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नए साल के जश्न में राजस्थान की झलक लापता

Tue, 30 Dec 2014 11:02 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, जयपुर
ब्यूरो/अमर उजाला, जयपुर Updated Tue, 30 Dec 2014 11:02 PM IST
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In celebration of the new year, missing a glimpse of Rajasthan

राजस्थान में नए साल के होनेवाले आयोजनों पर नजर डालें, तो ऐसा लग रहा है कि अब वे जमाने लद गए, जब पर्यटकों को राजस्थानी झलक परोसी जाती थी। रंगीले राजस्थान को पहचान देनेवाले कालबेलिया, घूमर, कठपुतली जैसी नृत्य कलाएं व परम्परागत वाद्य यंत्रों से निकलनेवाली लोकगीत की तान व धुनें खो सी गईं हैं।

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ये विदेशी पर्यटकों का मन मोह लेती थीं। माहौल देखकर आभास हो रहा है कि मरुधरा की खुशबू फिजाओं से गायब सी हो गई है। सरकार की तरफ से भी राजस्थानी संस्कृति व परम्पराओं को बढ़ावा देने के कोई प्रयास दिखाई नहीं दे रहे।
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राजस्थान में जयपुर सहित सभी पर्यटक स्थलों पर परम्परागत रंगत अब विदेशी चका-चौंध में बदल गई है। पाश्चात्य रंग हावी होने के कारण अब होटलों, रेस्त्रां, रिसोर्ट आदि में नए साल के आयोजन में विदेशी बालाओं की डांस परफॉर्मेंस होंगी।
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कहीं ये बालाएं हिप-हॉप पेश करेंगी, तो कहीं बेले या फिर फैशन शो। यहां तक की थीम पार्टियों में भी विदेशी झलक होगी। खासकर जयपुर में तो माहौल पूरी तरह ऐसा ही माहौल छाया हुआ है। पर्यटन के लिहाज से राजस्थान में यह पीक सीजन है।

विदेशी पर्यटक जो यहां के समृद्ध इतिहास के कारण खिंचे चले आते हैं, उन्हें केवल जैसलमेर जैसे पर्यटन स्थलों तक सीमित होना पड़ रहा है। जैसलमेर में भी रेतीले धोरे (टीले) हैं, जहां टेंट लगाकर नए साल में पार्टिंयां आयोजित की जाती हैं। यहां जरूर कालबेलिया नृत्य, घूमर, जैसे नृत्य होंगे व लोकगीत गूंजेंगे, लेकिन यहां भी ऐसे आयोजन कम होते जा रहे हैं।

 इधर, पर्यटन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि होटल और रेां जैसे निजी संस्थानों को राजस्थानी आयोजनों के लिए बाध्य नहीं कर सकते। पर्यटन स्थलों पर नए वर्ष के अवसर पर राजस्थानी कार्यक्रम आयोजित करने को लेकर फैसला भी राज्य सरकार के हाथ में है। यदि सरकार चाहे, तो बड़े पर्यटन स्थलों पर ऐसे आयोजन किए जा सकते हैं।


वहीं गाइड व टूर ऑपरेटर विक्रम राठौड़ का कहना है कि 'नए वर्ष पर अधिक से अधिक आय अर्जित करने के लिए स्थानीय लोगों को आकर्षित करने का चलन बढ़ता जा रहा है। राजस्थानी थीम बेस कार्यक्रम स्थानीय लोगों के लिए नए नहीं होंगे, इस कारण होटलों-रेस्त्रां आदि जगहों पर ये गायब होते जा रहे हैं। होटलों, रेस्त्रां व रिसोर्ट आदि के संचालक अब केवल विदेशी पर्यटकों से होनेवाली आय के भरोसे नहीं बैठते।

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