महाराष्ट्र में अबकी बार बननी थी मुंडे सरकार!
गोपीनाथ मुंडे भले ही मोदी सरकार में केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री बन चुके थे, लेकिन महाराष्ट्र में उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि भाजपा कार्यकर्ता उन्हें राज्य के अगले मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहते थे।
यही कारण है कि पिछले कुछ दिनों से जब राज्य में अक्तूबर में होने जा रहे विधानसभा चुनावों की सरगर्मियां बढ़ीं, मुंडे का नाम भाजपा की तरफ से मुख्यमंत्री पद के लिए आगे बढ़ाया जा रहा था।
भले ही इसकी आधिकारिक घोषणा नहीं हुई थी, लेकिन कार्यकर्ताओं में मुंडे को लेकर इतना जोश था कि बीते रविवार को शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे के घर मातोश्री से बमुश्किल सौ मीटर की दूरी से गुजर रही सड़क से लगी दीवार पर भाजपा के दक्षिण मध्य मुंबई कार्यकर्ताओं ने लिख दिया थाः दिल्ली में मोदी सरकार... महाराष्ट्र में अबकी बार गोपीनाथ मुंडे सरकार। लेकिन मुंडे के असमय निधन के कारण महाराष्ट्र में भाजपा की संभावनाओं को धक्का लगा है।
भाजपा-शिवसेना के बीच अहम कड़ी
भाजपा की राजनीति में हमेशा महाराष्ट्र को अहम जगह मिलती रही है। भाजपा ने बीते 25 साल से भी अधिक समय में शिवसेना के साथ मिल कर महाराष्ट्र में राजनीति की है।
लेकिन हाल के लोकसभा चुनावों में जिस तरह से उसे भारी विजय मिली, उसे देखते हुए माना जा रहा था कि राज्य में पार्टी का वजन निस्संदेह शिवसेना के मुकाबले ज्यादा है। लेकिन शिवसेना इसे आसानी से स्वीकार नहीं करने वाली।
ऐसे में संभवतः मुंडे ही वह अकेले नेता थे जो भविष्य में भाजपा-शिवसेना के बीच होने वाले शक्ति परीक्षण में संतुलन का काम करते। इस समय मोदी की सरकार में भले ही महाराष्ट्र से सात मंत्री हों, लेकिन मुंडे एकमात्र शख्स थे जिनके शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के साथ मित्रवत समीकरण थे।
मध्य महाराष्ट्र (मराठवाड़ा) से आने वाले मुंडे ने ही लोकसभा चुनावों से पहले उद्धव के गुस्से को कम किया था, जब नितिन गडकरी की मनसे प्रमुख राज ठाकरे से मुलाकात ने भाजपा और शिवसेना के संबंधों में तनाव ला दिया था। उद्धव के गुस्से को शांत करने के लिए भाजपा आलाकमान ने मुंडे को आगे बढ़ाया था।
सड़क हादसे में गई जान
मुंडे के आकस्मिक निधन के बाद अब भाजपा को महाराष्ट्र में पार्टी और शिवसेना के बीच संतुलन के लिए एक नई कड़ी तलाश करनी होगी, जो आसान काम नहीं होगा।
विधानसभा चुनाव सामने देखते हुए भाजपा के पास वक्त भी कम है। वैसे यह भाजपा के लिए बेहद दुखद है कि उसने महाराष्ट्र में समय-समय पर ऐसे दो युवा नेताओं को खोया जिनकी नेतृत्व के वक्त में उसे सख्त जरूरत थी।
आठ साल पहले 2006 में भाजपा के स्वप्नदर्शी नेता प्रमोद महाजन भी अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए थे। यह नियति है कि महाजन से पारिवारिक रिश्ते में बंधे मुंडे भी अचानक संसार को विदा कह गए। गोपीनाथ मुंडे प्रमोद महाजन के बहनोई थे। महाजन की बहन प्रज्ञा से उनका विवाह हुआ था।
राजनीति के साथ निभाई पारिवारिक जिम्मेदारी
राजनीतिक जिम्मेदारियों के साथ मुंडे ने पारिवारिक जिम्मेदारियों का भी बखूबी निर्वाह किया। मुंडे की कोशिशों का ही नतीजा है कि पूनम महाजन को उनके पिता प्रमोद की राजनीतिक विरासत भाजपा में हासिल हो सकी।
इन लोकसभा चुनावों में मुंडे के मार्गदर्शन में ही पूनम ने लोकसभा चुनाव जीता। 12 दिसंबर 1949 को महाराष्ट्र के परली में एक मध्यमवर्गीय जन्मे मुंडे पांच बार चुनाव जीतकर राज्य विधानसभा में पहुंचे थे।
माता-पिता की तीसरी संतान गोपीनाथ किसान परिवार से थे। दो भाई उनसे छोटे हैं। मुंडे महाराष्ट्र विधानसभा में 1992-95 के दौरान विपक्ष के नेता भी रहे।
1995-1999 में वह मनोहर जोशी के नेतृत्ववाली सरकार में महाराष्ट्र के उप-मुख्यमंत्री थे। जबकि 2009 और 2014 में उन्होंने लोकसभा में भाजपा का प्रतिनिधित्व किया। 2009 में वह लोकसभा में भाजपा के उप नेता थे। हाल के लोकसभा चुनाव में मुंडे ने बीड संसदीय क्षेत्र में जीत हासिल की थी। उन्होंने एनसीपी के सुरेश धास को दो लाख से ज्यादा वोटों से हराया था।
अच्छे दोस्त थे मुंडे और महाजन
मुंडे को राजनीति में लाने का श्रेय उनके मित्र प्रमोद महाजन को था। दोनों कॉलेज के दिनों में दोस्त थे और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की सदस्यता उनके पास थी।
इसके बाद मुंडे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य बन गए। अपातकाल के दिनों में इंदिरा गांधी के खिलाफ प्रदर्शन करने का नतीजा यह निकला कि उन्हें नासिक सेंट्रल जेल भेज दिया गया। अपातकाल खत्म होने तक वे वहीं रहे।
यह मुंडे के सक्रिय राजनीति में आने का सबब बना। जनता पार्टी के टूटने के बाद जब भाजपा बनी तो मुंडे उसमें शामिल हुए। उन्हें पार्टी ने अपनी युवा शाखा भारतीय जनता युवा मोर्चा का अध्यक्ष बनाया। इसके बाद वे लगातार पार्टी में आगे बढ़ते गए।