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आम चुनाव पर कितना गहरा होगा 'संघ का साया'
Updated Wed, 18 Sep 2013 01:49 PM IST
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लालकृष्ण आडवाणी को पूरी तरह दरकिनार करते हुए जिस तरह से नरेंद्र मोदी को भारतीय जनता पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित किया गया, उसके बाद राजनीतिक विश्लेषक लिखने लगे हैं कि साल 2014 में होने वाला आम चुनाव कांग्रेस और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बीच लड़ा जाएगा।
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दूसरे शब्दों में, इस बात के संकेत बार-बार मिल रहे हैं कि चुनाव में सफलता हासिल करने के लिए संघ सीधे-सीधे बीजेपी को रिमोट कंट्रोल से साध रहा है।
इसके लिए उसने बीजेपी में अपने सबसे पुराने और सबसे विश्वसनीय नेता आडवाणी तक को धता बताकर मोदी को आगे लाकर खड़ा कर दिया।
लेकिन आडवाणी की बजाए मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार स्वीकार करके संघ के नेताओं ने कई स्तर पर समझौता किया है क्योंकि संघ से नरेंद्र मोदी का रिश्ता उतार-चढ़ावों से भरा रहा है।
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उन्होंने गुजरात में विश्व हिंदू परिषद और आरएसएस के नेताओं को सरकार के काम-काज से दूर रखा है, जिससे संघ से उनके रिश्तों में खटास भी आई। लेकिन जिस तरह लगातार बार तीन बार मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने गुजरात विधानसभा चुनाव जीता है उसके बाद मोदी को आशीर्वाद देना संघ की मजबूरी भी बन गई है।
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मतविरोध
राजनीतिक विश्लेषक अदिति फड़निस ने बताया कि "संघ के ही एक वरिष्ठ नेता ने मुझसे कहा कि आरएसएस में इस बात को लेकर ये सोच भी है कि कहीं वो एक नए रूप में इंदिरा गाँधी (जैसे व्यक्तित्व) को तो सत्ता में नहीं लाना चाह रहे।"
वरिष्ठ पत्रकार अदिति फड़निस मानती हैं कि मोदी को लेकर आरएसएस में भी एकमत नहीं है।
उन्होंने कहा, “संघ के ही एक वरिष्ठ नेता ने मुझसे कहा कि आरएसएस में इस बात को लेकर ये सोच भी है कि कहीं वो एक नए रूप में इंदिरा गाँधी (जैसे व्यक्तित्व) को तो सत्ता में नहीं लाना चाह रहे।”
नरेंद्र मोदी के बारे में ये प्रसिद्ध है कि इंदिरा गाँधी की ही तरह ही वो भी मज़बूत हाथ से सत्ता चलाते हैं।
फड़निस कहती हैं, “मोदी से अगर आप सहमत नहीं हैं तो आप उनके दुश्मन हैं।” बहुत से लोग मोदी को निर्णायक मगर लोगों को बाँटने वाले नेता के रूप में देखते हैं।
लेकिन खुद नरेंद्र मोदी अब ये महसूस करने लगे हैं कि अगर उन्हें देश का प्रधानमंत्री बनना है तो उन्हें अपने तौर-तरीक़े और विरोधियों पर हमले करने के तरीक़े बदलने होंगे।
इसीलिए एक ओर अब वो मुस्लिम टोपी पहने लोगों से गले मिलते हुए फोटो खिंचवाने में परहेज़ नहीं करते और दूसरी ओर पाकिस्तान की आलोचना करते वक़्त “मियाँ मुशर्रफ़” जैसी कूटनीतिक भाषा का इस्तेमाल करते हैं।
हाल ही में हरियाणा में रिटायर्ड फ़ौजियों की एक सभा में उन्होंने अपने ख़ास तीखे अंदाज़ की बजाए कूटनीतिक भाषा का इस्तेमाल किया और इस फ़र्क को सबने नोटिस किया।
अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में उनके राजनीतिक सलाहकार रहे सुधींद्र कुलकर्णी ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखे एक लेख में कहा है कि अगर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन-2 सत्ता में आना चाहता है तो उसे एक अटल बिहारी वाजपेयी-2 की ज़रूरत होगी।
दूसरे वाजपेयी?
धर्म संसद में मोदी को प्रधानमंत्री बनाए जाने का मुद्दा फिर से उठा।
तो सवाल ये है कि क्या नरेंद्र मोदी अटल बिहारी वाजपेयी–2 बन सकते हैं?
और छवि बदलने में माहिर मोदी अटल–2 बन भी जाएँ तो वो आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद के कितने काम के रह जाएँगे?
अटल बिहारी वाजपेयी जब सत्ता के शिखर पर पहुँचे थे तो उन्होंने संघ और विहिप के हर इशारे को समझने से इनकार कर दिया जिसके चलते उन्हें संघ की नाराज़गी का सामना भी करना पड़ा।
संघ के शूल यहाँ तक बढ़ गए थे कि एक बार वाजपेयी ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफ़े तक की धमकी दे डाली थी।
सत्ता के साथ संघ का हमेशा प्रेम और वैर का रिश्ता रहा है। नेहरू और इंदिरा गाँधी के दौर में आरएसएस सत्ता की परिधि तक भी नहीं पहुँचने पाया था लेकिन इमरजेंसी के बाद उसने सत्ता की राजनीति में गहरी पैठ बना ली।
पहले जनता पार्टी सरकार में और फिर दो दशक बाद अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में आरएसएस का प्रभाव ज़बरदस्त तरीक़े से बढ़ा।
सत्ता का फ़ायदा संघ को भरपूर मिला और उसके कई समर्थक अफ़सरशाही में शामिल हुए।
लेकिन पिछले दस साल से बीजेपी सत्ता से बाहर है और इस बार बीजेपी के चुनाव हारने का मतलब लगातार पंद्रह साल तक दिल्ली की सत्ता संघ के प्रभामंडल से बाहर हो जाएगी। ये स्थिति अब संघ को बेचैन किए दे रही है।