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मोदी लहर जरूर है लेकिन रफ्तार नहीं है इसमें

Tue, 01 Apr 2014 01:13 PM IST
मधुकर उपाध्याय/वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम
मधुकर उपाध्याय/वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम Updated Tue, 01 Apr 2014 01:13 PM IST
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In lahar modi speed is not there

लहरें साहिल से टकराकर लौट जाती हैं। बिखर जाती हैं। टूट जाती हैं। ये उनकी नियति है। वे किनारे आती जरूर हैं, टिकती नहीं। जल्दी ही किनारे लग जाती हैं क्योंकि किनारा कभी उनका स्थायी पता नहीं रहा। 'किनारे लगना' मुहावरे में किसी अच्छे अर्थ में नहीं आता।

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इसे समझने के लिए अर्थ विस्तार की आवश्यकता नहीं है। आमफहम मुहावरों की ताकत और दिक्कत यही है कि उनके अर्थ बिना प्रयास फौरन खुल जाते हैं। लहरों का आना मेहमान की तरह होता है, जिनकी वापसी आने में निहित रहती है। उनकी इज्जत उनके आगमन पर नहीं, इस बात पर निर्भर करती है कि वे कितने पल की मेहमान हैं। यह खुद एक अलग मुहावरा है।
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रवानगी तय न हो तो कोई मेहमान रह भी नहीं सकता। कुछ मेहमान लहरें, पूरे लवाजमात के साथ इस कदर गरजती-उफनती तशरीफ लाती हैं कि किसी को भी भ्रम हो जाए। लगे कि उनके इरादे कुछ और हैं। लेकिन शुरुआती तड़क-भड़क ज्यादा देर टिक नहीं पाती। अंत में होता वही है, जो पहले से होता आया है-बिखरना या वापसी।
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गुजरात की मोदी लहर

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प्रकृति के सामने इंसान बौना होता है, और रहेगा। बावजूद इसके, प्रकृति की रचना के बरक्स खुद को रखने का लोभ लोग संवरण नहीं कर पाते और तब टक्कर होती है। ये हवाई जहाज और साइकिल के टकरा जाने की तरह है। संभावना कम होती है, पर ऐसा हुआ तो नतीजा जानने का किसी को इंतज़ार नहीं होता। सबको पता होता है।

अरब सागर की लहरें लखपत से लेकर कोलाक तक गुजरात को छूती हैं, जो भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी का गृह राज्य है। वे पिछले बारह साल से उसके मुख्यमंत्री हैं और उनकी एक लहर राज्य में साफ महसूस की जा सकती है। यह लहर बनाने में मोदी समर्थकों के साथ उनके कमजोर विरोधियों की भी बड़ी भूमिका है। वे इस कदर कमजोर हैं कि लोगों ने उन्हें विकल्प की तरह देखना बंद कर दिया है।

ऐसे में आम लोग कभी मन से, कभी डर से, कभी मजबूरी में लहर के साथ दिखने लगते हैं। समुद्री लहरें वलसाड जिले में कोलाक पार करने के बाद भी अपनी मस्ती में चलती रहती हैं। अठखेलियां करती साहिल तक आती हैं और उसे छूकर लौट जाती हैं। दमण में भी मोदी लहर चलती है, करीब-करीब गुजरात की तरह।

कर्नाटक में कमजोर लहर

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इन इंसानी लहरों की मौजूदगी और उनकी तासीर इससे आगे कमजोर पड़ती दिखाई देने लगती है। महाराष्ट्र के समूचे कोंकण इलाके में सागर की लहरें दिखती हैं, मोदी की नहीं। गोवा के प्रसिद्ध तटों पर, इस बात के बावजूद कि वहां भाजपा सरकार है, यह लहर अनुपस्थित ही रहती है। गोवा की समस्याएं और उसकी आबादी की संरचना नतीजे तय करती है और अपने फैसले करने से पहले लहरों से नहीं पूछती।

कोंकण में करीब-करीब गायब मोदी लहर कर्नाटक के तटीय इलाकों कारवाड़ और अंकोला में महसूस की जा सकती है लेकिन उसमें गुजरात वाली रफ़्तार नहीं है। लहर के कमजोर होने का सबूत इक्का-दुक्का पोस्टर और बैनर हैं, जिन पर अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी की तस्वीरें हैं।

पूरे देश में जिस तरह का माहौल बना दिया गया है, लगता है कि भाजपा का अश्वमेध रथ दिल्ली जाकर ही रुकेगा। लेकिन कई बार स्थानीय लोगों से बात करते हुए संदेह होता है। वे बार-बार कहते हैं कि घोड़े दौड़ रहे हैं, पर वे दौड़ने से ज्यादा हिनहिनाते हैं। आवाजें हैं, असर नहीं है। माहौल है, ज़मीनी हकीकत नहीं है।

इनकमिंग फ्री

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मोबाइल फ़ोन टैक्नोलॉजी के दौर में अगर उसकी शब्दावली में बात करें तो भाजपा में इन दिनों 'इनकमिंग फ्री है'। हालांकि 'आउटगोइंग' से भाजपा को नुकसान होता नहीं दिखता लेकिन फ्री इनकमिंग का ख़ामियाजा उसे भुगतना पड़ सकता है।

समाजशास्त्र के विद्वानों के मुताबिक़ लहर एक फ़ासीवादी सोच है, जिसका कुल मक़सद आम जनता की सोचने की क्षमता को प्रभावित करना होता है। कुछ देशों में ऐसी लहरें कामयाब हो जाती हैं लेकिन भारत जैसे वैविध्य वाले देश में लोग अब भी लहरों को वोट देने से गुरेज़ करते हैं।

लगता है वो लहरों को मेहमान ही मानते हैं जो लौटेंगी, बिखरेंगी या टूट जाएंगी। उस वक़्त, जब उन्हें ज़रूरत होगी, वे लहर के पास नहीं जा पाएंगे। उन्हें अपनी शिकायतों की सुनवाई के लिए हाड़माँस का इंसान चाहिए। हलक़ सूख जाए तब भी प्यासा आदमी सागर की लहरों की ओर नहीं देखता। उसे अपने आसपास का कोई कुआँ चाहिए, जिससे मीठा पानी निकले।

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