फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   if you will eat burger, god will punish you

तुम बर्गर खाओगी, तो भगवान तुम्हें सजा देंगे!

Mon, 02 Mar 2015 03:46 PM IST
Updated Mon, 02 Mar 2015 03:46 PM IST
विज्ञापन
if you will eat burger, god will punish you

मेरी आठ साल की बेटी मेहुली का स्कूल में पहला दिन था। उसे ऑकलैंड के बाहरी इलाक़े में एक प्राइमरी स्कूल में दाखिल कराया गया था।

विज्ञापन


अभिभावकों के साथ एक बैठक के दौरान मेरी बेटी को पढ़ाने वाली टीचर जेनी ने मुझे बातचीत का न्योता दिया। सीखने के तरीकों और इस नई छात्रा की खामियों- खासियतों पर चर्चा के बाद उन्होंने व्यक्तित्व निर्माण के बारे में बात करनी शुरू की।

अंत में उन्होंने हर छात्र के लिए एक ख़ास दोस्त बनाने के नियम की बात छेड़ी।

पढ़ें विस्तार से
न्यूज़ीलैंड की स्कूली व्यवस्था में हर छात्र को अपने सहपाठियों में किसी के साथ जोड़ा बनाना होता है, जिन्हें ‘बडी’ कहते हैं। इन जोड़ों से उम्मीद की जाती है के वे क्लासरूम की सभी गतिविधियों से लेकर खेल तक में एक दूसरे की मदद करेंगे।
विज्ञापन


इसके पीछे फ़लसफ़ा यह है कि सहपाठियों के बीच मेलजोल बढ़ाने में मदद की जाए और यह भी तय किया जाए की क्लास में हर किसी का कोई दोस्त हो। दोस्त चुनते समय टीचर अक्सर संबंधित छात्र की पृष्ठभूमि और पारिवारिक इतिहास खंगालते हैं, ताकि दोनों में कुछ बातें समान हों।
विज्ञापन
विज्ञापन

ऑकलैंड सबसे बड़ा शहर है

if you will eat burger, god will punish you

ग़ौरतलब है कि न्यूज़ीलैंड अप्रवासियों का देश है और ऑकलैंड सबसे बड़ा शहर है, जहां अधिकांश अप्रवासी बसना चाहते हैं। इसलिए स्वाभाविक है कि जब कोई नया छात्र पहुंचता है तो शिक्षक इसका ध्यान रखते हैं कि वो स्थानीय संस्कृति से कितना परिचित है।

हालांकि, मूल रूप से भारत का होने के बावजूद हमने दुनिया में कई देश देखे हैं और आख़िरकार ऑकलैंड में रहने आए हैं क्योंकि मैं यहां एक विश्वविद्यालय में पढ़ रही थी। स्वाभाविक रूप से मेहुली कई संस्कृतियों के संपर्क में आने के कारण घुलमिल जाती है। वह सार्वजनिक रूप से बेधड़क बोल लेती है और आसानी से दोस्त बना लेती है।

हालांकि उसकी टीचर जेनी ने उसकी इस विशेषता को पूरी तरह नज़रअंदाज किया।
जड़ों से जुड़ाव

जेनी सिंगापुर में रहने वाले चीनी परिवार की दूसरी पीढ़ी से हैं। उन्होंने मेहुली के लिए भारतीय मूल की ही एक अन्य लड़की कीर्ति को ‘बडी’ चुना। जब इसका कारण पूछा गया तो उन्होंने बताया, “इससे मेहुली को अपनी जड़ों से जोड़े रखने में मदद मिलेगी।”

यह देश द्विभाषी है और बहुसांस्कृतिक शिक्षा को प्रोत्साहित करता है। जेनी के तर्क से मैं संतुष्ट नहीं हुई। कीर्ति की मां से मैं मिल चुकी हूं और मैं मेहुली से कीर्ति के बारे में दूसरे संदर्भों में सुन चुकी हूं। इस अनुभव के बाद मैंने इस स्थिति को समझने की कुछ ऐसी कोशिश की- पहला, भारत एक बहुभाषी देश है। मेहुली और कीर्ति एक जैसी भाषा नहीं बोलतीं।

सांस्कृतिक टकराव

if you will eat burger, god will punish you

तो वो कैसे समान जड़ों को साझा करेंगी? कीर्ति एक ऐसे संकीर्ण और रुढ़िवादी परिवार से है, जिनके मूल्य और परम्पराएं उनसे बिल्कुल ज़ुदा हैं, जिनकी मेहुली आदी रही है। एक बार वह अपने लंच बॉक्स में चीज़ बर्गर ले गई थी और कीर्ति ने उससे इसे न खाने के लिए कहा था।

उसने कहा था, “चीज़ बर्गर में गोमांस होता है। अगर तुम गाय खाओगी, भगवान बहुत नाराज़ होगा और तुम्हें सज़ा देगा। तुम्हें सुअर भी नहीं खाना चाहिए। इसीलिए मैं सॉसेज़ नहीं लाती। तुम केवल चिकन और मछली खा सकती हो।”

यह अजीब तर्क ऐसी बच्ची का था जो ऑकलैंड जैसे एक मुक्त शहर और एक बहुसांस्कृतिक परिवेश में पली बढ़ी है।

रूढ़िवादी परवरिश

if you will eat burger, god will punish you

स्वाभाविक है कि यह कीर्ति के पारिवारिक मूल्यों और उसकी परवरिश का नतीजा है। पश्चिमी उदारवाद के साथ सक्रिय रूप से जुड़े होने के नाते मैं निश्चित तौर पर नहीं चाहती थी कि मेहुली आगे भी कीर्ति के साथ दोस्ती रखे और रुढ़िवादी मूल्यों का उस पर असर पड़े।

दूसरे, अगर हम अपनी धरती छोड़कर दूसरे देश में आए हैं तो अपनी संस्कृति से चिपके रहने के बजाय, क्यों न इस दौरान हम दूसरी संस्कृति को जाने-समझें?

मेहुली को अलग किस्म के भोजन, संगीत और कला से परिचय कराने के इस बिरले मौके को मैं गंवा दूंगी। कहावत है, “बच्चे स्पंज की तरह होते हैं, जितना आप उन्हें अलग-अलग परिस्थितियों में जाने का मौक़ा देंगे, वे उतना ही उसे मन में बिठाएंगे।” मुझे इसमें विश्वास है।

इस मायने में मेहुली को ‘बडी’ चुनने का जो मौक़ा मिला है और इसके पीछे जो उद्देश्य है वह उल्टा साबित होने वाला है। क्या मेरा तर्क वाजिब है? या आपको लगता है कि जेनी की बात में दम है?

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed