फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   huge amount of black money running in loksabha election

लोकसभा चुनाव में लगा अकूत काला धन, गिन भी ना पाएंगे आप!

Thu, 24 Apr 2014 08:28 AM IST
Updated Thu, 24 Apr 2014 08:28 AM IST
विज्ञापन
huge amount of black money running in loksabha election

चुनावों में हो रहे खर्च पर विदेशी मीडिया भी हैरान है। चीन के प्रतिष्ठित ग्लोबल टाइम्स अखबार ने कहा है कि भारतीय चुनाव काले धन को खपाने का जरिया बन गए हैं।

विज्ञापन


अखबार लिखता है कि सत्तारूढ़ कांग्रेस ने पिछले दिनों प्रधानमंत्री पद के दावेदार भाजपा नेता नरेंद्र मोदी पर काले धन का इस्तेमाल प्रचार में करने का आरोप लगाया तो मानो एक बड़े गोरखधंधे की तरफ इशारा था जिसमें किसी भी दल को पाक साफ नहीं कहा जा सकता।
विज्ञापन


भारत के 16वें आम चुनाव को अभी तक का सबसे महंगा कहा जा रहा है। लेकिन एक और वजह से इसे ख्याति मिल रही है। इन चुनावों में जानकारों के अनुसार 400 अरब रुपये का काला धन भी इस्तेमाल हो रहा है।
विज्ञापन
विज्ञापन

सेंसेंक्स के उठान में भी कालेधन का खेल

huge amount of black money running in loksabha election

यह आंकड़ा भारत के जीडीपी का 0.35 फीसदी है। कुछ विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि काले धन का उभार सेंसेक्स के उठान से जुड़ा है। उनका कहना है कि विदेशी संस्थागत निवेशकों की भारतीय शेयरों में रुचि और कुछ नहीं बल्कि नेताओं की मदद वैध तरीके से करने का गलत हथकंडा है। निर्वाचन आयोग ने कार्रवाई भी की है।

आयोग के निर्देश पर अधिकारी बड़ी संख्या में कैश और शराब जब्त कर रहे हैं। निर्वाचन आयोग के अधिकारी अब तक 2.6 अरब रुपये जब्त कर चुके हैं जो एक रिकार्ड है।

दरअसल चुनाव के दौरान उद्योगपति अपना हित देख लेते हैं और राजनीतिक दलों की कैश से मदद करते हैं। भारत में अभी भी उद्योग पर सरकारी नियंत्रण काफी सख्त है। टेलीकाम और टूजी घोटाला बताते हैं कि कैसे व्यापार और राजनीतिक का इस देश में घालमेल हो चुका है।

समझ में नहीं आता ये लोकतंत्र है या धनतंत्र!

huge amount of black money running in loksabha election

काले धन के जोर से आम वोटर को लगता है कि वह लोकतंत्र में नहीं बल्कि धनतंत्र में रह रहा है जहां पैसा सब कुछ कर और करा सकता है। इससे लोग नेताओं और राजनीति से नफरत करने लगे हैं।

दिल्ली विधानसभा के चुनाव में आम आदमी पार्टी की जीत शायद इसी वजह से हुई। निर्वाचन आयोग की पहरेदारी के बावजूद काले धन पर लगाम अभी तक नहीं लग सकी है।

जब चुनाव फंडिंग में सुधारों की बात आती है तो सभी राजनीतिक दल खामोश हो जाते हैं। अभी तक जो भी काम हुआ है उसका श्रेय न्यायपालिका और स्वयंसेवी संगठनों को जाना चाहिए। लेकिन समस्या की जड़ पर वार तो होना ही चाहिए।

पांच साल में चुनावी खर्च डेढ़ लाख करोड़

huge amount of black money running in loksabha election

चुनावी महासमर के बीच एक नई स्टडी ने दावा किया है कि पिछले पांच साल में चुनावों पर 1.50 लाख करोड़ रुपये से भी ज्यादा पैसा खर्च हो चुका है और इसमें से अधिकतर फंड अज्ञात सूत्रों से आया है।

थिंक टैंक सीएमएस द्वारा कराई कई स्टडी ऐसे समय में आई है, जब अधिकतर राजनीतिक दल काले धन के इस्तेमाल को लेकर एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं।

अभी तक पांच चरणों में लोकसभा की 232 सीटों पर मतदान हो चुका है जबकि बाकी चार चरणों में 311 सीटों पर मतदान होना बाकी है। इस दौरान चुनाव आयोग ने कई जगह बड़ी संख्या में नकदी बरामद की है।

चुनावों में काला धन ह‌ी देश में भ्रष्टाचार की जड़

huge amount of black money running in loksabha election

सीएमएस के अध्यक्ष एन भास्कर राव ने कहा, ‘यह एक अनुमान है। इस बेहद बड़ी संख्या में से आधे से ज्यादा काला धन है। चुनावों में काले धन का उपयोग ही देश में भ्रष्टाचार की जड़ है।’

इस 1.5 लाख करोड़ में से 30 हजार करोड़ मौजूदा लोकसभा चुनावों में खर्च हुआ है। जबकि विधानसभा चुनावों में करीब 45 से 50 हजार करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। इसी तरह पंचायती चुनावों में 30 हजार करोड़, मंडल चुनाव के लिए 20 हजार करोड़, नगर निगम चुनावों में 15 हजार करोड़ और जिला परिषद चुनाव में 10 हजार करोड़ रुपये का खर्च होने का अनुमान है।

1996 से चुनावी खर्च पर नजर रखने वाले राव ने बताया, ‘आमतौर पर लोकसभा चुनावों में मीडिया प्रचार पर 25 फीसदी और सत्तारूढ़ दल द्वारा चुनावों से पहले प्रचार पर 20 से 25 प्रतिशत खर्च किया जाता है।

टिकट पाने के लिए खर्च किया जाता है खूब पैसा

huge amount of black money running in loksabha election

छोटे चुनावों में चीजें थोड़ी अलग होती हैं। मीडिया पर बहुत कम खर्च किया जाता है और मंडल व पंचायत चुनावों में रैलियों पर खर्च लगभग न के बराबर होता है।’

उन्होंने आगे बताया कि राजनीतिक दलों द्वारा स्थानीय चुनावों में 10 फीसदी से भी कम खर्च किया जाता है जबकि लोकसभा चुनावों में 20 प्रतिशत तक खर्च होता है।

दूसरी ओर टिकट हासिल करने के लिए उम्मीदवार द्वारा किया जाने वाला खर्च लोकसभा चुनावों में बेहद ज्यादा होता है। कॉरपोरेट फंडिंग पर सीएमएस का कहना है कि जहां पर चुने गए उम्मीदवार कानून को प्रभावित कर सकते हैं, वहां पर कंपनियां ज्यादा खर्च करती हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed