तो क्या जीत के बावजूद भी कम हुई नीतीश की ताकत!
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बिहार में चुनावी जीत के बावजूद भी नीतीश की सियासी ताकत कम हुई है। वर्ष 2010 के विधानसभा चुनाव में नीतीश के अपने दल जदयू को बहुमत के करीब 115 सीटें मिली थीं। तो 91 सीटों वाली भाजपा विकास के मजबूत इरादों को लेकर कंधे से कंधा मिलाकर उनका साथ दे रही थी।
मगर अपने नेतृत्व में तीसरा चुनाव जीतकर नीतीश देश की बड़ी शख्सियत तो बन गए हैं। लेकिन उनके सामने चुनौतियां भी बढ़ी हैं।
पिछले चुनाव की अपेक्षा उनकी राजनीतिक ताकत कमजोर हुई है। जेडीयू को 71 सीटें मिली हैं। मुख्यमंत्री पद पर उनकी पारी 81 सीटों वाले राजद नेता लालू यादव के सहारे चलेगी।
लालू के साथ सुशासन को साधना होगा मुश्किल
नीतीश को 27 सीटों वाली कांग्रेस का भी दामन थामे रखना होगा। ताकि लालू के बड़े होने के दबाव को कम कर सकें। सुशासन बाबू को बिहार की जनता में पैदा हुई विकास की भूख और आकांक्षाओं को लालू के साथ कटीलेदार राह पर चलते हुए पूरा करना होगा। भाजपा के साथ विकास की उनकी केमिस्ट्री का लोहा सूबे की जनता देख चुकी है।
लेकिन लालू के साथ विकास और सुशासन बाबू की छवि बचाए रखना भारी पड़ सकता है। हालांकि रेल मंत्री बनने के बाद से लालू में भी बदलाव देखने को मिला है।
बताया जा रहा है कि नीतीश के साथ गठबंधन को लेकर लालू पर उनके बेटों का ही दबाव था। शायद यही वजह है कि बिहार की अगली सरकार में दखल के बजाय लालू राष्ट्रीय राजनीति में अपने आप को धकेल रहे हैं।
वे पहले ही कह चुके हैं कि नीतीश की सरकार में उनके दोनों बेटों का रोल होगा। लेकिन उनकी सारी कवायद सरकार में लालू के रोल पर ही निर्भर रहेगी।