‘अपनों’ से ही घायल हो रहे मोदी?
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
संघ परिवार से जुड़े लोगों के 'ज़हरीले' बयानों ने नरेंद्र मोदी को एकबारगी सांसत में डाल दिया है। पिछले कुछ दिन से मोदी अपनी छवि को सौम्य बनाने की कोशिश कर रहे हैं। इस बयानबाज़ी ने इस छवि-निर्माण को कुछ देर के लिए छिन्न-भिन्न कर दिया है।
क्या ये अमानत में ख़यानत है? अपनों की दगाबाज़ी? या अतिशय नासमझी? इसे संघ परिवार के भीतर बैठे मोदी विरोधियों का काम मानें या कोई और बात?
पार्टी ने अमित शाह के बयान पर ठंडा पानी डालकर हालात सुधारे ही थे कि विहिप नेता प्रवीण तोगड़िया और बिहार में भाजपा के एक प्रत्याशी गिरिराज सिंह के बयानों ने सारी कोशिशों पर काफ़ी पानी फेर दिया। शिवसेना के रामदास कदम ने रही-सही कसर पूरी कर दी।
मोदी का बचाव
पीछा छुड़ाने के लिए नरेंद्र मोदी ने इन टिप्पणियों को 'ग़ैर ज़िम्मेदाराना' ज़रूर करार दिया है, पर 'कालिख' लग चुकी है। फिलहाल मोदी खुद और उनकी पार्टी नहीं चाहती कि विकास और सुशासन का जो दावा वे कर रहे हैं, उस पर इन बयानों की आंच आए।
मोदी ने एक के बाद एक दो ट्विटर संदेशों में कहा, "'जो लोग बीजेपी का शुभचिंतक होने का दावा कर रहे हैं, उनके बेमतलब बयानों से कैंपेन विकास और गवर्नेंस के मुद्दों से भटक रही है। मैं ऐसे किसी भी ग़ैर ज़िम्मेदाराना बयान को खारिज करता हूं और ऐसे बयान देने वालों से अपील कर रहा हूं कि वे ऐसा न करें।"
तोगड़िया का बदला?
नरेंद्र मोदी और प्रवीण तोगड़िया की लाग-डांट आज की नहीं है। गुजरात में तोगड़िया को प्रभावहीन बनाने में नरेंद्र मोदी की अहम भूमिका बताई जाती है। तोगड़िया ने भी मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने का हमेशा विरोध किया। तब क्या माना जाए कि ये मोदी को सांसत में डालने का प्रयास है?
ये भी कहा जा सकता है कि लंबे अरसे से हाशिए पर पड़े तोगड़िया को इस बयान के बहाने अपनी राजनीति चमकाने का मौका मिला है। उनके बयानों पर यूं भी कोई ध्यान नहीं देता था। गुजरात के दंगों के बाद से मोदी ने अपना सारा ध्यान गवर्नेंस पर लगाना शुरू किया है। तोगड़िया के लिए ये कोई काम न हुआ। तोगड़िया वाली बात समझ में आ भी जाए, पर गिरिराज सिंह के साथ तो ये बात नहीं थी।
इन तीखे बयानों के अलावा देखा-देखी कुछ छुटभैया नेताओं ने इसी झोंक में बोलना शुरू कर दिया है। ये नहीं भुलाया जाना चाहिए कि सन 1992 में बाबरी विध्वंस के दौरान इस किस्म के भाषणों की बाढ़ आई थी और लोग गलियों-चौराहों और पान की दुकानों में इन भाषणों के टेपों को सुनते थे।
क्या रणनीति के तहत आए जहरीले बयान?
पर ये भी माना जा सकता है कि ऐसा पार्टी की किसी रणनीति के तहत हुआ हो। मसलन एक-दो 'ज़हरबुझे' बयान दिलवाकर और उन बयानों के ख़िलाफ़ खड़ा दिखाकर मोदी की छवि को और चमकाने की ये रणनीति हो?
यह भी सम्भव है कि बयानों के तीर छूट जाने के बाद पार्टी इस मौके का फ़ायदा उठाना चाहती हो। अलबत्ता ऐसा नहीं लगता कि यह योजनाबद्ध तरीके से हो रहा है। इसके पीछे अराजकता और अनुशासनहीनता ही नज़र आती है।
इन बयानों से पार्टी के कट्टरपंथी धड़े को संतोष भले ही मिले, पर चुनाव अभियान में मोदी की स्टेट्समैन की जो छवि बनाई जा रही रही है, उसे धक्का ही लगेगा।
मोदी की रणनीति या राजनीति?
मोदी ने खुद को ऐसे शख्स के रूप में पेश करने की कोशिश की है, जो पक्षपात नहीं करता और जो सबके कल्याण में यकीन रखता है।
मोदी ने एक इंटरव्यू में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तारीफ की है और एक जगह कहा कि राहुल गांधी विपक्ष के नेता बने तो मुझे उनसे भी सहयोग लेना पड़ेगा।
उनका कहना था, "चुनाव जीतना एक बात है और देश चलाना दूसरी बात है। देश चलाने के लिए सबका सहयोग लेना होगा, मैं हिंदू-मुसलमान की बात नहीं करता। मैं 125 करोड़ भारतीयों से बात करूंगा।" इस लिहाज से ये बयान मोदी की राजनीति के ख़िलाफ़ हैं।
नफरत की राजनीति
सच यह भी है कि साम्प्रदायिक और जातीय नफ़रत राजनीति में काफी घुली-मिली है। संघ परिवार से जुड़े लोग ऐसे बयान कई बार दे चुके हैं। प्रवीण तोगड़िया का नाम इनमें सबसे ऊपर है। पिछले साल अगस्त तक उनके ख़िलाफ़ इस प्रकार के बयानों के 19 मामले दर्ज थे।
ये बयान तिरुअनंतपुरम से जम्मू तक तकरीबन एक दर्जन शहरों में दिए गए थे। इनमें से 15 मामले पिछले तीन साल के हैं।
इस बार के चुनाव अभियान की शुरुआत आज़म ख़ान और अमित शाह के बयानों से हुई थी। फिर भाजपा नेता अमित शाह पर से पाबंदी हटाने और आज़म ख़ान पर से न हटाने के चुनाव आयोग के फ़ैसले को भी विवाद का विषय बनाया गया। उसके पहले सहारनपुर से कांग्रेस के उम्मीदवार इमरान मसूद का 'बोटी-बोटी काट देने' वाला बयान आया था।
इस चुनाव में सबसे ज्यादा जहरीले बयान?
अनुभव बताता है कि चुनाव के दौरान ‘गटर राजनीति’ अपने निम्नतम स्तर पर होती है। इस साल वह इतिहास के सबसे बुरे दौर में है। महाराष्ट्र नव निर्माण सेना के राज ठाकरे और ऑल इंडिया मजलिसे इत्तहादुल मुस्लमीन के नेता अकबरुद्दीन ओवैसी के ख़िलाफ़ अक्सर मामले दर्ज होते रहते हैं।
राजनेता जिस भाषा में बात करने के आदी हैं, उसे देखते हुए कई बार यह मामूली बात लगती है, जिसे जुबान फिसलना कहा जाता है- जैसे मुलायम सिंह का यह कहना कि लड़कों से गलती हो जाती है। सवाल इसे रोकने का है।
अधिकार क्षेत्र सीमित होने के बावजूद चुनाव आयोग अपनी तरफ से कार्रवाई करता भी है, पर उसके पास कड़ी सजा देने की व्यवस्था नहीं है। ज़्यादा से ज़्यादा पुलिस में रिपोर्ट दर्ज होगी या राजनेता पर सभाओं को संबोधित न करने की पाबंदी लग जाएगी। क्या इतना काफी है?
सुप्रीम कोर्ट में दो बार ‘हेट स्पीच’ मामला
अक्सर राजनेता इन पाबंदियों का उल्लंघन भी करते हैं। पुलिस में रिपोर्ट दर्ज होने के बाद होता क्या है? अक्सर राज्य सरकारें इन मुकदमों को आगे नहीं चलातीं। चलते हैं तो लगातार खिंचते रहते हैं।
यह भी सच है कि सुप्रीम कोर्ट समाज में विभेद करने के आरोप में शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे को छह साल के लिए मताधिकार से वंचित कर चुकी है। प्रशासन और अदालतें कड़ी कार्रवाई करें तो ऐसे उदाहरणों की संख्या बढ़ सकती है।
पिछले महीने सुप्रीम कोर्ट में दो बार ‘हेट स्पीच’ का मामला सामने आया। अदालत ने 12 मार्च को एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए विधि आयोग को निर्देश दिया कि वह नफरत भरे बयानों, खासतौर से चुनाव के दौरान ऐसी हरकतों को रोकने के लिए दिशा निर्देश तैयार करे।
बयानों पर कोर्ट के निर्देश
अदालत की तीन सदस्यों वाली पीठ ने कहा कि देश में ऐसे बयान देने वालों को सज़ा न मिल पाने का कारण यह नहीं है कि हमारे क़ानूनों में ख़ामी है। कारण यह है कि क़ानूनों को लागू करने वाली एजेंसियाँ शिथिल हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि विधि आयोग के दिशा निर्देश के बाद सरकार को चाहिए कि वह क़ानून में बदलाव करके चुनाव आयोग को और ज़्यादा ताक़तवर बनाए। अदालत ने सरकार से कहा कि वह यह भी देखे कि क्या ऐसे बयान देने वाले नेताओं की पार्टी पर भी कार्रवाई की जा सकती है?
साम्प्रदायिक-जातीय द्वेष बढ़ाने का दोष किसी एक पार्टी पर लगाना भी बेमानी होगा। आम आदमी पार्टी की नेता शाजिया इल्मी अपेक्षाकृत सौम्य और उदार मानी जाती हैं। उन्होंने मुसलमानों को कम्युनल होने की कथित सलाह क्यों दी यह बात समझ में नहीं आती।
बिहार में मोदी के खिलाफ जहर
हाल में बिहार से जेडीयू के प्रत्याशी अबु कैसर ने भागलपुर में एक चुनावी सभा में मोदी को आदमख़ोर कह दिया। इससे पहले शकुनी चौधरी ने मोदी को ज़मीन में गाड़ देने की धमकी दी।
नफ़रत भरे संदेशों के समांतर व्यक्तिगत आरोप-आक्षेप अलग चलते हैं।
अनेक आरोपों की राजनीतिक संगति है, कई असंगत होते हैं। मूल बात यह है कि राजनीति की भाषा को व्याकरण की ज़रूरत है। इसे तैयार करके देने का काम भी इसी राजनीति का है।