आप भी जान लीजिए तूलिका ने कैसे किया सबसे ऊंचे ज्वालामुखी को फतह
मेरठ की तूलिका रानी के एवरेस्ट से भी ऊंचे इरादे हैं। अपनी लगन और मेहनत के बल पर उन्होंने एशिया के सबसे ऊंचे ज्वालामुखी दामावंद फतह किया है। अपनी इस कठिन यात्रा के दौरान तूलिका ने बहुत कठिनाइयां झेली। अमर उजाला के साथ उन्होंने यात्रा के अनुभव साझा किए।
दामावंद पीक
ऊंचाई 5617 मीटर, 18,714 फीट, अल्बोर्स माउंटेन रेंज ईरान, एशिया का सबसे ऊंचा ज्वालामुखी। ईरान व मध्य-पूर्वी एशिया की सबसे बड़ी चोटी।
ऐसा रहा सफर
20 जुलाई : हमारी यह समिट कुल 10 दिनों 21 से 31 जुलाई की थी। छुट्टी लेकर मैं 20 जुलाई को दिल्ली से दोहा पहुंची। फिर तिहरान जो ईरान की राजधानी है, यहां पूरा दल एकत्र हुआ।
21 जुलाई : सभी का परिचय होने के बाद समिट पर जाने से पहले यूनियन ऑफ इंटरनेशनल अल्पाइन एसोसिएशन (यूआईएए) के चिकित्सक अलीरेजा बहपुर ने हमें ऑल्टीट्यूट सिकनेस पर लेक्चर दिया। पर्वतारोहियों को इसकी जानकारी होना जरूरी है। क्योंकि इसी के दम पर हम अपने शरीर को पहाड़ों पर चढ़ने के लिए खुद को दुरुस्त पाते हैं।
22 जुलाई : हमारे दल ने तिहरान से तोचल पीक के लिए सुबह 11.30 बजे चढ़ाई शुरू की। पर्वतारोहण का नियम है कि मुख्य समिट से पहले हमें उसके समानांतर एक चढ़ाई करना जरूरी है। हमारी समानांतर चढ़ाई तोचल पीक थी। इसकी ऊंचाई 3965 मीटर है। दामावंद पर जाने के लिए हमें इसपर चढ़ना था। दो दिनों में हमने तोचल पीक पर चढ़ाई पूरी की।
पहले दिन 4 घंटे की चढ़ाई पर हमें तोचल पीक की 2620 मीटर की दूरी नापकर ऊपर शीरपाला पहुंचे। यहां तापमान बेहद गर्म लगभग 34 डिग्री के आसपास था। गर्मी के कारण डिहाइड्रेशन का खतरा बहुत था। चट्टानें ड्राई थीं इसलिए नियंत्रण बनाना मुश्किल हो रहा था। तेज चढ़ने पर दिल के दौरे का खतरा रहता है। यहां ईरान माउंटेनरिंग फेडरेशन की हट में हमने डेरा डालकर रात बिताई। 23 जुलाई को हमें दो पड़ाव करने थे इसलिए सोना जरूरी था।
जुलाई था पहला पड़ाव
23 जुलाई दूसरा पड़ाव : हमें दामावंद के लिए शाम 6 बजे निकलना था। तोचल पीक से उतरकर हम दामाचंद के लिए निकल पड़े। जो हमारा मुख्य लक्ष्य था। लगभग 2000 मीटर चढ़ने पर पुलोर में फेडरेशन की हट में पहुंचकर रात बिताई। तेज हवा के कारण ठंड में बिल्कुल वही नमी थी जो मैंने हिमालयन पीक पर महसूस की थी।
24 जुलाई : सुबह उठकर हमने चढ़ाई के लिए दामावंद का दक्षिणी रास्ता तय गाड़ियों से तय किया। यह चढ़ने का मुख्य रूट है, इसलिए फेडरेशन न पहले ही इसे तय कर लिया था। 3000 मीटर की ऊंचाई गाड़ियों से तय करके फेडरेशन की क्लाइंबिंग हट में पहुंचकर आराम किया। यहां ठंड बहुत थी। हमें कैरीमेट लगाने पड़े। हमारे सामने खूबसूरत माउंटेन रेंज फैली हुई थी। पर्वतरोहण का नियम है कि एक इंसान को एक दिन में कुल 1000 मीटर ही चढ़ना चाहिए।
25 जुलाई : क्लाइंबिंग हट से सुबह सवा नौ बजे हमने चढ़ना शुरू किया। 4 घंटे में हम 4 हजार मीटर यानि 12 हजार फीट ऊपर कैंप तीन में पहुंचे। यह फाइनल कैंप था। इसके बाद बड़ी चुनौती शेष चढ़ाई थी। जो 1671 मीटर बची थी। हवाएं 50 किमी प्रति घंटा पर चल रही थीं। हमने वार्मसे चढ़ाए। हमारे सामने अल्बोर्ज माउंटेन की पूरी रेंज थी एक तरफ दामावंद था। एक कमरे में हमने डेरा डालकर रात बिताई।
तबीयत हुई खराब तो दवा खाकर शुरू की चढ़ाई
26 जुलाई : सुबह 10 बजे हमें हाइट गेन करना शुरू कर दिया है। रात को सो नहीं पाने के कारण मुझे सिरदर्द था, ऐसे में चढ़ना मुश्किल था। दवा लेकर मैंने राहत महसूस की और चढ़ाई शुरू कर दी। ऑल्टीट्यूट के कारण साथियों को परेशानी होनी लगी। सिरदर्द और जुकाम हो गया। हम 4900 मीटर ऊपर पहुंच गए। यहां से ग्लेशियर शुरू हो गए। चट्टानें बर्फ से ढकी थीं। दामावंद के पूर्व में फ्रोजन स्नो फाल होने के कारण काफी कोहरा था। तापमान कम था। हम जमने की स्थिति में आ चुके थे। बोतलों का पानी भी बर्फ बन गया है। हम 2 बजे ही नीचे वापस आ गए। पूरी चढ़ाई में मोबाइल का नेटवर्क जीरो रहा।
27 जुलाई : सुबह सवा पांच बजे अंधेरे में हेडटॉर्च लगाकर हमने चढ़ा शुरू किया। ठंड बहुत थी। एवरेस्ट की 17 हजार फीट वाली ठंड यहां 12 हजार फीट पर थी। हम पूरे ढंके थे। यहां से सल्फर के फव्वारे शुरू हो गए थे। चूंकि दावानंद ज्वालामुखी है यहां सल्फर बहुत निकलता है। 10.45 पर हम दावानंद पहुंचे। जगह-जगह से सल्फर फूट रहा था। ठंड व हवा ज्यादा और सल्फर के धुएं के कारण हम कुल 15 मिनट यहां रहे। तस्वीरें खींची। अमर उजाला का झंडा लहराया। तिरंगा झंडा फहराया। ईरानी दोस्तों ने भारत का झंडा पकड़कर फोटो खींचने में मेरी मदद की। 15 मिनट रुककर नीचे उतरना शुरू कर दिया। सवा दो बजे तक 4000 मीटर तक नीचे आ गए।
28 जुलाई : दामावंद से नीचे उतरते हम कैंप टू और कैंप वन में पहुंचे और आराम किया। 29 को तिहरान लौटे। ईरानी माउंटेनयरिंग फेडरेशन ने हमारे रुकने का इंतजाम किया है। साथ ही प्रमाणपत्र भी दिया गया, जो हमेशा यादगार रहेगा। 30 जुलाई को तिहरान में फेडरेशन की ओर से हमें शहर घुमाया गया। 31 जुलाई को दिल्ली के लिए रवाना हो गई।
मुश्किल मगर मजेदार था दामावंद समिट
दामावंद समिट पर जाना चैलेंजिंग था, लेकिन आसान नहीं था। चढ़ाई के अलावा दूसरी कई दिक्कतें इस सफर में आईं। पहली दिक्कत नौकरी से छुट्टी की थी। मुझे 20 जुलाई को तिहरान पहुंचना था, लेकिन दो दिन पहले तक मुझे नौकरी से छुट्टी नहीं मिल पाई थी। छुट्टी के बाद दूसरी समस्या धन थी। इनसे हटकर एक महिला पर्वतारोही होने की भी दिक्कतें थीं।
हमारे 53 लोगों के दल में कुल 6 महिलाएं थीं। शेष पुरुष थे। भारत से मैं अकेली लड़की थी। चढ़ाई में हमने तीन कैंप किए। तीनों ही कैंप में एक हट में दल के सभी लोगों को ठहराया गया। कपड़े बदलना एक बड़ी समस्या थी। हम सभी महिलाओं ने अपने स्लीपिंग बैग्स में घुसकर हर बार कपड़े बदले। अन्य दिक्कतें भी थीं। एक कैंप में 53 लोगों को रुकना, खाना और सोना सब करना होता था।
एक साथ 53 लोगों का बिस्तर जमीन पर बिछना फिर उस पर सोना कैसा होगा इस परेशानी का अंदाजा आप लगा सकते हैं। पहाड़ों पर दौड़ती तेज हवा कैंप के बाहर खामोशी को तोड़ती थी। रात के इस खामोश शोर में सोना मेरे लिए नामुमकिन था। घुटन के कारण कैंप टू में मैं बिल्कुल सो नहीं सकी।
इसका असर यह कि दूसरे दिन जब हमें फाइनली समिट पर जाना था मुझे काफी सिरदर्द रहा। माइनस तापमान में ठंड से बचने के लिए हम नाक तक कपड़ों से ढंके थे, आंखें चश्मे में छिपी होती थीं। दो जोड़ी दास्ताने, तीन जोड़ी मौजे और बूट पहनकर चढ़ाई करनी पड़ती थी। ऐसे में अगर आपके जूते का फीता खुल जाए तो सेकेंडभर के लिए दास्ताना उतारकर उसे बांधना भी नामुमकिन था। खुले जूते से ही हमें आगे बढ़ना था।
के-2, है सपना
तूलिका का सपना आगामी 2020 तक के-2 की पीक्स पर जाना है। दुनिया में 8000 मीटर से अधिक ऊंची प्रमुख 14 चोटियों पर तिरंगा फहराकर देश का नाम रोशन करना है। साथ ही चाइना की ओर से एक बार पुन: एवरेस्ट पर चढ़ना है। के-2 काफी टेक्निकल पीक है, इस पर चढ़ने के लिए अभी मुझे बहुत मेहनत करनी है।