जानिए, कितने अंधविश्वासी हैं हमारे नेतागण
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हमारे देश की अधिकांश आबादी भले ही कितनी पढ़ी लिखी हो गई हो, लेकिन देश में अंधविश्वास आज भी बना हुआ है। यह अंधविश्वास हमारे जन प्रतिनिधियों को इस कदर जकड़े हुए हैं कि पूछिए मत।
विश्वास और अंधविश्वास के बीच एक बारीक लाइन होती है जो आस्था से जकड़ी होती है। कहा जाता है कि आस्था न तो किसी सिद्धांत को मानती है और न ही किसी वाजिब तर्क को। आस्था के आगे सब कुछ नतमस्तक होता है।
भारत जैसे विविधता वाले देश में बेतरतीब ढंग से पसरीं कुरीतियां और कुप्रथाएं इस कदर गहरी पैठ जमाए हुए हैं कि उनका पूर्ण-उन्मूलन अब तक संभव नहीं हो पाया है।
इसका परिणाम यह है कि आज भी काफी सारे अंधविश्वास आधुनिक समाज को अपनी चपेट में लिए हुए है और इनको मानने वाले पढ़े लिखे व्यक्तियों का विश्वास डिगा पाना आज भी नामुमकिन है।
सदानंद गौडा भी अंधविश्वास से पीड़ित
जिस वक्त सदानंद गौडा कर्नाटक के मुख्यमंत्री थे उनपर भूत-अराधना की रस्म अदायगी का आरोप लगा था। यह पूजा उनके गृह नगर पुत्तर में की गई थी, ताकि उनके राज्य में राजनीतिक स्थायित्व लाया जा सके क्योंकि राज्य में उनको कुर्सी से हटाने के प्रयास किए जा रहे थे।
हालांकि उन्हें अगले ही साल अपना पद छोड़ना पड़ा। तटीय कर्नाटक में भूत-अराधना एक नियमित रस्म है, जिसे धार्मिक मान्यता भी है। हालांकि राज्य के कुछ हिस्सों में इसे खतरनाक भी माना जाता है।
क्या है भूत-अराधना- भूत-अराधना एक प्राचीन कर्मकाण्ड है जिसमें पवित्र आत्मा की पूजा की जाती है। यह मुख्यतया दक्षिणी कर्नाटक के तुलु-भाषी उडुपी जिले में मनाया जाता है। तुलु कर्नाटक की क्षेत्रीय भाषा है।
समूह में की जाने वाली भूत-अराधना में एक विशेष प्रकार का संगीत बजाया जाता है। इस मुख्य फोक-डांस का उद्देश्य शैतानों को शांत करना होता है ताकि मौजूदा माहौल में सुधार हो सके।
येदियुरप्पा भी अंधविश्वास की गिरफ्त में
कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बी एस येदियुरप्पा भी अंधविश्वासी माने जाते हैं। उनका अंधविश्वास उसी दिन उजागर हो गया जब उन्होंने बतौर मुख्यमंत्री अपने पद की शपथ ली थी। उन्होंने दुष्ट आत्माओं को अपने कार्यालय से बाहर करने के लिए नारियल भी फुड़वाया था।
जल्द ही उनपर कई सारी रस्म अदायगियों का आरोप लगा जिसमें घौराष्ट्र हूम, मनुसुयुक्ता परायना, आदित्य हृदया, नरसिंहा कवच और गर्धभा प्रयोगा शामिल है। इन सारी रस्मों को खुद की सुरक्षा और अपने प्रतिद्वंदियों का खात्मा करने के लिए अदा किया गया था।
येदियुरप्पा के निजी पादरी ने बताया है कि वो खुद की और अपने परिवार की रक्षा के लिए अक्सर कई रस्मो की अदायगी करवाते रहते हैं।
गर्धभा प्रयोगा में बंदर की बलि दी जाती है जबकि मनुसुयुक्ता परायना एक तरह का मंत्रोच्चारण है जिसके उच्चारण मात्र से ही भक्त के चारो ओर एक रक्षात्मक कवच बन जाता है। वहीं आदित्य हृदया में सूर्य देवता को शांत रहने की प्रार्थना की जाती है।
रेवाना पर भी लगा अंधविश्वासी होने का आरोप
पूर्व मंत्री और पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देव गौडा के बड़े बेटे एच डी रेवाना अपने कार्यकाल के दौरान काफी सारे खतरनाक ब्लैक मैजिक को लेकर चर्चा में रहे हैं।
उन पर आरोप लगे हैं कि उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान कई बार गर्धभा प्रयोगा की रस्म अदायगी की है जिसमें बंदरों की बलि दी जाती है। एक बार विधानसभा चुनाव के दौरान ही उन्हें इस रस्म की अदायगी करते हुए कैमरे में कैद किया गया था।
कुमारस्वामी भी अंधविश्वासी
क्या यह बैड लक ही था कि कर्नाटक के जाने माने नेता और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री एच डी कुमारास्वामी को अपना कस्तूरी इंटरटेनमेंट चैनल बेचना पड़ा।
आधिकारिक बयानों के मुताबिक यह खबर आई थी कि इस चैनल को संभालने वाली उनकी पत्नी अनीता कुमारस्वामी ने यह चैनल इसलिए बेचा क्योंकि वो यह पैसा अपने पति के स्वास्थ्य लाभ और बेटे के कैरियर में खर्च करना चाहती थीं। जबकि अंदरूनी हलकों से मुताबिक यह चैनल उनके और उनके परिवार के लिए काफी मनहूस था।
देवगौडा भी अंधविश्वासी
एच डी देवगौडा भारतीय राजनीति के एक ऐसे शख्स हैं जिनपर अपने प्रतिद्वंदियों के खिलाफ ब्लैक मैजिक करवाने के आरोप लगते आए हैं।
साल 2000 में पूर्व मंत्री स्वर्गीय के एक नागे गौडा ने देवगौडा के परिवार पर आरोप लगाया था कि उन्हें मजा चखाने के लिए ब्लैक मैजिक का इस्तेमाल किया गया था।
वहीं साल 2007 में जब राज्य के मुख्यमंत्री एच डी कुमारास्वामी भाजपा को सत्ता सौंपने में असफल रहे तो ब्लैक मैजिक का यह प्रकरण और उग्र हो गया।
महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा और हिमाचल भी खूब अंधविश्वासी
महाराष्ट्र के अधिकांश हलकों से आने वाले नेता भी अंधविश्वास में बुरी तरह जकड़े होते हैं। फिर वो चाहे शरद पवार हों या शिवसेना के नेतागण।
शिवसेना नेता और पांच बार के सांसद मोहन रावले तो अपने चुनाव अभियान के दौरान सिर्फ पीली शर्ट ही पहनते हैं। वहीं महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण ने तो अपना नाम ही बदल कर अशोकराव चव्हाण कर लिया।
पंजाब, हरियाणा और हिमाचल के नेता भी अपने लकी चार्म को बखूबी मानते हैं। यहां तक की योजनाओं को बनाने में भी पंडितों से सलाह लेकर उसकी तारीखें तय की जाती हैं।
आपको बता दें कि हरियाणा के नए मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर भी यहं तक अंधविश्वासी हैं कि उनके शपथ ग्रहण समारोह में काले कपड़े पहने भाजपा कार्यकर्ताओं को भी दाखिल होने की इजाजत नहीं दी गई थी।
नोएडा ही नहीं आंध्र और एमपी भी अंधविश्वासी
अंधविश्वास के मामले में नोएडा, आंध्रप्रदेश और एमपी का भी कोई सानी नहीं है। उत्तर प्रदेश के नोएडा के बारे में तो यहां तक कहा जाता है कि भले ही इस क्षेत्र का कितना भी विकास हो गया हो किसी भी पार्टी का कोई भी नेता यहां प्रचार करने या अपनी योजनाओं का बखान करने नहीं आता है।
अखिलेख यादव भी लखनऊ में बैठकर ही नोएडा को संबोधित करते हैं। कहा जाता है कि एक बार एन डी तिवारी ने नोएडा आने की हिमाकत की थी। इसका खामियाजा यह हुआ कि साल 1989 में उन्हें अपने मुख्यमंत्री का पद गंवाना पड़ा था।
वहीं तेलांगना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव भी वास्तु को काफी मानते हैं और किसी भी फैसले को लेकर वास्तु जांच करवाते हैं। वो अपना आधिकारिक कार्यालय भी इसी के चलते दो बार बदलवा चुके हैं।
अगर बात एमपी की की जाए तो राज्य के मौजूदा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती भी दशहरे के दौरान अपनी कुर्सी को बुरे प्रभाव से बचाने के लिए कई अंधविश्वासों का पालन करती थीं। चौहान ने तो एक बार अष्टमी को अपने बंगले पर विशेष पूजा आयोजित करवाई थी।