विदेशी अनुदान चाहिए तो एनजीओ नहीं कंपनी बनाइए
अगर आप भारत में कोई स्वयंसेवी संगठन चला रहे हैं और उम्मीद कर रहे हैं कि आपको किसी विदेशी संगठन से अनुदान के रूप में पैसे मिल जाएंगे, तो भूल जाइए। इसके लिए आपको एक कंपनी बनानी पड़ेगी और पैसे किसी दूसरी कंपनी से ही आ सकेंगे।
यानी इसे व्यावसायिक आदान प्रदान की तरह से दिखाकर ही अनुदान मिल सकता है। इसकी वजह है केंद्र की एनडीए सरकार की नीतियां जिसकी वजह से विदेशी स्वयंसेवी संगठनों का भारत में काम करना मुश्किल होता जा रहा है। शुक्रवार को फोर्ड फाउंडेशन को लेकर आई खबर इसकी एक नई कड़ी है।
खबरें हैं कि अमरीका के सुपरिचित संगठन फोर्ड फाउंडेशन के लिए अनिवार्य कर दिया गया है कि वह किसी भारतीय संगठन को अनुदान देने से पहले केंद्रीय गृहमंत्रालय से अनुमति ले। कहा जा रहा है कि गुजरात सरकार की इस शिकायत के बाद यह कदम उठाया गया है कि फोर्ड फाउंडेशन की ओर से कई ऐसी संस्थाओं को पैसे दिए जा रहे थे जिनके पास विदेशी पैसा लेने की अनुमति देने वाले कानून (एफसीआरए) का पालन नहीं किया जा है।
इसके पीछे है क्या राजनीतिक वजहें?
लेकिन सच यह है कि इस संस्था को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी दोनों असहज रहे हैं। इसकी जाहिर वजह तो यह थी कि फोर्ड फाउंडेशन ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की संस्था 'कबीर' को पैसे दिए थे तो कभी गुजरात दंगों के मामले में नरेंद्र मोदी से लोहा ले रहीं तीस्ता सीतलवाड़ की संस्था 'सबरंग कम्युनिकेशन' को पैसे दिए।
लेकिन संघ के नेताओं की शिकायत है कि अमरीका और यूरोपीय देशों की ये संस्थाएं दरअसल अनुदान की आड़ में चर्चों और दूसरी ईसाई संस्थाओं की सहायता करते हैं जो धर्मांतरण में लगे हुए हैं। उनका यह भी आरोप है कि ये विदेशी संस्थाएं षडयंत्र के तहत भारत में विकास को रोकना चाहती हैं।
इन्हीं आरोपों के आधार पर इससे पहले पर्यावरण के मामलों पर काम करने वाली संस्था ग्रीनपीस को भारत में चंदा लेने पर रोक लगाई जा चुकी है। इसके अलावा कई ऐसी संस्थाएं हैं जिन्हें इसी तरह की रोक का सामना करना पड़ रहा है।
विदेशी संस्थाओं में फैला डर
ऐसी ही कुछ विदेशी सहायता के दम पर मध्य भारत के आदिवासी इलाकों में काम करने वाले एक सामाजिक कार्यकर्ता ने नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर अमर उजाला से कहा, "सारी विदेशी संस्थाएं डरी हुई हैं। कुछ संस्थाएं तो पैसा देने में सीधे असमर्थता जता रही हैं क्योंकि उनके बैंक खाते जांच के नाम पर सील कर दिए गए हैं। लेकिन ज्यादातर कह रही हैं कि आप एक कंपनी बना लीजिए तो हम अपनी कंपनी से पैसा दे देंगे।"
वे बताते हैं कि या तो बड़ी विदेशी संस्थाओं ने किसी छद्म नाम से कंपनी बनाकर उसे रजिस्ट्रार और कंपनीज में रजिस्टर करवा लिया है या फिर इसकी तैयारी में हैं। उनका कहना है कि ये एक कानूनी रास्ता होगा जिससे सरकार के सीधे हस्तक्षेप से बचा जा सकेगा। हालांकि इस बात को लेकर वे खुद भी आश्वस्त नहीं हैं कि यह व्यवस्था कितने दिनों तक चल सकेगी।
स्वयंसेवी संगठनों पर हो रही इस कार्रवाई के संकेत पिछले लोकसभा चुनावों के समय ही हो चुका था जब भारतीय जनता पार्टी और संघ ने विदेशी संस्थाओं की फंडिंग को चुनावी मुद्दा भी बनाया था। पिछले दिनों प्रधानमंत्री ने जब कहा था कि पांच सितारा एक्टिविस्ट (सामाजिक कार्यकर्ता) विकास में बाधा बन रहे हैं तो इस बात को बल मिला था कि आने वाले दिनों में सरकार का रुख और सख्त होगा।