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मोदी राज में मानव तस्करी, यौन शोषण का कारोबार
विनोद अग्निहोत्री
Updated Fri, 19 Jul 2013 08:39 AM IST
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आमतौर पर शांत और सुरक्षित माना जाने वाला गुजरात में लोग अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर परेशान होने लगे हैं।
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अपह्रत बच्चों की मानव तस्करी करके उन्हें यौन शोषण के लिए विदेश भेजने का अंतर्राष्ट्रीय धंधे का काला कारोबार गुजरात में भी बढऩे लगा है।
पुलिस के आंकड़े भी बच्चों और किशोरों की गुमशुदगी की बढ़ती घटनाओं की पुष्टि करते हैं। इसी साल दिसंबर में लापता बच्चों के माता पिता राजधानी में रैली करेंगे।
सूत्रों के मुताबिक 12 से 14 वर्ष के बच्चों को अपह्त करके उन्हें महंगे दामों पर मानव तस्करों के गिरोहों के जरिए विदेश भेजने का धंधा जारी है।
विदेशियों की आवाजाही वाले गोआ,मथुरा, मुंबई, पुणे, हरिद्वार, बेंगलूर और दिल्ली इस धंधे के बड़े केंद्र बन गए हैं। लापता बच्चों का पता लगाने की मुहिम चला रहे सामाजिक कार्यकर्ता संजय जोशी बताते हैं कि राजस्थान में अजमेर और जयपुर के बीच किसी गुप्त ठिकाने में इन मानव तस्करों ने एक ऐसा अड्डा बना रखा है, जहां 14 साल तक की लड़कियों को अपहरण करके ले जाया जाता है और उन्हें हार्मोन्स का इंजेक्शन देकर उम्र से ज्यादा बड़ा बनाकर अंतर्राष्ट्रीय यौन बाजार में बेचा जाता है।
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इन मासूम बच्चियों की ए,बी,सी श्रेणियां बनाकर उनकी कीमत लगाई जाती है। इनमें ए श्रेणी की बच्चियों को विदेश भेजा जाता है और बी और सी श्रेणी की बच्चियों को देश के भीतर ही सेक्स मंडी में खपाया जाता है।
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पिछले साल अहमदाबाद में बच्चों और किशोरों की बढ़ती गुमशुदगी को लेकर शहर के नागरिकों ने 240 दिन तक बड़ा आंदोलन चलाया था।
दबाव में आई पुलिस ने पहले तो आंदोलन चलाने वालों को गिरफ्तार करने की धमकी दी, लेकिन जब पूर्व मुख्यमंत्री केशूभाई पटेल और पूर्व गृह राज्य मंत्री गोरधन झड़फिया खुद जाकर आंदोलनकारियों के साथ बैठ गए तब पुलिस को मजबूरन कार्रवाई करनी पड़ी और कई बच्चे वापस भी आए।
आंकड़ों के मुताबिक सिर्फ अहमदाबाद में दो मार्च 2013 तक गुमशुदगी के कुल 2193 मामले दर्ज हुए। जबकि पूरे गुजरात में संख्या 11936 थी। पुलिस कार्रवाई, स्वंयसेवी संस्थाओं और परिवार के अपने प्रयास से 9940 मामले सुलझाए गए जबकि करीब दो हजार मामले अभी तक अनसुलझे हैं।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2007 से 2011 तक पूरे गुजरात में गुमशुदगी के कुल 45 हजार से ज्यादा मामले दर्ज किए गए। जिसमें 40 हजार से ज्यादा मामलों का पता लगाया गया।
जबकि चार हजार से ज्यादा मामले अभी भी अनसुलझे हैं। उत्तर भारत के राज्यों के आंकडों की तुलना में यह संख्या मामूली लगती है, लेकिन गुजरात जहां कुछ वर्ष पहले तक ऐसे मामले ना के बराबर थे, यह आंकड़े लोगों को परेशान कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद पुलिस भी हरकत में आई।