'वर्ष 2004 में अगर प्रणब होते पीएम तो नहीं होती पराजय'
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पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा है कि वर्ष 2004 में प्रणब मुखर्जी की जगह मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाए जाने की घोषणा से न केवल कांग्रेसी बल्कि पार्टी के बाहर के लोग भी आश्चर्यचकित थे।
अब इनमें से कई का कहना है कि अगर ऐसा नहीं किया गया होता तो 2014 में लोकसभा चुनाव के परिणाम अलग होते। हालांकि, खुर्शीद ने अपनी किताब ‘द अदर साइड ऑफ माउंटेन’ में यह भी लिखा है कि मनमोहन सिंह को लेकर शुरुआती विमुखता के बाद 2009 में पार्टी की वापसी के बाद इस फैसले को सही माना गया।
मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल में विदेश मंत्री रहे खुर्शीद ने कहा है कि उन्हें मनमोहन सिंह का विश्वास प्राप्त था। विदेश मंत्री के रूप में उनको पूरी आजादी दी गई थी। पीएम पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों में विशेष रुचि रखते थे।
चुनावी नतीजों के बाद उन्होंने किताब लिखना शुरू किया
खुर्शीद का कहना है पिछले साल 16 मई को आए 2014 के चुनावी नतीजों के बाद उन्होंने किताब लिखना शुरू किया। उस दिन यूपीए सरकार के सभी मंत्री चुनावी क्षेत्रों से दिल्ली लौटे थे। वे सभी परास्त योद्धा की तरह थे। उस दिन कांग्रेस में माहौल बेहद गमगीन था। उन्हें भी महसूस हुआ कि कांग्रेस गंभीर अस्तित्व के संकट से जूझ रही थी। उस वक्त कुछ लोगों ने कहा कि यह नेतृत्व का संकट है।
खुर्शीद के मुताबिक सोनिया और राहुल दोनों कांग्रेस के चुने हुए नेता हैं और पार्टी के भीतर कहीं भी ऐसा नेता नहीं है जो वैकल्पिक नेतृत्व दे सके। खुर्शीद का दावा है कि अपनी किताब के जरिये उन्होंने सच्चाई सामने लाने की कोशिश की है।
2जी स्पेक्ट्रम, 2010 के कॉमनवेल्थ और कोलगेट घोटालों से यूपीए की छवि धूमिल हुई। लेकिन इन आरोपों में कहीं भी धन का लेन देन नहीं हुआ न ही किसी भी नेता या नौकरशाह के पास आय से अधिक संपत्ति पाई गई। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि फैसले गलत थे या कोई और होता तो वह फैसले अलग ढंग से लेता जो संभावित भ्रष्टाचार का अनुमान लगा लेता।