फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   in telangana muslims and dalits can change politics

तेलंगाना में दलित-मुस्लिम का दांव

Sat, 05 Apr 2014 08:04 AM IST
Updated Sat, 05 Apr 2014 08:04 AM IST
विज्ञापन
in telangana muslims and dalits can change politics

तेलंगाना में दलित-आदिवासी-मुसलमान और पिछड़े बहुसंख्यकों की आबादी लगभग 80 प्रतिशत है। फिर भी राजनीति में दखल और प्रभाव है रेड्डी, वेल्लांमा और कम्माओं का है। टीआरएस, कांग्रेस, भाजपा किसी भी दल में स्थिति बेहतर नही है।

विज्ञापन


हालांकि दलित चेतना का स्तर काफी ऊंचा है पर बहुजन आंदोलन उत्तर प्रदेश की तरह यहां जोर नहीं पकड़ पाया। ऐसे में जब नया राज्य बन रहा है, इस बहुसंख्यक वर्ग को अपने राजनीतिक भविष्य की चिंता होना स्वाभाविक है।
विज्ञापन


हैदराबाद के ओवैसी बंधुओं के भाषणों और पुराने हैदराबाद में मुस्लिम जनसंख्या के घनत्व को देखकर लगता है कि मुसलमानों की स्थिति बेहतर होगी, पर यहां भी स्थिति देश के अन्य राज्यों से कुछ खास बेहतर नहीं है।
विज्ञापन
विज्ञापन

‘हमारा दादी बागमती, हमारा दादा कुली कुतुब शाह’

in telangana muslims and dalits can change politics

दलित-आदिवासी और मुसलमान सामाजिक राजनैतिक कार्यकर्ता इस बात को गंभीरता से देख रहे हैं और इस कोशिश में हैं कि नए राज्य में शुरू से ही बराबरी और सामाजिक न्याय स्थापित हो।

कुली कुतुब शाह के दादा कुली कुतब-उल-मुल्क ने दक्कन के बहमनि सुल्तान से अलग होकर गोलकुंडा में कुतुब साम्राज्य की स्थापना की। कुली कुतुब शाह ने एक दलित औरत बागमती से प्रेम किया, शादी की और उसे नाम दिया ‘हैदर महल’।

उन्हीं हैदर महल के नाम पर उन्होंने मूसी नदी के किनारे 1591 में  हैदराबाद बसाया। दलित और मुसलमानों के इन्हीं संबंधों हवाला देकर आज हैदराबाद में तेलंगाना पर दलित-मुसलमान राजनीति खेली जा रही है।

तेलंगाना आंदोलन के जनक हैं दलित-आदिवासी छात्र

in telangana muslims and dalits can change politics

उस्मानिया यूनिवर्सिटी में आंदोलन के दौरान लाठी भाटा सहने वाले सैकड़ों छात्र, जिनमे लगभग 90 प्रतिशत दलित-आदिवासी हैं, आज यह महसूस कर रहे हैं कि उनके साथ धोखा हुआ है। उस्मानिया यूनिवर्सिटी तेलंगाना आंदोलन को ऊर्जा देने वाला सबसे बड़ा स्रोत रहा है।

शरत चमार अपने उपनाम ‘चमार’ पर गर्व करते हैं। शरत उस्मानिया यूनिवर्सिटी के छात्र रहे हैं और तेलंगाना आंदोलन में यहां उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। वे आंदोलन का एक बड़ा चेहरा हैं।

शरत का मानना है, ‘तेलंगाना पर पहला हक दलित, आदिवासी और मुसलमानों का है। उन्होनें ज्वाइंट एक्शन कमेटी के झंडे तले तेलंगाना के लिए आखिरी लड़ाई लड़ी जिसमें, के चंद्रशेखर राव की तेलंगाना राष्ट्र समिति, भाजपा और कई अन्य दल शामिल थे। तब केसीआर ने वादा किया था कि तेलंगाना का पहला मुख्यमंत्री दलित होगा और उप-मुख्यमंत्री मुसलमान। किंतु आज वो अपने वादे से पीछे हट रहे हैं।’

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed