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लालकिले का हमलावर बोला, मैं तो रॉ का एजेंट था
पीयूष पांडेय/दिल्ली
Updated Sat, 26 Oct 2013 12:07 AM IST
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लालकिला हमला मामले में मौत की सजा पाने वाले आतंकी मोहम्मद आरिफ ने अंतिम रास्ता अख्तियार करते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
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सर्वोच्च अदालत की ओर से उसकी मौत की सजा पर मुहर लगाने और पुनर्विचार याचिका खारिज करने के बाद आतंकी की ओर से क्यूरेटिव याचिका दायर की गई है।
क्यूरेटिव याचिका में आरिफ ने कानूनी सवाल उठाते हुए कहा है कि ट्रायल कोर्ट ने फरवरी 2005 में दिए गए उसके बयान को स्वीकार न करते हुए आतंकवाद फैलाने के आरोप में दोषी करार दिया। जबकि यह बयान अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 313 में दिया गया था।
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आरिफ ने इस बयान में दावा किया था कि वह पाकिस्तान का रहने वाला था और 1997 से भारतीय खुफिया एजेंसी रॉ की एक्स ब्रांच के लिए काम कर रहा था।
उसके बयान के मुताबिक वह जून, 2000 में कुछ दस्तावेज एक अन्य एजेंट को सौंपने के लिए काठमांडू गया था, जिसने उसके दिल्ली में रहने का बंदोबस्त किया था। इसके बाद उसे इस मामले में जबरन फंसाने के लिए खाली दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करा लिए गए और फिर वह पाकिस्तान वापस नहीं लौट सका।
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सर्वोच्च अदालत आरिफ के इस बयान पर विचार करने से इंकार कर चुकी है। क्योंकि अभियोजन की ओर से ट्रायल के दौरान इस संबंध में कभी भी कोई सवाल नहीं किया गया था।
याचिका में दावा किया गया है कि इस मसले पर आरोपी के बचाव को नहीं सुना गया जो नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है और बड़े स्तर पर न्याय का हनन है। साथ ही कहा गया है कि अन्य सभी छह आरोपियों को हाईकोर्ट ने अभियोजन की कहानी पर अविश्वास जताते हुए बरी कर दिया।
लश्कर-ए-ताइबा का सदस्य है आरिफ
ऐसे में उसे दोषी करार देकर मौत की सजा दिए जाने का कोई आधार नहीं है, जबकि पूरे मामले में सभी साक्ष्य समान हों। याद रहे कि सुप्रीम कोर्ट ने 2011 में आरिफ की मौत की सजा पर मुहर लगाते हुए कहा था कि यह सिर्फ लाल किले पर हमला नहीं था। यह एक महान राष्ट्र के सम्मान पर प्रहार था। गौरतलब है कि आरिफ प्रतिबंधित आतंकी संगठन लश्कर-ए-ताइबा का सदस्य है।
सभी अदालतें लगा चुकी हैं सजा पर मुहर
लाल किले पर 22 दिसंबर, 2000 में हुए हमले में राजपूताना राइफल्स के दो जवानों और एक अन्य की हत्या के आरोप में उसे मौत की सजा सुनाई गई है। ट्रायल कोर्ट ने उसे नवंबर, 2005 में मौत की सजा सुनाई थी जिस पर दिल्ली हाईकोर्ट ने 2005 में मुहर लगाई। इसके बाद अक्तूबर, 2011 में आरिफ की अपील को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज किया था और बीते वर्ष उसकी पुनर्विचार याचिका को भी खारिज कर दिया था।