फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   How successful Narendra Modi will be as poet?

कितने लोकप्रिय कवि होंगे मोदी, फैसला आपका

Thu, 27 Aug 2015 03:26 PM IST
Updated Thu, 27 Aug 2015 03:26 PM IST
विज्ञापन
How successful Narendra Modi will be as poet?

क्या जरूरी है कि सत्तासीन व्यक्ति कवि हो? क्या सत्ता से फूटता है कविता का सोता? या फिर वह मात्र एक उपकरण है। सत्ता का अनिवार्य औजार, जिसका इस्तेमाल वह अपनी सुविधा के अनुसार शासक की छवि गढ़ने के लिए करती है।

विज्ञापन


यह अकारण नहीं होगा कि सत्ता के निकष के रूप में साहित्य गढ़ने के प्रयास शताब्दियों से, शासक-दर-शासक होते आए हैं। इसकी उपयोगिता और अनिवार्यता सत्ताधर्मी लोगों को आकर्षित करती रही है। लेकिन सत्ता की कविता का उपकरण समाज से जुड़ने में बहुत कारगर रहा हो, इसके ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलते।
विज्ञापन


बावजूद इसके, कवि होने की कामना के साथ यह अपेक्षा कभी हल्की नहीं पड़ी कि इसी रास्ते कट्टर से कट्टर शासक को कवि-ह्रदय, कोमल, सरोकारी और सहज मान लिया जाए।
विज्ञापन
विज्ञापन

शासक कवि

How successful Narendra Modi will be as poet?

ऐसा दुनिया के कई देशों में है। उन क्षेत्रों में अधिक, जहां वैचारिक और मानवीय संवेदना भौतिक संसाधनों का अपेक्षाकृत अभाव पूरा करती है। विपन्नता, गरीबी और कलह को ढकती है। दक्षिण एशिया में इसके तमाम उदाहरण हैं।

बाबर की एकमात्र पुस्तक बाबरनामा में दूसरी चीजों और बेहतरीन गद्य के अलावा कविता का छिटपुट छौंक है। ब्रजभाषा में अकबर की मौखिक कविताई पर इतिहासकार अब करीब-क़रीब एकमत हैं।

खासकर वे छंद जिनमें उन्होंने तानसेन और बीरबल के निधन पर अपना दुःख प्रकट किया है। यह जरूरी नहीं है कि हर शासक सिर्फ अपनी सत्ता की व्यापक स्वीकार्यता के लिए कविता की गली की ओर मुड़ता हो। संभव है कि वह अंदर से मूलतः कवि-मना हो। सत्ता उसे राह चलते मिल गई हो। मोहम्मदशाह रंगीले, बहादुरशाह जफर या वाजिदअली शाह जैसे उदाहरण हैं। यह साबित करते हुए कि वे केवल सतही तुकबंदी नहीं कर रहे थे।

रचनाकार जवाहरलाल नेहरु भी थे पर वह गद्य से बाहर नहीं निकले। उनका गद्य यकीनन कई जगह कविता सरीखा था। विश्वनाथ प्रताप सिंह छंद तोड़कर बाहर आए। अटल बिहारी वाजपेयी ने छंद में वापसी के साथ क्षमता भर कविता की।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस श्रृंखला के अगले कवि हैं। वे स्वयं को कवि और अपनी रचना को कविता मानने से थोड़ा बचते हुए संग्रह 'साक्षी भाव' में कहते हैं, 'यह कोई साहित्यिक रचना नहीं है।।। भावनाओं की आर्द्रता है।।। ये कवितायें लिखीं तो स्वांतः सुखाय थीं पर बदलते वक़्त के साथ अब ये स्वांतःसुखाय नहीं रह गईं।'

'तैयार।।। समर्पित'

How successful Narendra Modi will be as poet?

'साक्षी भाव' की कुल सोलह कविताओं के शीर्षक अलग-अलग हैं लेकिन शुरुआत एक ही शब्द-समूह से होती है 'जगज्जननी मां के श्रीचरणों में।' सारी कविताएं उन्हें ही समर्पित हैं। वे एक लंबी कविता के टुकड़े हैं, जिन्हें पाठकीय सहूलियत के लिए तोड़ दिया गया है।

मोदी चाहते हैं कि इस 'अनायास प्रयास' में पाठक 'आहद नहीं, अनहद-सा' महसूस करें। हो सकता है तब उसे 'ह्रदय की गहन पीड़ा' इन कविताओं में बहती मिले। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम), हार्वर्ड और स्टेनफर्ड की तरह का संस्थान मानने वाले मोदी संघ को भारतीय मॉडल कहते हैं, जो भारतीय नेतृत्व की मूलभूत भावनाओं अपरिग्रह, प्रायश्चित, समर्पण और प्रतिबद्धता पर जोर देता है।

मोदी की कविताओं का आदर्श भी यही है। अपनी एक कविता में वह याचना करते हैं कि उनका जीवन 'सापेक्षता के सहारे' न चले बल्कि 'निरपेक्ष भावपूर्ण जीवन' हो। अगर सबको 'जीवन की सापेक्षता की सीमाओं में ही बंधे रहना है/ तो फिर असंतोष की आग को रोकेगा कौन? असंतोष की आग सापेक्ष चिंतन का ही तो/ परिणाम है न?' 'साक्षी भाव' की अधिकतर कविताएं 1986 की हैं लेकिन एक बात उनमें घूम-घूमकर आती है- यह कि 'मैं तैयार हूं।।। मैं समर्पित हूं।' मां पर यह भरोसा भी कि 'जो कुछ भी होना है, वह हो/ मेरे त्याग, मेरे समर्पण की अनुभूति/ यत्र-तत्र-सर्वत्र/ तू कराए बिना नहीं रहेगी/ ऐसी श्रद्धा है।'

लगभग वाजपेयी की शब्दावली जैसी एक कामना यह भी कि 'मुझे किसी को मापना नहीं है/ मुझे अपनी श्रेष्ठता सिद्ध नहीं करनी है।।। मां।।। तू ही मुझे शक्ति दे/ जिससे मैं/ किसी के साथ अन्याय न कर बैठूं/ परंतु/ मुझे अन्याय सहन करने की शक्ति प्रदान कर।'

नरेंद्र मोदी का कविता संग्रह इसी साल छपा है लेकिन लेखकीय परिचय में उन्हें 'एक कुशल प्रशासक, दूरदर्शी राजनेता, सहृदय कवि-लेखक के रूप में पूरे देश में लोकप्रिय' बताया गया है। कहा गया है कि यह संकलन 'ह्रदय को स्पंदित करने वाले मर्मस्पर्शी विचारों का अनंत सोपान है।

'परिचय की इन पंक्तियों के विपरीत मोदी कहते हैं कि 'समूची पुस्तक एक भक्त की अपनी आराध्य मां के समक्ष आर्द्र पुकार है।।। मैं भी आपके समान गुण-दोष भरा सामान्य मानव ही हूं।' "मेरी तरफ से सिर्फ इतना ही, बाकी फैसला आपका।"

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed