा से भारत में आने वाले करीब 30 हजार लोगों के पुनर्वास के लिए केंद्र सरकार ने 3008 करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा की है। यह राशि पश्चिम बंगाल सरकार को दी जाएगी।

चार दशक पुराने समझौते के पूरा होने की घड़ी

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भारत और बांग्लादेश के बीच भूमि अदला-बदली समझौता बहुत जल्द हकीकत का रूप लेने वाला है। इस संबंध में संसद में बिल पारित हो गया है। इस समझौते से जुड़े कुछ ऐतिहासिक और अहम तथ्यों पर एक नजर -

विवाद की उत्पत्ति के क्या कारण हैं?
भारत और बांग्लादेश 4,096.7 किलोमीटर लंबी जमीनी सीमा साझा करते हैं। 1947 में यह सीमा (तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में) रेडक्लिफ अवार्ड द्वारा निर्धारित की गई थी। अवार्ड के प्रावधानों पर शुरुआत से ही विवाद खड़ा हो गया था।

1974 का भूमि सीमा समझौता क्या था?

सीमा के निर्धारण से जुड़ी दिक्कतों को दूर करने के लिए 16 मई 1974 को दोनों देशों के बीच जमीनी सीमा समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। बांग्लादेश ने तुरंत इस समझौते की पुष्टि कर दी थी। लेकिन भारत ने ऐसा नहीं किया क्योंकि वह कुछ क्षेत्रों पर अपना दावा कर रहा था। भारत ने जमीन पर मौजूद इन क्षेत्रों की ओर ध्यान दिलाया।

1974 के समझौते के मुताबिक, भारत को बेरूबाड़ी यूनियन नंबर 12 का आधा हिस्सा मिलना था। वहीं दाहाग्राम और अंगारपोटा एनक्लेव बांग्लादेश के ही पास रहने वाले थे। बांग्लादेश में पड़ने वाले दाहाग्राम और अंगारपोटा को जोड़ने के लिए भारत को तथाकथित ‘तीन बीघा एनक्लेव’ अनिश्चित अवधि के लिए बांग्लादेश को लीज पर देना था।

1974 का जमीनी सीमा समझौता पूरी तरह लागू हुआ। अलबत्ता करीब 6.1 किलोमीटर लंबी अनिर्धारित जमीनी सीमा में पड़ने वाले तीन सेक्टरों दईखाता-56 (पश्चिम बंगाल), मुहुरी नदी-बेलोनिया (त्रिपुरा) और लाठीटिला दुमाबाड़ी (असम) में एनक्लेवों की अदला बदली और विपरीत कब्जों (एडवर्स पोजेशंस) के सिवाय भारत ने इसकी पुष्टि नहीं की।

क्या है एनक्लेव का मामला?

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त्रुटिपूर्ण विभाजन के कारण 111 भारतीय एनक्लेव बांग्लादेश में रह गए। इनका कुल भूभाग 17,160.63 एकड़ है। वहीं 7,110.02 एकड़ के भूभाग वाले बांग्लादेश के 51 एनक्लेव भी भारत में रह गए। इन इलाकों में रहने वाले लोगों को उक्त देश के नागरिकों की तरह पूर्ण कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं हैं।

उनके पास बिजली, स्कूल और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। कानूनी एजेंसियों को भी इन इलाकों में पूरी तरह पहुंच हासिल नहीं है। एक संयुक्त गणना के अनुसार, दोनों देशों में पड़ने वाले इन एनक्लेवों में करीब 51,549 (बांग्लादेश में पड़ने वाले एनक्लेव में 37,334 भारतीय हैं) लोग रहते हैं।

मई 2007 में इन क्षेत्रों का दौरा करने वाले भारत और बांग्लादेश के संयुक्त प्रतिनिधिमंडल ने पाया कि इन एनक्लेव में रहने वाले लोग उसी देश में रहना चाहते हैं, जहां वे फिलहाल रह रहे हैं। ऐसे में यह माना गया कि भूमि की अदला-बदली के कारण इन क्षेत्रों में आबादी का ज्यादा पलायन नहीं होगा।

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